खौफ के मंजर उधर हैं देखिए
आँसुओं से नयन तर हैं देखिए
देखते थे बैठकर सपने जहाँ,
आज वो घर खंडहर हैं देखिए
हैं कहीं लाशें, लहू, क्रंदन करुण,
मातमी जद में सफर हैं देखिए
आदमीयत का है ये इम्तहां 'मुकेश',
कब से जख्मी मुंतजिर हैं देखिए
शुक्रवार, 15 अक्टूबर 2010
ओही खाती रुसल बाड़ें ना
सईयाँ अलगे बिछाके खाटी आज सुतल बाड़ें
ओही खाती रुसल बाड़ें ना
----------------------------------------------
(१)बोललो पर बोलत नईखन, सुनत नईखन कहल
इनके चलते घर में मुश्किल,भईल बाटे रहल
हमके डाहे ख़ातिर लेके धंधा उठल बाड़ें
ओही ..............................................
(२)हफ्ता दिन से सुतत बाड़े, दुअरा सईयाँ जाई के
आवतारे दुनो बेरा, होटल से खाना खाई के
बाकी घर के खाना खईला बीना टूटल बाड़ें
ओही ..........................................................
(३) मुकेश आधी रात आके, सिकड़ी बजईलें
जननी ना सुतला में, कब अईलें - गईलें
हमरो पिया दामोदर तहिये से टिहुकल बाड़ें
ओही ...................................................
ओही खाती रुसल बाड़ें ना
----------------------------------------------
(१)बोललो पर बोलत नईखन, सुनत नईखन कहल
इनके चलते घर में मुश्किल,भईल बाटे रहल
हमके डाहे ख़ातिर लेके धंधा उठल बाड़ें
ओही ..............................................
(२)हफ्ता दिन से सुतत बाड़े, दुअरा सईयाँ जाई के
आवतारे दुनो बेरा, होटल से खाना खाई के
बाकी घर के खाना खईला बीना टूटल बाड़ें
ओही ..........................................................
(३) मुकेश आधी रात आके, सिकड़ी बजईलें
जननी ना सुतला में, कब अईलें - गईलें
हमरो पिया दामोदर तहिये से टिहुकल बाड़ें
ओही ...................................................
शनिवार, 9 अक्टूबर 2010
अंजाना अंजानी : फिल्म समीक्षा
बैनर : नाडियाडवाला ग्रेंडसन एंटरटेनमेंट, इरोज़ एंटरटेनमेंट
निर्माता : साजिद नाडियाडवाला
निर्देशक : सिद्धार्थ आनंद
संगीत : विशाल शेखर
कलाकार : रणबीर कपूर, प्रियंका चोपड़ा, जायद खान
सेंसर सर्टिफिकेट : यू/ए * 2 घंटे 5 मिनट
कहानी को अगर ज्यादा लंबा खींचा जाए तो वो अपना असर खो बैठती है। ऐसा ही कुछ हुआ है ‘अंजाना अंजानी’ के साथ। इस फिल्म को ज्यादा से ज्यादा 90 मिनट में खत्म कर देना था, लेकिन 125 मिनट का वक्त लिया गया। जिससे न केवल फिल्म की गति धीमी हो गई है बल्कि कई लंबे दृश्यों की वजह से यह उबाऊ भी लगती है।
आकाश (रणबीर कपूर) और कियारा (प्रियंका चोपड़ा) एक ब्रिज पर मिलते हैं, जहाँ से दोनों आत्महत्या करने वाले हैं। आकाश को बिज़नेस में जबरदस्त नुकसान हुआ है और कियारा के प्रेमी कुणाल (जायद खान) ने उसे धोखा दिया है, इसलिए वे कायराना कदम उठा रहे हैं।
आत्महत्या की कोशिश असफल होती है। कुछ देर बाद उनकी फिर मुलाकात होती है और वे पाँच बार अपने आपको खत्म करना चाहते हैं, लेकिन हर बार बच जाते हैं। आखिरकार दोनों बीस दिन बाद 31 दिसंबर को आत्महत्या करने की प्लानिंग करते हैं।
इन बीस दिनों में वे वो सब कुछ करना चाहते हैं जो हमेशा से वे करना चाहते थे। एक लंबे सफर पर वे निकलते हैं और एक-दूसरे को वे चाहने लगते हैं। हालाँकि इस बात को वे स्वीकारते नहीं हैं।
31 दिसंबर के पहले आकाश को लगता है कि कियारा को अपने प्रेमी को माफ करना चाहिए और वह उसे अपने घर लौटने पर मजबूर करता है। किस तरह बिछड़ने के बाद उन्हें महसूस होता है कि वे आपस में प्यार करने लगे हैं, ये फिल्म का सार है।
फिल्म की कहानी अच्छी है और इसमें भरपूर इमोशन और एंटरटेनमेंट की गुंजाइश थी, लेकिन इस पर आधारित स्क्रीनप्ले बेहद कमजोर हैं। सीन कुछ इस तरह लिखे गए हैं कि वो बेजान लगते हैं।
शुरुआत के आधे घंटे तक फिल्म बेहद उबाऊ है जब आकाश और कियारा अलग-अलग तरीके से आत्महत्या की कोशिश करते दिखाए गए हैं। सब कुछ इस तरह फिल्माया गया है मानो वे मजाक कर रहे हों। इसके बाद जब आकाश और कियारा बीस दिनों तक जिंदगी का मजा लूटने का प्लान बनाते हैं, तब भी फिल्म में मौज-मस्ती नदारद नजर आती है।
कियारा और आकाश के किरदार भी ठीक से लिखे नहीं गए हैं। आकाश जब भी कियारा के नजदीक आने की कोशिश करता है तो वह उसे बताती है कुणाल को वह भूला नहीं पा रही है। जब वह उसे कुणाल के पास भेज देता है तो उसे आकाश की याद सताने लगती है।
साथ ही दोनों के आत्महत्या करने की कोशिश के पीछे जो कारण बताए गए हैं वो बेहद कमजोर हैं। इतनी छोटी-सी बातों के लिए क्यों कोई अपनी मूल्यवान जिंदगी गँवाना चाहेगा?
किसी भी प्रेम कहानी में इमोशन और कैमेस्ट्री का बहुत महत्व रहता है। ‘अंजाना अंजानी’ की कहानी में वो इमोशन नहीं हैं कि दर्शकों को कियारा और आकाशा से हमदर्दी हो।
रणबीर और प्रियंका की कैमेस्ट्री भी परदे पर दिखाई नहीं देती। जहाँ तक अभिनय का सवाल है तो दोनों ने बेहतरीन काम किया है। खासकर प्रियंका चोपड़ा को अपने किरदार में कई शेड्स दिखाने का मौका मिला और उन्होंने बखूबी अपने पात्र को जिया। रणबीर कपूर कुछ ज्यादा ही उदास नजर आएँ। छोटे से रोल में जायद खान भी ठीक हैं।
निर्देशक सिद्धार्थ आनंद को लगातार बड़े मौके मिले हैं। यशराज फिल्म्स के लिए उन्होंने तीन फिल्में बनाईं और अब साजिद नाडियाडवाला जैसा निर्माता, लेकिन उनके द्वारा बनाई गई फिल्मों से दर्शक जुड़ नहीं पाता है।
जहाँ तक फिल्म के सकारात्मक पक्ष का सवाल है तो कुछ दृश्य ऐसे हैं जो मनोरंजन करते हैं। गुदगुदाते हैं। फिल्म का संगीत पक्ष बहुत मजबूत है। विशाल-शेखर द्वारा संगीतबद्ध ‘अंजाना अंजानी’, ‘आस पास है खुदा’, ‘तुझे भूला दिया’ सुनने लायक हैं।
निर्माता साजिद नाडियाडवाला ने जमकर पैसा खर्च किया है। न्यूयॉर्क, लास वेगास और सेन फ्रांसिस्को में फिल्म को फिल्माया गया है और फिल्म में भव्यता नजर आती है। लेकिन पूरी फिल्म की बात की जाए तो ‘अंजाना अंजानी’ से अंजान बने रहना ही बेहतर है।
निर्माता : साजिद नाडियाडवाला
निर्देशक : सिद्धार्थ आनंद
संगीत : विशाल शेखर
कलाकार : रणबीर कपूर, प्रियंका चोपड़ा, जायद खान
सेंसर सर्टिफिकेट : यू/ए * 2 घंटे 5 मिनट
कहानी को अगर ज्यादा लंबा खींचा जाए तो वो अपना असर खो बैठती है। ऐसा ही कुछ हुआ है ‘अंजाना अंजानी’ के साथ। इस फिल्म को ज्यादा से ज्यादा 90 मिनट में खत्म कर देना था, लेकिन 125 मिनट का वक्त लिया गया। जिससे न केवल फिल्म की गति धीमी हो गई है बल्कि कई लंबे दृश्यों की वजह से यह उबाऊ भी लगती है।
आकाश (रणबीर कपूर) और कियारा (प्रियंका चोपड़ा) एक ब्रिज पर मिलते हैं, जहाँ से दोनों आत्महत्या करने वाले हैं। आकाश को बिज़नेस में जबरदस्त नुकसान हुआ है और कियारा के प्रेमी कुणाल (जायद खान) ने उसे धोखा दिया है, इसलिए वे कायराना कदम उठा रहे हैं।
आत्महत्या की कोशिश असफल होती है। कुछ देर बाद उनकी फिर मुलाकात होती है और वे पाँच बार अपने आपको खत्म करना चाहते हैं, लेकिन हर बार बच जाते हैं। आखिरकार दोनों बीस दिन बाद 31 दिसंबर को आत्महत्या करने की प्लानिंग करते हैं।
इन बीस दिनों में वे वो सब कुछ करना चाहते हैं जो हमेशा से वे करना चाहते थे। एक लंबे सफर पर वे निकलते हैं और एक-दूसरे को वे चाहने लगते हैं। हालाँकि इस बात को वे स्वीकारते नहीं हैं।
31 दिसंबर के पहले आकाश को लगता है कि कियारा को अपने प्रेमी को माफ करना चाहिए और वह उसे अपने घर लौटने पर मजबूर करता है। किस तरह बिछड़ने के बाद उन्हें महसूस होता है कि वे आपस में प्यार करने लगे हैं, ये फिल्म का सार है।
फिल्म की कहानी अच्छी है और इसमें भरपूर इमोशन और एंटरटेनमेंट की गुंजाइश थी, लेकिन इस पर आधारित स्क्रीनप्ले बेहद कमजोर हैं। सीन कुछ इस तरह लिखे गए हैं कि वो बेजान लगते हैं।
शुरुआत के आधे घंटे तक फिल्म बेहद उबाऊ है जब आकाश और कियारा अलग-अलग तरीके से आत्महत्या की कोशिश करते दिखाए गए हैं। सब कुछ इस तरह फिल्माया गया है मानो वे मजाक कर रहे हों। इसके बाद जब आकाश और कियारा बीस दिनों तक जिंदगी का मजा लूटने का प्लान बनाते हैं, तब भी फिल्म में मौज-मस्ती नदारद नजर आती है।
कियारा और आकाश के किरदार भी ठीक से लिखे नहीं गए हैं। आकाश जब भी कियारा के नजदीक आने की कोशिश करता है तो वह उसे बताती है कुणाल को वह भूला नहीं पा रही है। जब वह उसे कुणाल के पास भेज देता है तो उसे आकाश की याद सताने लगती है।
साथ ही दोनों के आत्महत्या करने की कोशिश के पीछे जो कारण बताए गए हैं वो बेहद कमजोर हैं। इतनी छोटी-सी बातों के लिए क्यों कोई अपनी मूल्यवान जिंदगी गँवाना चाहेगा?
किसी भी प्रेम कहानी में इमोशन और कैमेस्ट्री का बहुत महत्व रहता है। ‘अंजाना अंजानी’ की कहानी में वो इमोशन नहीं हैं कि दर्शकों को कियारा और आकाशा से हमदर्दी हो।
रणबीर और प्रियंका की कैमेस्ट्री भी परदे पर दिखाई नहीं देती। जहाँ तक अभिनय का सवाल है तो दोनों ने बेहतरीन काम किया है। खासकर प्रियंका चोपड़ा को अपने किरदार में कई शेड्स दिखाने का मौका मिला और उन्होंने बखूबी अपने पात्र को जिया। रणबीर कपूर कुछ ज्यादा ही उदास नजर आएँ। छोटे से रोल में जायद खान भी ठीक हैं।
निर्देशक सिद्धार्थ आनंद को लगातार बड़े मौके मिले हैं। यशराज फिल्म्स के लिए उन्होंने तीन फिल्में बनाईं और अब साजिद नाडियाडवाला जैसा निर्माता, लेकिन उनके द्वारा बनाई गई फिल्मों से दर्शक जुड़ नहीं पाता है।
जहाँ तक फिल्म के सकारात्मक पक्ष का सवाल है तो कुछ दृश्य ऐसे हैं जो मनोरंजन करते हैं। गुदगुदाते हैं। फिल्म का संगीत पक्ष बहुत मजबूत है। विशाल-शेखर द्वारा संगीतबद्ध ‘अंजाना अंजानी’, ‘आस पास है खुदा’, ‘तुझे भूला दिया’ सुनने लायक हैं।
निर्माता साजिद नाडियाडवाला ने जमकर पैसा खर्च किया है। न्यूयॉर्क, लास वेगास और सेन फ्रांसिस्को में फिल्म को फिल्माया गया है और फिल्म में भव्यता नजर आती है। लेकिन पूरी फिल्म की बात की जाए तो ‘अंजाना अंजानी’ से अंजान बने रहना ही बेहतर है।
क्रुक : बैड एंड बोरिंग
बैनर : विशेष फिल्म्स 
निर्माता : मुकेश भट्ट
निर्देशक : मोहित सूरी
संगीत : प्रीतम चक्रवर्ती
कलाकार : इमरान हाशमी, नेहा शर्मा, अर्जन बाजवा, गुलशन ग्रोवर, शेला एलेन
मोहित सूरी द्वारा निर्देशित फिल्म ‘क्रुक’ इतनी बुरी फिल्म है कि सिनेमाघर में बैठना मुश्किल हो जाता है।
लव स्टोरी की बैकड्रॉप में सामयिक घटनाएँ डालकर फिल्म बनाना इन दिनों फिल्मकारों को बेहद पसंद आ रहा है। ऑस्ट्रेलिया में भारतीयों पर कुछ महीनों पहले हमले हुए थे और अभी भी यह मामला पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। इसी को आधार बनाकर ‘क्रुक’ की कहानी का तानाबाना बुना गया है।
प्रेम कहानी, नस्लीय हमले, सेक्सी सीन, फिल्म के हीरो का अच्छाई और बुराई को लेकर असमंजस जैसे कई ट्रेक्स पर फिल्म चलती है और इन सबको समेटना स्क्रीनप्ले राइटर अंकुर तिवारी और निर्देशक मोहित सूरी के लिए मुश्किल हो गया।
फिल्म पर से पूरी तरह उनका नियंत्रण छूट गया और स्क्रीन पर घट रहे घटनाक्रमों में कोई तालमेल नजर नहीं आता।
असल में फिल्म से जुड़े लोग यह निर्धारित नहीं कर पाए कि वे प्रेम कहानी पर फोकस करें या ऑस्ट्रेलिया में हो रह हमलों पर। आधे-अधूरे मन से इस पर काम किया गया है। इससे लव स्टोरी में इतनी तीव्रता नजर नहीं आती कि दर्शक उनके प्रेम से प्रभावित हो और न ही नस्लीय हमलों के इश्यू को ठीक से उठाया गया है।
मोहित सूरी ने यह मान लिया कि इमरान हाशमी फिल्म हैं इसलिए दर्शक हॉट या बोल्ड सीन की आशा लिए आएँगे। इसलिए उन्होंने इस तरह के दृश्यों को बिना कहानी में जगह बनाए ठूँस दिया है।
फिल्म के किरदारों को भी ठीक से नहीं लिखा गया है। इमरान हाशमी अभिनीत किरदार जय/सूरज के पिता वाला प्रसंग अधूरा सा लगता है। वह प्यार करता है सुहानी को, लेकिन सोता है निकोल के साथ। उसकी अच्छाई और बुराई के बीच की उलझन को भी ठीक से स्पष्ट नहीं किया गया है। सुहानी के भाई समर्थ के किरदार को समझना भी टेढ़ी खीर है।
नस्लीय मामले में लेखक ने भारतीयों को दोषी ठहरा दिया है और वो भी बिना किसी ठोस कारण के, इससे फिल्म देखने का मजा और खराब हो जाता है। इमरान हाशमी के दोस्तों के जरिये हँसाने की कोशिश की गई है जो बेहद बनावटी लगती है और चिढ़ पैदा करती है।
‘जहर’ और ‘वो लम्हें’ जैसी फिल्में बना चुके और बड़ी-बड़ी बातें करने वाले निर्देशक मोहित सूरी का निर्देशन भी घटिया है। एक खराब लिखे स्क्रीनप्ले को उन्होंने बेहद खराब तरीके से पेश किया है। दृश्यों में तालमेल का अभाव है।
इमरान हाशमी और नेहा शर्मा का अभिनय अच्छे से बुरे के बीच झूलता रहता है। अर्जन बाजवा और शेला एलेन असर छोड़ते हैं। प्रीतम ने कुछ अच्छी धुनें बनाई है। कुल मिलाकर ‘क्रूक : इट्स गुड टू बी बैड’ बुरी और बोरिंग फिल्म है।

निर्माता : मुकेश भट्ट
निर्देशक : मोहित सूरी
संगीत : प्रीतम चक्रवर्ती
कलाकार : इमरान हाशमी, नेहा शर्मा, अर्जन बाजवा, गुलशन ग्रोवर, शेला एलेन
मोहित सूरी द्वारा निर्देशित फिल्म ‘क्रुक’ इतनी बुरी फिल्म है कि सिनेमाघर में बैठना मुश्किल हो जाता है।
लव स्टोरी की बैकड्रॉप में सामयिक घटनाएँ डालकर फिल्म बनाना इन दिनों फिल्मकारों को बेहद पसंद आ रहा है। ऑस्ट्रेलिया में भारतीयों पर कुछ महीनों पहले हमले हुए थे और अभी भी यह मामला पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। इसी को आधार बनाकर ‘क्रुक’ की कहानी का तानाबाना बुना गया है।
प्रेम कहानी, नस्लीय हमले, सेक्सी सीन, फिल्म के हीरो का अच्छाई और बुराई को लेकर असमंजस जैसे कई ट्रेक्स पर फिल्म चलती है और इन सबको समेटना स्क्रीनप्ले राइटर अंकुर तिवारी और निर्देशक मोहित सूरी के लिए मुश्किल हो गया।
फिल्म पर से पूरी तरह उनका नियंत्रण छूट गया और स्क्रीन पर घट रहे घटनाक्रमों में कोई तालमेल नजर नहीं आता।
असल में फिल्म से जुड़े लोग यह निर्धारित नहीं कर पाए कि वे प्रेम कहानी पर फोकस करें या ऑस्ट्रेलिया में हो रह हमलों पर। आधे-अधूरे मन से इस पर काम किया गया है। इससे लव स्टोरी में इतनी तीव्रता नजर नहीं आती कि दर्शक उनके प्रेम से प्रभावित हो और न ही नस्लीय हमलों के इश्यू को ठीक से उठाया गया है।
मोहित सूरी ने यह मान लिया कि इमरान हाशमी फिल्म हैं इसलिए दर्शक हॉट या बोल्ड सीन की आशा लिए आएँगे। इसलिए उन्होंने इस तरह के दृश्यों को बिना कहानी में जगह बनाए ठूँस दिया है।
फिल्म के किरदारों को भी ठीक से नहीं लिखा गया है। इमरान हाशमी अभिनीत किरदार जय/सूरज के पिता वाला प्रसंग अधूरा सा लगता है। वह प्यार करता है सुहानी को, लेकिन सोता है निकोल के साथ। उसकी अच्छाई और बुराई के बीच की उलझन को भी ठीक से स्पष्ट नहीं किया गया है। सुहानी के भाई समर्थ के किरदार को समझना भी टेढ़ी खीर है।
नस्लीय मामले में लेखक ने भारतीयों को दोषी ठहरा दिया है और वो भी बिना किसी ठोस कारण के, इससे फिल्म देखने का मजा और खराब हो जाता है। इमरान हाशमी के दोस्तों के जरिये हँसाने की कोशिश की गई है जो बेहद बनावटी लगती है और चिढ़ पैदा करती है।
‘जहर’ और ‘वो लम्हें’ जैसी फिल्में बना चुके और बड़ी-बड़ी बातें करने वाले निर्देशक मोहित सूरी का निर्देशन भी घटिया है। एक खराब लिखे स्क्रीनप्ले को उन्होंने बेहद खराब तरीके से पेश किया है। दृश्यों में तालमेल का अभाव है।
इमरान हाशमी और नेहा शर्मा का अभिनय अच्छे से बुरे के बीच झूलता रहता है। अर्जन बाजवा और शेला एलेन असर छोड़ते हैं। प्रीतम ने कुछ अच्छी धुनें बनाई है। कुल मिलाकर ‘क्रूक : इट्स गुड टू बी बैड’ बुरी और बोरिंग फिल्म है।
सोमवार, 4 अक्टूबर 2010
गुरुवार, 30 सितंबर 2010
खामोश मिलन (कविता)
आज
जबकि ये तय है
कि हमें बिछड़ जाना है
हमारे और तुम्हारे रास्ते
अलग अलग हो चुके हैं
तो
ये सोचना जरूरी है
कि हम गलत थे
या तुम?
मैं सोचता हूँ
और सोचता चला जाता हूँ...
कहीं मैं तो गलत नहीं था
शायद !
क्योंकि तुम तो गलत हो नहीं सकते
मुझे लगता है
मैं ही गलत था
मैं ये भी जानता हूँ
कि
तुम भी यही सोच रही हो
कि कहीं तुम तो गलत नहीं थी?
सच मानो-
रास्ते आज भले ही अलग-अलग हो गए हों
पर
न मैं गलत था
और न ही तुम।
फिर ये जुदाई क्यों?
ये प्रश्न बार बार कौंध जाता है
मेरे जेहन में .
मैं सोचने लगता हूँ...
जमीं आसमां नहीं मिलते
( विज्ञान में यही पढ़ा है
पर विज्ञान कुछ भी कहे )
जमीं आसमां मिलते हैं
एक छोर से मिलते हुए
वे जुदा होते हैं
और
फिर मिल जाते हैं
सच्चाई यही है कि
चारो दिशाओं में
वे एक हैं.
बीच में हम जैसे लोग हैं
जो ये समझते हैं कि
जमीं आसमां एक नहीं हैं.
करोड़ों तारों की तपिश
अपने कलेजे में रखने वाला आसमां
और
अरबों लातों की मार सहने वाली धरती
एक हैं।
फिर हम तुम जुदा कैसे?
हम मिलकर चले थे,
आज जुदा हैं..
पर आगे फिर मिलेंगे।
हाँ !
उसके बाद जुदाई नहीं होगी
क्योंकि
जितना दर्द तुमने अपने कलेजे में छुपा कर रखा है
उतना ही शायद मैंने भी।
और दर्द सीने में दबाये रखने वाले
एक होकर रहते हैं
वो भी ऐसे
जैसे दूर क्षितिज पर
जमीं और आसमां
जहाँ से वे अलग नहीं होते।
मैं तुम्हें रुकने को नहीं कहूँगा
और न ही मिलने को कहूँगा
पर हम फिर मिलेंगे
उसी ख़ामोशी से जैसे पहले मिले थे।
हाँ !
ये मिलन खामोश होगा
क्योंकि
जिनके कलेजे में दर्द होता है
उनकी जुबां नहीं हिलती
बिलकुल मेरी तरह....
बिलकुल तुम्हारी तरह.....
जबकि ये तय है
कि हमें बिछड़ जाना है
हमारे और तुम्हारे रास्ते
अलग अलग हो चुके हैं
तो
ये सोचना जरूरी है
कि हम गलत थे
या तुम?
मैं सोचता हूँ
और सोचता चला जाता हूँ...
कहीं मैं तो गलत नहीं था
शायद !
क्योंकि तुम तो गलत हो नहीं सकते
मुझे लगता है
मैं ही गलत था
मैं ये भी जानता हूँ
कि
तुम भी यही सोच रही हो
कि कहीं तुम तो गलत नहीं थी?
सच मानो-
रास्ते आज भले ही अलग-अलग हो गए हों
पर
न मैं गलत था
और न ही तुम।
फिर ये जुदाई क्यों?
ये प्रश्न बार बार कौंध जाता है
मेरे जेहन में .
मैं सोचने लगता हूँ...
जमीं आसमां नहीं मिलते
( विज्ञान में यही पढ़ा है
पर विज्ञान कुछ भी कहे )
जमीं आसमां मिलते हैं
एक छोर से मिलते हुए
वे जुदा होते हैं
और
फिर मिल जाते हैं
सच्चाई यही है कि
चारो दिशाओं में
वे एक हैं.
बीच में हम जैसे लोग हैं
जो ये समझते हैं कि
जमीं आसमां एक नहीं हैं.
करोड़ों तारों की तपिश
अपने कलेजे में रखने वाला आसमां
और
अरबों लातों की मार सहने वाली धरती
एक हैं।
फिर हम तुम जुदा कैसे?
हम मिलकर चले थे,
आज जुदा हैं..
पर आगे फिर मिलेंगे।
हाँ !
उसके बाद जुदाई नहीं होगी
क्योंकि
जितना दर्द तुमने अपने कलेजे में छुपा कर रखा है
उतना ही शायद मैंने भी।
और दर्द सीने में दबाये रखने वाले
एक होकर रहते हैं
वो भी ऐसे
जैसे दूर क्षितिज पर
जमीं और आसमां
जहाँ से वे अलग नहीं होते।
मैं तुम्हें रुकने को नहीं कहूँगा
और न ही मिलने को कहूँगा
पर हम फिर मिलेंगे
उसी ख़ामोशी से जैसे पहले मिले थे।
हाँ !
ये मिलन खामोश होगा
क्योंकि
जिनके कलेजे में दर्द होता है
उनकी जुबां नहीं हिलती
बिलकुल मेरी तरह....
बिलकुल तुम्हारी तरह.....
मोहम्मद रफी : कुछ अनजाने तथ्य
हिन्दी फिल्मी गीतों के लिए कभी अपरिहार्य नाम मोहम्मद रफी की आवाज़ को लोग आज भी याद करते हैं और उतनी ही चाव से सुनते हैं. उनकी जिंदगी से जुड़े कुछ रोचक तथ्य:
बचपन में वे फीका के नाम से जाने जाते थे.
रफी के जीजा मोहम्मद हामिद ने उनकी गायकी की प्रतिभा को पहचाना और उन्हें गाने को प्रोत्साहित किया था
13 वर्ष की उम्र में रफी ने पहली बार गाना गया था
रफी के परिवार का लाहौर में सलून था
रफी ने अपने फिल्मी करियर की शुरूआत 1941 में गुल बलोच से की थी
रफी मानते थे कि उनका पहला हिन्दी गाना "अजी दिल हो काबू में" था जो कि 1945 में बनी फिल्म गावँ की गोरी में था
1945 में उन्होनें अपनी चचेरी बहन बशिरा से विवाह किया
रफी ने मात्र नौशाद के लिए कुल 149 गाने गाए.
रफी ने सबसे अधिक गाने लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के लिए गाए [369]
रफी के द्वारा गाया गया गाना "मन तडपत है हरी दर्शन को आज" इस वजह से भी प्रसिद्ध है क्योंकि इसके लेखक [शकील बदायूँ], संगीत निर्देशक [नौशाद] और गायक [मो. रफी] तीनों मुस्लिम थे
रफी ने अपना पहला फिल्मफेयर पुरस्कार "चौदवीं का चाँद" गीत के लिए प्राप्त किया था
1965 मे उनको "पद्मश्री" दिया गया
रफी का गाया अंतिम गाना "शाम फिर क्यो उदास है" था
31 जुलाई 1980 को दिल का दौरा पड़ने से उनका देहांत हुआ वे अपने पीछे सात संतान [सईद रफी, खालिद रफी, हामिद रफी, शाहिद रफी, परवीन, नसरीन और यास्मीन] और 18 पोते पोतियाँ छोड गएउनके निधन पर भारत सरकार ने दो दिन का राष्ट्रीय शोक रखा
बचपन में वे फीका के नाम से जाने जाते थे.
रफी के जीजा मोहम्मद हामिद ने उनकी गायकी की प्रतिभा को पहचाना और उन्हें गाने को प्रोत्साहित किया था
13 वर्ष की उम्र में रफी ने पहली बार गाना गया था
रफी के परिवार का लाहौर में सलून था
रफी ने अपने फिल्मी करियर की शुरूआत 1941 में गुल बलोच से की थी
रफी मानते थे कि उनका पहला हिन्दी गाना "अजी दिल हो काबू में" था जो कि 1945 में बनी फिल्म गावँ की गोरी में था
1945 में उन्होनें अपनी चचेरी बहन बशिरा से विवाह किया
रफी ने मात्र नौशाद के लिए कुल 149 गाने गाए.
रफी ने सबसे अधिक गाने लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के लिए गाए [369]
रफी के द्वारा गाया गया गाना "मन तडपत है हरी दर्शन को आज" इस वजह से भी प्रसिद्ध है क्योंकि इसके लेखक [शकील बदायूँ], संगीत निर्देशक [नौशाद] और गायक [मो. रफी] तीनों मुस्लिम थे
रफी ने अपना पहला फिल्मफेयर पुरस्कार "चौदवीं का चाँद" गीत के लिए प्राप्त किया था
1965 मे उनको "पद्मश्री" दिया गया
रफी का गाया अंतिम गाना "शाम फिर क्यो उदास है" था
31 जुलाई 1980 को दिल का दौरा पड़ने से उनका देहांत हुआ वे अपने पीछे सात संतान [सईद रफी, खालिद रफी, हामिद रफी, शाहिद रफी, परवीन, नसरीन और यास्मीन] और 18 पोते पोतियाँ छोड गएउनके निधन पर भारत सरकार ने दो दिन का राष्ट्रीय शोक रखा
बुधवार, 22 सितंबर 2010
ई कवन चाल हवे मार के पलट गईल (भोजपुरी ग़ज़ल )
जाड़ जब आवे त लगे आके सट गईल
ई कवन चाल हवे मार के पलट गईल
झूठ बोल के झगरा लगा दिहलस छिनरी
पूछे जब गईनी त बात से उलट गईल
गाछ पर चढ़ाके कहलस कूदs हम बचा लेब
कूद जब गईनी त धीरे से हट गईल
डोरा मांगी पईंचा हम खूब ढिल्ली छोड़नी
दोसरा से फंस के पतंग हमार कट गईल
फुहरी के लईका के संगे रही -रही के
गारी हमार बाबू त सुग्गा नियर रट गईल
पास हम कर गईनी बिना कुछ पढ़ले
जे रहे पढ़ले ऊ परीक्षा से छंट गईल
मार -काट दंगे में निकलल बा नतीजा
मियां के लईकी अगर हिन्दू से पट गईल
आपन जे ठुकरईली पिरितिया हमार
भगवानो पर से विस्वास हमार हट गईल
ई कवन चाल हवे मार के पलट गईल
झूठ बोल के झगरा लगा दिहलस छिनरी
पूछे जब गईनी त बात से उलट गईल
गाछ पर चढ़ाके कहलस कूदs हम बचा लेब
कूद जब गईनी त धीरे से हट गईल
डोरा मांगी पईंचा हम खूब ढिल्ली छोड़नी
दोसरा से फंस के पतंग हमार कट गईल
फुहरी के लईका के संगे रही -रही के
गारी हमार बाबू त सुग्गा नियर रट गईल
पास हम कर गईनी बिना कुछ पढ़ले
जे रहे पढ़ले ऊ परीक्षा से छंट गईल
मार -काट दंगे में निकलल बा नतीजा
मियां के लईकी अगर हिन्दू से पट गईल
आपन जे ठुकरईली पिरितिया हमार
भगवानो पर से विस्वास हमार हट गईल
तेरी जय हो गणेश
गणेश के बारे में बताया जाता है कि शुरू में वे निहायत उपद्रवी और उदंड देवता थे -लूटपाट उनकी सहज गतिविधि थी .जहाँ भी कोई पूजा पाठ ,हवन-यज्ञं होता ,वे अपने गणों को लेकर पहुँच जाते और सारे आयोजन को तहस- नहस कर डालते ,आधा खाते, आधा उड़ाते और जो कुछ ले जा सकते थे उसे समेटकर ही वहाँ से टलते .कोई भी आयोजन करते हुवे लोग डरते थे ,कहीं गणेश न आ जाये ...हो सकता है उन्होंने शिव जी से भी शिकायत की हो;मगर हर असमर्थ पिता की तरह उन्होंने भी लाचारी जताई हो: "वह मेरे कहने में थोड़े ही है ....सुनता कहाँ है किसी की ...."इस तरह चारो तरफ गणेश का आतंक था .कोई भी मंगल कार्य करते हुवे गणेश का हिस्सा निकालकर बाहर ही रखवा दिया जाता कि वहीं से ले जाये ...कुछ खिला-पिला कर ख़ातिर वातिर भी कर दी जाती होगी .इस तरह कालांतर में उपद्रव और अमंगल की साक्षात् मूर्ति गणेश अपनी भ्योत्पद्कता के कारण ही पूजे जाने लगे और फिर तो उन्हें मंगलकारी ,विघ्नविनाशक और न जाने क्या-क्या विरुदावलियाँ मिलने लगीं .वे सुरक्षा और शांति के विग्रह बने .
कल तक मुहल्ले के जिस दादा के नाम से लोग थर -थर कांपते थे ,जो कहीं भी हत्या और बलात्कार करा सकता था ,वह अपनी शरण में लेकर सबसे बड़ा रक्षक बन जाता है ---बस उसे उसका हफ्ता पहुंचाते रहिये .कुछ और चाहे तो वो भी मुहैया करा दीजिये .जब तक आप उसे खुश रखेंगे पैर फटकार चैन की नींद सोयेंगे .दूसरा कोई आपका बाल भी बांका नही कर सकता .इतिहास के सारे राजा महाराजा पहले सबसे बड़े लुटेरे और इलाके के आतंकवादी थे जो बाद में अपने राज्य स्थापित कर चुकने पर सबसे बड़े धर्म रक्षक,प्रजा -वत्सल ,न्याय प्रिय और विश्वविजयी महाराजाधिराज के रूप में पूजे गये .स्वयं ईश्वर का जन्म इसी अनिष्ट के भय से हुआ था
कल तक मुहल्ले के जिस दादा के नाम से लोग थर -थर कांपते थे ,जो कहीं भी हत्या और बलात्कार करा सकता था ,वह अपनी शरण में लेकर सबसे बड़ा रक्षक बन जाता है ---बस उसे उसका हफ्ता पहुंचाते रहिये .कुछ और चाहे तो वो भी मुहैया करा दीजिये .जब तक आप उसे खुश रखेंगे पैर फटकार चैन की नींद सोयेंगे .दूसरा कोई आपका बाल भी बांका नही कर सकता .इतिहास के सारे राजा महाराजा पहले सबसे बड़े लुटेरे और इलाके के आतंकवादी थे जो बाद में अपने राज्य स्थापित कर चुकने पर सबसे बड़े धर्म रक्षक,प्रजा -वत्सल ,न्याय प्रिय और विश्वविजयी महाराजाधिराज के रूप में पूजे गये .स्वयं ईश्वर का जन्म इसी अनिष्ट के भय से हुआ था
मंगलवार, 21 सितंबर 2010
कल रात भूल हो गयी उनसे
गर्भनिरोधक की हर खोज ने स्त्री को कुछ और मुक्ति दी है, कुछ और विकल्प दिया है . जीवन जीने की शैली का चुनाव, बच्चे होँ या न होँ , होँ तो कितने और कब? यह सब चुनाव तभी सम्भव हुआ जबसे गर्भनिरोधक का विकल्प उसे मिला. उससे पहले यदि विकल्प नाम की कोई वस्तु थी तो केवल विवाह करना या न करना हीँ .
अब यह नई इमरजेंसी गोली आ गयी है . इसके विज्ञापन में हीं कहा जाता है कि यह गर्भपात से बेहतर है. जो की गलत नहीं हो सकता. लेकिन क्या सथ मेँ यह न्ही बताया जाना चाहिए कि यह केवल अपातकाल के लिए है. इसका गर्भनिरोधक की तरह उपयोग नही होना चाहिए ? कोई जीवनकाल मेँ दो चार बार ले ले , तो समझा जा सकता है किंतु इसे बार-बार लिया जाए तो यह अपने शरीर के हार्मोंस के साथ खिलवाड है. कहीँ भी इसे नही बताया जाता कि कहुन इसे ना ले.
सिरदर्द की गोली की तरह यदि स्त्रियाँ इसका उपयोग करने लगेंगी तो इसका दिर्घकालिन परिणाम क्या होगा? शायद हमेँ पता नही है . हो सकता है कि गोली लेने के बाद केवल छोटो मोटे दुष्परिणाम हीँ होते होँ जैसे मितली, चक्कर , सिरदर्द फिर भी एक दुष्परिणाम होने का भय तो है हीँ . ठिक वैसे ही जैसे हर अच्छी वस्तु के साथ होता है. यह दो परिणाम हैँ ” यौन रोग” और पुरूष का अपने उत्तरदायित्व से मुँह मोडना .
यह बाज़ार की नई साजिश है. जो प्रो- मेन है . अब वह सोच सकते हैँ कि कोई गलती हुई तो यह गोली तो है न ! होना यह चाहिए की तम्बाकु उत्पादोँ के विज्ञापनोँकी तरह हीँ , इस गोली के विज्ञापन के साथ भी चेतावनी दिखाई जानी चाहिए . यह गोली बलात्कार या अन्य किसी आपदा मेँ वरदान साबित हो सकती है, किन्तु नियमित उपयोग के लिए नही है, यह ध्यान रखना चाहिए . जैसे हम हर स्थिति से निबटने के लिए प्लान “ए” और प्लान “बी” भी बनाते हैँ , वैसे हीँ यह गोली केवल प्लान बी हो सकती है. स्त्रियाँ वैसे हीँ अपने स्वास्थ्य के प्रति लापरवाह होती हैँ. कहीँ यह आपातकालिन गर्भनिरोधक गोली कोई आपदा हीँ न ले आए.
सलाना करीब 82 लाख गोलीयोँ की बिक्री को देखते हुए , दवा कम्पनियाँ , इसका खुब विज्ञापन कर रही हैँ , लेकिन दुरउपयोग को रोकने के बारे मेँ ज्यादा जागरूकता नही पैदा की जा रही. विज्ञापनोँ के चलते जो लोग इस बात को जान गयेँ हैँ , कि ये गोलियाँ , अनचाहे गर्भ को रोकती हैँ , लेकिन आपातकाल शब्द पर जोर नही दिया जा रहा है. सिप्ला की आई- पिल भारत मेँ सबसे ज्यादा बिकने वाला ब्राँड है, जबकी दूसरे ब्राँडो मेँ मैनकाइन्ड फार्मा का अन्वांटेड 72 तथा अन्य ब्रान्ड भी हैँ .
डॉक्टरोँ का बडा वर्ग , इनकी खुलेआम बिक्री का समर्थन करता है, हलांकि कुछ डॉक्टरोँ का मानना है कि इन्हे डॉक्टर की सलाह पर दिया जाना चाहिए. लोगोँ को समझना चाहिए कि एक आई-पिल नियमित गर्भनिरोधकोँ का विकल्प नही हो सकती. इसके साथ हीँ इसका इस्तेमाल आपातकाल मेँ ही करना चाहिए जिसका आशय पैदा किए गये आपातकाल से कतई नही है. यह गोलीयाँ एड्स का खतरा भी पैदा कर सकती हैँ . इन दवाओँ के बारे मेँ जरूरी निर्देषोँ को स्पष्ट रूप से प्रकाशित करने की तत्काल जरूरत है. साथ हीँ इनके दुष्प्रभावोँ और वैधानिक चेतावनी के बारे मेँ बताया जाना चाहिए . इससे इनका दुरउपयोग रूकेगा.ऐसा नही है कि इससे पहले महिलाओँ के लिए कोइ गर्भनिरोधक दवाई बाज़ार मेँ नही आई. लेकिन अब सिर्फ 72 घंटे मेँ ही सुरक्षा की गारंटी देती यह दवाईयाँ अपना युएसपी, इसे ही बना रही हैँ . सामाजिक मनोवोज्ञान के जानकार, इसके अन्य पहलूओँ को गम्भीरता से लेते हैँ , उनका मानना है , कि तेजी से बदलते भारत मेँ , इसका नुकसान ज्यादा है .
सिप्ला की वेबसाईट पर निचे गुलाबी रंग से यह साफ-साफ लिखा हुआ है: – इसका उपयोग डॉक्टरी सलाह पर हीँ किया जा सकता है ! साथ हीँ कम्पनी यह लिखना भी नही भूली है कि यह गोली गर्भपात की गोली नही है. भारत मेँ जहाँ नाम भर लिख लेने वालो को सक्षर मान लिया जाता है , वहाँ शिक्षा का प्रतिशत मात्र 64% है . ऐसे मेँ उन्हे अच्छा-बुरा कौन समझाएगा.
हलांकि इस विषय पर बहुत कुछ लिखा जा सकता है पर बेशर्मी की हद पार चुके व्यपार जगत से ज्यादा गुस्सा देश को दशा देने का दावा करने वाले न्यूज़ चैनल और अखाबारोँ मेँ इसके विज्ञापन को देख कर आता है . क्या दिखा रहेँ है यह लोग , अनचाहे गर्भ से मुक्ति दिलाने वाली गोलियोँ का विज्ञापन?
” मैँ अभी प्रेगनेंट नही होना चाहती हूँ – ” की पंच लाइन के साथ कल रात भूल हो गई? गोली खाइये और भूल से छुटकारा. और ऐसी गोलियाँ हैँ , तो डर किस बात का ? करिये भूल और अनचाहे गर्भ से मुक्ति ! क्या बेच रहे हो ? अनचाहे गर्भ से मुक्ति की गारंटी? क्या सिखा रहे हो ? – उन्मुक्त यौनाचार !
आज यह पिल्स युवाओँ की जरूरत बनती जा रही हैँ , इस पिल्स का मीडिया मेँ किया गया धुआँधार प्रचार जिसके कारण आज इस मॉर्निँग पिल्स का इस्तेमाल पार्ंपरिक गर्भ निरोधक के रूप मेँ किया जा रहा है . इसके कई दुष्प्रभाव हैँ . कम्पनी के अनुसार 72 घंटे के अनदर इस पिल्स का सेवन कर अनचाहे गर्भ से मुक्ति पाई जा सकती है. गोली लेनी से प्रेगनेंट होने की सम्भावना 69% तक घट जाती है . देखा गया है कि आजकल की कामकाजी महिलायेँ , इन पिल्स का बेखौफ और लापरवाही के साथ गर्भनिरोधक के रूप मेँ इस्तेमाल कर रही हैँ . यदि रोजाना सेक्स का आनन्द लेता है या लेना चाहता है तो इमरजेंसी पिल्स का सेवन ना करे. यह पिल्स एच. आई. वी से भी रक्षा नही करती . यह पिल्स कंडोम या बर्थ कंडोम की तरह नही है .
अनचाहे गर्भ से छुटकारा पाने के लिए अविवाहित लडकियाँ भी इस्तेमाल करने लगी हैँ . लड्कियाँ इसे एबार्शन पिल्स की तरह इस्तेमाल करती हैँ . सम्बन्ध बनाने के अगले दिन वह बेधडक इस पिल्स को खा लेती हैँ . जैसे रात को कुछ हुआ हीँ न हो , बस एक भूल के अलावा!
टी वी और मीडिया हमे एड्वांस बना रहे हैँ. और दवाई कम्पनियाँ अपना मुनाफा देख रहीँ है, अब ऐसे विज्ञापन आने पर अगर अपने पिता के साथ बैठी हो तो टी वी बन्द करने की जरूरत नही. अब आप देखिए खुशी से कल रात भूल करने और प्रेगनेंट नही होने के नुस्खे !
अब यह नई इमरजेंसी गोली आ गयी है . इसके विज्ञापन में हीं कहा जाता है कि यह गर्भपात से बेहतर है. जो की गलत नहीं हो सकता. लेकिन क्या सथ मेँ यह न्ही बताया जाना चाहिए कि यह केवल अपातकाल के लिए है. इसका गर्भनिरोधक की तरह उपयोग नही होना चाहिए ? कोई जीवनकाल मेँ दो चार बार ले ले , तो समझा जा सकता है किंतु इसे बार-बार लिया जाए तो यह अपने शरीर के हार्मोंस के साथ खिलवाड है. कहीँ भी इसे नही बताया जाता कि कहुन इसे ना ले.
सिरदर्द की गोली की तरह यदि स्त्रियाँ इसका उपयोग करने लगेंगी तो इसका दिर्घकालिन परिणाम क्या होगा? शायद हमेँ पता नही है . हो सकता है कि गोली लेने के बाद केवल छोटो मोटे दुष्परिणाम हीँ होते होँ जैसे मितली, चक्कर , सिरदर्द फिर भी एक दुष्परिणाम होने का भय तो है हीँ . ठिक वैसे ही जैसे हर अच्छी वस्तु के साथ होता है. यह दो परिणाम हैँ ” यौन रोग” और पुरूष का अपने उत्तरदायित्व से मुँह मोडना .
यह बाज़ार की नई साजिश है. जो प्रो- मेन है . अब वह सोच सकते हैँ कि कोई गलती हुई तो यह गोली तो है न ! होना यह चाहिए की तम्बाकु उत्पादोँ के विज्ञापनोँकी तरह हीँ , इस गोली के विज्ञापन के साथ भी चेतावनी दिखाई जानी चाहिए . यह गोली बलात्कार या अन्य किसी आपदा मेँ वरदान साबित हो सकती है, किन्तु नियमित उपयोग के लिए नही है, यह ध्यान रखना चाहिए . जैसे हम हर स्थिति से निबटने के लिए प्लान “ए” और प्लान “बी” भी बनाते हैँ , वैसे हीँ यह गोली केवल प्लान बी हो सकती है. स्त्रियाँ वैसे हीँ अपने स्वास्थ्य के प्रति लापरवाह होती हैँ. कहीँ यह आपातकालिन गर्भनिरोधक गोली कोई आपदा हीँ न ले आए.
सलाना करीब 82 लाख गोलीयोँ की बिक्री को देखते हुए , दवा कम्पनियाँ , इसका खुब विज्ञापन कर रही हैँ , लेकिन दुरउपयोग को रोकने के बारे मेँ ज्यादा जागरूकता नही पैदा की जा रही. विज्ञापनोँ के चलते जो लोग इस बात को जान गयेँ हैँ , कि ये गोलियाँ , अनचाहे गर्भ को रोकती हैँ , लेकिन आपातकाल शब्द पर जोर नही दिया जा रहा है. सिप्ला की आई- पिल भारत मेँ सबसे ज्यादा बिकने वाला ब्राँड है, जबकी दूसरे ब्राँडो मेँ मैनकाइन्ड फार्मा का अन्वांटेड 72 तथा अन्य ब्रान्ड भी हैँ .
डॉक्टरोँ का बडा वर्ग , इनकी खुलेआम बिक्री का समर्थन करता है, हलांकि कुछ डॉक्टरोँ का मानना है कि इन्हे डॉक्टर की सलाह पर दिया जाना चाहिए. लोगोँ को समझना चाहिए कि एक आई-पिल नियमित गर्भनिरोधकोँ का विकल्प नही हो सकती. इसके साथ हीँ इसका इस्तेमाल आपातकाल मेँ ही करना चाहिए जिसका आशय पैदा किए गये आपातकाल से कतई नही है. यह गोलीयाँ एड्स का खतरा भी पैदा कर सकती हैँ . इन दवाओँ के बारे मेँ जरूरी निर्देषोँ को स्पष्ट रूप से प्रकाशित करने की तत्काल जरूरत है. साथ हीँ इनके दुष्प्रभावोँ और वैधानिक चेतावनी के बारे मेँ बताया जाना चाहिए . इससे इनका दुरउपयोग रूकेगा.ऐसा नही है कि इससे पहले महिलाओँ के लिए कोइ गर्भनिरोधक दवाई बाज़ार मेँ नही आई. लेकिन अब सिर्फ 72 घंटे मेँ ही सुरक्षा की गारंटी देती यह दवाईयाँ अपना युएसपी, इसे ही बना रही हैँ . सामाजिक मनोवोज्ञान के जानकार, इसके अन्य पहलूओँ को गम्भीरता से लेते हैँ , उनका मानना है , कि तेजी से बदलते भारत मेँ , इसका नुकसान ज्यादा है .
सिप्ला की वेबसाईट पर निचे गुलाबी रंग से यह साफ-साफ लिखा हुआ है: – इसका उपयोग डॉक्टरी सलाह पर हीँ किया जा सकता है ! साथ हीँ कम्पनी यह लिखना भी नही भूली है कि यह गोली गर्भपात की गोली नही है. भारत मेँ जहाँ नाम भर लिख लेने वालो को सक्षर मान लिया जाता है , वहाँ शिक्षा का प्रतिशत मात्र 64% है . ऐसे मेँ उन्हे अच्छा-बुरा कौन समझाएगा.
हलांकि इस विषय पर बहुत कुछ लिखा जा सकता है पर बेशर्मी की हद पार चुके व्यपार जगत से ज्यादा गुस्सा देश को दशा देने का दावा करने वाले न्यूज़ चैनल और अखाबारोँ मेँ इसके विज्ञापन को देख कर आता है . क्या दिखा रहेँ है यह लोग , अनचाहे गर्भ से मुक्ति दिलाने वाली गोलियोँ का विज्ञापन?
” मैँ अभी प्रेगनेंट नही होना चाहती हूँ – ” की पंच लाइन के साथ कल रात भूल हो गई? गोली खाइये और भूल से छुटकारा. और ऐसी गोलियाँ हैँ , तो डर किस बात का ? करिये भूल और अनचाहे गर्भ से मुक्ति ! क्या बेच रहे हो ? अनचाहे गर्भ से मुक्ति की गारंटी? क्या सिखा रहे हो ? – उन्मुक्त यौनाचार !
आज यह पिल्स युवाओँ की जरूरत बनती जा रही हैँ , इस पिल्स का मीडिया मेँ किया गया धुआँधार प्रचार जिसके कारण आज इस मॉर्निँग पिल्स का इस्तेमाल पार्ंपरिक गर्भ निरोधक के रूप मेँ किया जा रहा है . इसके कई दुष्प्रभाव हैँ . कम्पनी के अनुसार 72 घंटे के अनदर इस पिल्स का सेवन कर अनचाहे गर्भ से मुक्ति पाई जा सकती है. गोली लेनी से प्रेगनेंट होने की सम्भावना 69% तक घट जाती है . देखा गया है कि आजकल की कामकाजी महिलायेँ , इन पिल्स का बेखौफ और लापरवाही के साथ गर्भनिरोधक के रूप मेँ इस्तेमाल कर रही हैँ . यदि रोजाना सेक्स का आनन्द लेता है या लेना चाहता है तो इमरजेंसी पिल्स का सेवन ना करे. यह पिल्स एच. आई. वी से भी रक्षा नही करती . यह पिल्स कंडोम या बर्थ कंडोम की तरह नही है .
अनचाहे गर्भ से छुटकारा पाने के लिए अविवाहित लडकियाँ भी इस्तेमाल करने लगी हैँ . लड्कियाँ इसे एबार्शन पिल्स की तरह इस्तेमाल करती हैँ . सम्बन्ध बनाने के अगले दिन वह बेधडक इस पिल्स को खा लेती हैँ . जैसे रात को कुछ हुआ हीँ न हो , बस एक भूल के अलावा!
टी वी और मीडिया हमे एड्वांस बना रहे हैँ. और दवाई कम्पनियाँ अपना मुनाफा देख रहीँ है, अब ऐसे विज्ञापन आने पर अगर अपने पिता के साथ बैठी हो तो टी वी बन्द करने की जरूरत नही. अब आप देखिए खुशी से कल रात भूल करने और प्रेगनेंट नही होने के नुस्खे !
सोमवार, 20 सितंबर 2010
बिहार चुनाव से देश को बड़ी उम्मीद है.
इस बार के विधानसभा चुनाव में बिहार नया इतिहास लिखने जा रहा है. यहां की बहुमत आबादी ने मन बना लिया है. लोग जाति की राजनीति की सीमाएं देख चुके हैं. और इस बार वे जाति की राजनीति करनेवालों को सबक सिखायेंगे. पिछले पांच वर्षो व उसके पहले के पंद्रह वर्षो के शासन का अंतर लोग साफ़-साफ़ देख रहे हैं.
अंतर ऐसा झलक रहा है कि दूसरे प्रदेशों यहां तक कि विदेश के भी लोग बिहार के बदलाव को महसूस कर रहे हैं. वह चाहे सड़क का मामला हो या कानून-व्यवस्था या फ़िर शिक्षा का-हर जगह विकास दिख रहा है. इसीलिए आनेवाला चुनाव बहुत हद तक जाति आधारित नहीं होने जा रहा है. एक तरह से कहें तो बिहार में अंदर ही अंदर साइलेंट मूवमेंट (चुपचाप आंदोलन) चल रहा है. 20 साल पहले जिनका जन्म हुआ वे पहली बार इस चुनाव में मतदान करेंगे.
नवनिर्माण में अपनी भूमिका बढ़-चढ़ कर निभायेंगे, क्योंकि उन्होंने यथार्थ को भोगा है. तब और अब को महसूस किया है, उसको जिया है.बिहार में कुछ लोग जातीय समीकरण बनाने की कोशिश कर रहे हैं. उन्हें लगता है कि वे अपनी जाति के बड़े नेता हैं, लेकिन वे भ्रम में हैं. अभी छपरा में महापंचायत हुई.
इसमें राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद ने प्रभुनाथ सिंह से अपनी नयी दोस्ती के बारे में कहा कि यह ब्रह्म बाबा के लासा-जैसा है. लालू जी को मालूम होना चाहिए कि ब्रह्म बाबा का लासा निर्जीव चीजों को जोड़ता है, सजीव चीजों को नहीं. प्रभुनाथ सिंह निर्जीव होंगे, तो जुड़ जायेंगे. प्रभुनाथ व लालू प्रसाद जितना कह लें, राजपूतों व यादवों का मिलन असंभव है. दोनों के बीच जमीनी स्तर पर संघर्ष है.
जमीनी स्तर का प्रतिवाद किसी लालू प्रसाद या प्रभुनाथ सिंह के प्रयास से खत्म होनेवाला नहीं है.समाज में ये दानों जातियां लाठी के मामले में भी ताकतवर हैं, लेकिन अपनी राजनीतिक प्रगति के लिए स्वाभिमान की बात भी खड़ा करती हैं. और उसे पूरा करने की ताकत दोनों नेताओं में नहीं है. जिसे सीटें नहीं मिलेंगी, वह अलग हो जायेगा. निर्दलीय खड़ा हो जायेगा.बिहार में बाहुबली-अपराधियों का अपने-अपने इलाके में राज चलता था.
विधानसभा व संसद में भी ये पहुंचते थे. आज वही बिहार बता रहा है कि ऐसे लोगों की जगह केवल जेल में है. कोई भी बाहुबली या कानून तोड़नेवाला कानून बनाने वाली संस्था का सदस्य नहीं बनेगा. बिहार का जनादेश राष्ट्रीय स्तर पर भी दिशा देगा.
राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेसनीत महंगाई, भ्रष्टाचार व आतंकवाद के कारण राजनीतिक निराशा का माहौल है. राजनीति में तीन चीजों का बड़ा महत्व है. वे हैं संघर्ष, संवाद व संपर्क. इसके साथ ही राजनीति में बाजार व पैसे का महत्व बढ़ा है. इसी कारण आम लोग राजनीति से निराश हुए हैं.
राजनीतिक दलों से लोगों की अपेक्षाएं पूरी नहीं हो रही हैं. दल रचनात्मक काम से दूर होते जा रहे हैं.1974 में भी ऐसी ही निराशा आयी थी, तब भी बिहार ने दिशा दी थी. इस चुनाव से देश को बड़ी उम्मीद है.
अंतर ऐसा झलक रहा है कि दूसरे प्रदेशों यहां तक कि विदेश के भी लोग बिहार के बदलाव को महसूस कर रहे हैं. वह चाहे सड़क का मामला हो या कानून-व्यवस्था या फ़िर शिक्षा का-हर जगह विकास दिख रहा है. इसीलिए आनेवाला चुनाव बहुत हद तक जाति आधारित नहीं होने जा रहा है. एक तरह से कहें तो बिहार में अंदर ही अंदर साइलेंट मूवमेंट (चुपचाप आंदोलन) चल रहा है. 20 साल पहले जिनका जन्म हुआ वे पहली बार इस चुनाव में मतदान करेंगे.
नवनिर्माण में अपनी भूमिका बढ़-चढ़ कर निभायेंगे, क्योंकि उन्होंने यथार्थ को भोगा है. तब और अब को महसूस किया है, उसको जिया है.बिहार में कुछ लोग जातीय समीकरण बनाने की कोशिश कर रहे हैं. उन्हें लगता है कि वे अपनी जाति के बड़े नेता हैं, लेकिन वे भ्रम में हैं. अभी छपरा में महापंचायत हुई.
इसमें राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद ने प्रभुनाथ सिंह से अपनी नयी दोस्ती के बारे में कहा कि यह ब्रह्म बाबा के लासा-जैसा है. लालू जी को मालूम होना चाहिए कि ब्रह्म बाबा का लासा निर्जीव चीजों को जोड़ता है, सजीव चीजों को नहीं. प्रभुनाथ सिंह निर्जीव होंगे, तो जुड़ जायेंगे. प्रभुनाथ व लालू प्रसाद जितना कह लें, राजपूतों व यादवों का मिलन असंभव है. दोनों के बीच जमीनी स्तर पर संघर्ष है.
जमीनी स्तर का प्रतिवाद किसी लालू प्रसाद या प्रभुनाथ सिंह के प्रयास से खत्म होनेवाला नहीं है.समाज में ये दानों जातियां लाठी के मामले में भी ताकतवर हैं, लेकिन अपनी राजनीतिक प्रगति के लिए स्वाभिमान की बात भी खड़ा करती हैं. और उसे पूरा करने की ताकत दोनों नेताओं में नहीं है. जिसे सीटें नहीं मिलेंगी, वह अलग हो जायेगा. निर्दलीय खड़ा हो जायेगा.बिहार में बाहुबली-अपराधियों का अपने-अपने इलाके में राज चलता था.
विधानसभा व संसद में भी ये पहुंचते थे. आज वही बिहार बता रहा है कि ऐसे लोगों की जगह केवल जेल में है. कोई भी बाहुबली या कानून तोड़नेवाला कानून बनाने वाली संस्था का सदस्य नहीं बनेगा. बिहार का जनादेश राष्ट्रीय स्तर पर भी दिशा देगा.
राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेसनीत महंगाई, भ्रष्टाचार व आतंकवाद के कारण राजनीतिक निराशा का माहौल है. राजनीति में तीन चीजों का बड़ा महत्व है. वे हैं संघर्ष, संवाद व संपर्क. इसके साथ ही राजनीति में बाजार व पैसे का महत्व बढ़ा है. इसी कारण आम लोग राजनीति से निराश हुए हैं.
राजनीतिक दलों से लोगों की अपेक्षाएं पूरी नहीं हो रही हैं. दल रचनात्मक काम से दूर होते जा रहे हैं.1974 में भी ऐसी ही निराशा आयी थी, तब भी बिहार ने दिशा दी थी. इस चुनाव से देश को बड़ी उम्मीद है.
रविवार, 19 सितंबर 2010
खिसी भतार पर ( भोजपुरी ग़ज़ल )
बतिया पंचे के रही
खूंटवा रहिये पे रही
अइनी दहेज लेके
अब का रोआब सहीं
खिसी भतार पर
फेंकब हांड़ी करीखही
पिया जी के लगे लिखब
चिठ्ठिया गहि-गहि
ताना मारेला लोगवा
बुढ़िया के डाइन कही
खूंटवा रहिये पे रही
अइनी दहेज लेके
अब का रोआब सहीं
खिसी भतार पर
फेंकब हांड़ी करीखही
पिया जी के लगे लिखब
चिठ्ठिया गहि-गहि
ताना मारेला लोगवा
बुढ़िया के डाइन कही
शायद ऊ तुही हऊ
हमार दसो अंगुरिया
दसु दिशा में
बहत दस गो नदी हs
एईके एक जगह
सईहार के रख दीं
त एगो समुन्दर बन सकेला
शायद ऊ
तुही हऊ
दसु दिशा में
बहत दस गो नदी हs
एईके एक जगह
सईहार के रख दीं
त एगो समुन्दर बन सकेला
शायद ऊ
तुही हऊ
शब्द कागज पर बईठते नइखे
कविता उलझल बा सीना में
मिसरा अंटकल बा ओठ पर
शब्द कागज पर बईठते नइखे
उड़त रहता तितलियन नियर
कब से बईठल बानी ये प्रिये
सादा क़ागज पर लिख के तहार नाम
बस तहरे नाम पूरा बा
का एहू से निमन कवनो कविता होई
मिसरा अंटकल बा ओठ पर
शब्द कागज पर बईठते नइखे
उड़त रहता तितलियन नियर
कब से बईठल बानी ये प्रिये
सादा क़ागज पर लिख के तहार नाम
बस तहरे नाम पूरा बा
का एहू से निमन कवनो कविता होई
शुक्रवार, 10 सितंबर 2010
थ्री ईडियट्स
एक कत्ल हुआ
बीच सड़क पर दिन-दहाड़े
शहर जगा था
पर न ठिठका, न रुका
आँखें मूंदे
बस चलता रहा
अगर होती इस शहर की
संवेदन तंत्रिका की
कुछ कोशिकाएं भी जंगरहित
तो शायद ये शहर कुछ पल
ठिठक कर देख पाता कि
मरने वाली का नाम
‘मानवता’ था
शहर को इससे क्या
उसे तो
आदत है लाशों को लांघकर
आगे बढ़ने की
पर खबर तो बन गई न
और खबरिया चेनलों की तो
निकल पड़ी
हत्या ! वो भी मानवता की
इस शहर में हो क्या रहा है?
इसने, उसने, किसने,
जिसने भी मारा
कयास और दावों का युद्ध
लड़ा जाने लगा है
और ब्रेकिंग न्यूज की सडांध
बेचकर टी आर पी कमाने वाले
खबरिया चैनल
लगे पड़े हैं ‘मानवता’ की
लाश का पोस्टमार्टम करने
पर मानवता तो मर गई
पहले चीर-हरण फिर हत्या
कृष्ण की अनुपस्थिति खेदजनक
और हत्यारा
फिर से छुप गया है, या मिल गया
या फिर घुल गया है
इसी शहर में
पर सबने देखा है हर नुक्कड़
पर बिक रहे हैं मुखौटे
भ्रष्टाचार,व्याभिचार, लालच, आतंक,
द्वेष-घृणा सबके मुखौटे उपलब्ध हैं
फिर से निकलेगा शहर की
महत्वकांक्षा की कोख में पल रहा
स्वार्थ
खरीदेगा फिर से एक मुखौटा
और फिर से होगी ‘हत्या’
हर बार की तरह फिर मरेगी
‘मानवता’
पर शहर चलता रहेगा
जिन्दा रहेगा,
पर खामोश रहेगा
गांधीजी के तीनो बन्दर
उदास हैं
सीधे, सरल वो तीन अनमोल वचन
क्या किसी कूट-भाषा का तिलस्म थे?
उसके कानों कि
ऊँचाई तक कोई पहुंच भी गया
तो यही पायेगा कि कानों पर
हाथ धरे बैठा है प्रशासन
और किसने कहा कि
क़ानून अंधा है
क्या आँखों पर हाथ रखने से
भला कोई अंधा हो जाता है
और आप जनाब?
आप क्यों चुप हैं
मुँह पर हाथ?
अरे! आप तो जनता हैं?
बीच सड़क पर दिन-दहाड़े
शहर जगा था
पर न ठिठका, न रुका
आँखें मूंदे
बस चलता रहा
अगर होती इस शहर की
संवेदन तंत्रिका की
कुछ कोशिकाएं भी जंगरहित
तो शायद ये शहर कुछ पल
ठिठक कर देख पाता कि
मरने वाली का नाम
‘मानवता’ था
शहर को इससे क्या
उसे तो
आदत है लाशों को लांघकर
आगे बढ़ने की
पर खबर तो बन गई न
और खबरिया चेनलों की तो
निकल पड़ी
हत्या ! वो भी मानवता की
इस शहर में हो क्या रहा है?
इसने, उसने, किसने,
जिसने भी मारा
कयास और दावों का युद्ध
लड़ा जाने लगा है
और ब्रेकिंग न्यूज की सडांध
बेचकर टी आर पी कमाने वाले
खबरिया चैनल
लगे पड़े हैं ‘मानवता’ की
लाश का पोस्टमार्टम करने
पर मानवता तो मर गई
पहले चीर-हरण फिर हत्या
कृष्ण की अनुपस्थिति खेदजनक
और हत्यारा
फिर से छुप गया है, या मिल गया
या फिर घुल गया है
इसी शहर में
पर सबने देखा है हर नुक्कड़
पर बिक रहे हैं मुखौटे
भ्रष्टाचार,व्याभिचार, लालच, आतंक,
द्वेष-घृणा सबके मुखौटे उपलब्ध हैं
फिर से निकलेगा शहर की
महत्वकांक्षा की कोख में पल रहा
स्वार्थ
खरीदेगा फिर से एक मुखौटा
और फिर से होगी ‘हत्या’
हर बार की तरह फिर मरेगी
‘मानवता’
पर शहर चलता रहेगा
जिन्दा रहेगा,
पर खामोश रहेगा
गांधीजी के तीनो बन्दर
उदास हैं
सीधे, सरल वो तीन अनमोल वचन
क्या किसी कूट-भाषा का तिलस्म थे?
उसके कानों कि
ऊँचाई तक कोई पहुंच भी गया
तो यही पायेगा कि कानों पर
हाथ धरे बैठा है प्रशासन
और किसने कहा कि
क़ानून अंधा है
क्या आँखों पर हाथ रखने से
भला कोई अंधा हो जाता है
और आप जनाब?
आप क्यों चुप हैं
मुँह पर हाथ?
अरे! आप तो जनता हैं?
गुरुवार, 9 सितंबर 2010
आत्मसम्मान खो दिया है इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने
यह मजे की बात है कि आमिर खान ने अपनी सामाजिक प्रतिबद्धता की सिताराविहीन फिल्म पीपली लाइव का प्रचार उसी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के माध्यम से किया, जिसका मखौल उनकी फिल्म उड़ाती है।
मीडिया ने इस पर एतराज भी नहीं किया क्योंकि उन्हें किसी भी कीमत पर सितारा चाहिए, भले ही उसके हाथ में इनके लिए जूता ही क्यों न हो। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने आत्मसम्मान खो दिया है और उनकी इनस्यूलर आत्मा पर आलोचना का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। उनकी चमड़ी चमकदार होते हुए भी मोटी है।
यह सच है कि भारत में प्राय: मनोरंजन उद्योग अर्धशिक्षित लोगों के हाथ रहा है, परंतु पारंपरिक अर्थ में अशिक्षित फिल्मकारों ने सामाजिक सोद्देश्यता की महान फिल्में भी रची हैं। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के कर्णधार बहुत पढ़े-लिखे लोग हैं, इसलिए उनकी संवेदनहीनता पर बहुत दुख होता है।
ये पढ़े-लिखे कर्णधार आमिर खान अभिनीत थ्री इडियट्स के उस पात्र की तरह हैं, जो घोटा लगाकर येन केन प्रकारेण उच्चतम अंक अर्जित करता है। चैनल संचालकों के दिमाग इतने छोटे हैं कि उन्हें निकालकर कीड़े-मकोड़ों के जिस्म में फिट किया जा सकता है, परंतु इनकी फितरत ऐसी है कि वहां भी ये नेटवर्क बना लेंगे।
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की आत्मा का तोता टीआरपी नामक पिंजरे में कैद है। टेलीविजन पर लोकप्रियता का आकलन करने वाली अंतरराष्ट्रीय ख्याति की कंपनी ने सांस्कृतिक विविधता वाले भारत में मात्र सात हजार घरों में उनके मीटर लगाए हैं और यह बताना कठिन है कि मीटर नौकर के कक्ष में लगा है या मालिक के टीवी में। कितने मीटर ग्रामीण क्षेत्र में हैं और कितने महानगरों में।
आकलन की यह विधि उन देशों में काम करती है, जहां अधिकांश लोग एक ही भाषा और धर्म के होते हैं। विविधता, विरोधाभास और विसंगतियों वाले देश में लोकप्रियता का आकलन आसानी से नहीं हो सकता। हमारे यहां तो लोकप्रिय सरकारें भी अल्पमतों से बनती हैं। इसी टीआरपी के आधार पर विज्ञापन मिलते हैं और उनकी दरें भी तय होती हैं। चैनल युद्ध इसी टीआरपी के लिए होता है और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की सारी संवेदनहीनता तथा गलाकाट प्रतिद्वंद्विता का कारण भी यही है।
खबरें देने वाले चैनल सातों दिन चौबीस घंटे सक्रिय रहते हैं और यथेष्ट खबरें नहीं होने पर खबरें गढ़ी जाती हैं। अतिरेक उनकी शैली नहीं, उनकी मजबूरी है। मनगढ़ंत व्याख्या करके घटना के इर्दगिर्द धुंध पैदा करना उनके लिए आवश्यक है। वे सत्य नहीं, सनसनी फैलाने में यकीन रखते हैं। कुछ उद्घोषक इतनी नाटकीयता से ऊंची आवाज में साधारण घटना को पेश करते हैं कि विश्व युद्ध का आभास होता है।
पीपली लाइव में एक पत्रकार और नेता की दोस्ती को भी प्रस्तुत किया गया है और मीडिया को नेता अपनी सुविधानुसार इस्तेमाल करते हैं। इस फिल्म में अखबार के एक पत्रकार को उसके प्रथम दृश्य में कविता पढ़ते दिखाया गया है और इस छोटे से दृश्य में ही उसका संवेदनशील होना स्थापित किया गया है। यह गौरतलब है कि यह संवेदनशील पत्रकार इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़ना चाहता है और उसकी यह ललक ही उसे उनके लिए काम करने को मजबूर करती है।
वह एक बददिमाग औरत को भी बर्दाश्त करता है। वह उस समय आहत होता है जब एक मुफलिस मेहनतकश किसान की मृत्यु को अनदेखा किया जाता है क्योंकि आत्महत्या करने वाला व्यक्ति मीडिया की निगाह में ‘स्टार’ है। यह पूरा खेल ही इस कदर ‘स्टार केंद्रित’ है कि आम आदमी हाशिए पर धकेल दिया गया है। यही संवेदनशील पत्रकार झुलसकर मरता है और उसे किसी और की लाश समझा जाता है। इस निर्मम व्यवसाय में इसे संवेदना का शव ही माना जाना चाहिए।
इस फिल्म में एक तरफ यह नामहीन शव है और दूसरी तरफ नायक महानगर में गुमशुदा का जीवन जीने के लिए बाध्य है। वह अनपढ़ स्वयं को तमाशा बनाए जाने से इतना दुखी है कि पहचानरहित जीवन का चयन करता है। यह प्रकरण कम डिग्री में प्यासा के नायक की तरह है जो स्वयं के वजूद से इनकार कर देता है, क्योंकि वह जानता है कि ‘ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है?’
मीडिया के इस सर्कस में जोकर का रुतबा रिंगमास्टर से बड़ा है। इसका राष्ट्रीय हानि का यह पक्ष भयावह है कि ट्रिविया के कारण हार्ड न्यूज का महत्व घट गया है। देश की असली समस्याओं का कभी जिक्र ही नहीं होता और महत्वहीन बातों को खूब उछाला जाता है। शनि के प्रकोप पर कार्यक्रमों की भरमार है। हमारी सारी कुरीतियों को इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने पुन: जीवित कर दिया है।
इस प्रायोजित खेल ने अपने सितारों का निर्माण किया है, जिनका जमीन से कोई रिश्ता ही नहीं है। एक साथ ढेरों खबर चैनल अस्तित्व में आए और इस विस्फोट के समय प्रशिक्षित लोगों का अभाव था, अत: जबरन की भर्ती हुई है। कुकुरमुत्ते की तरह प्रशिक्षण संस्थाओं का उदय हुआ, जहां शिक्षकों का अभाव था। इस विधा में कोई एकलव्य नहीं हुआ। बंदरों के हाथ उस्तरा लग गया है।
लेडी डायना की कार दुर्घटना में मौत हुई, क्योंकि मीडिया की कारें उसके पीछे शिकारी कुत्तों की तरह पड़ी थीं। श्रीमती जैकलीन कैनेडी व्यक्तिगत समुद्र तट पर स्नान करती थीं तो उनके चित्र लेने के लिए मीडिया के लोग उपकरणों से लैस होकर जल के भीतर दूर से तैरते हुए आए। भारत का मीडिया पश्चिम के मीडिया की नकल कर रहा है। कत्ल हो, आत्महत्या हो, सूखा हो, अतिवृष्टि हो, वे सब जगह पहुंचकर मूर्खतापूर्ण प्रश्न पूछते हैं और परेशान लोगों के जख्मों पर नमक छिड़कते हैं। सबसे दुखद बात यह कि खबर चैनल और सीरियल एक वैकल्पिक संसार की रचना कर रहे हैं और यथार्थ से दूर एक नया संसार रच रहे हैं। विज्ञापन शक्तियों का यह सबसे मारक हथियार है।
जब चौबीस घंटे सातों दिन सक्रिय खबरी चैनलों का उदय हुआ, तब यह संभावना थी कि अखबारों की बिक्री घट जाएगी, परंतु इसी दौर में अखबारों की प्रसार संख्या खूब बढ़ी है। स्पष्ट है कि तमाशबीन जनता छोटे परदे पर खबरों का स्वांग देखती है, लेकिन भरोसा अखबारों पर करती है। हमारे पाठक फिल्मी समालोचना को मजे लेकर पढ़ते हैं, परंतु फिल्म चुनने का उनका अपना अलग तरीका है। जैसे समालोचना उनके लिए स्वतंत्र मनोरंजन है, वैसे ही नाटकीय और अतिरेक के साथ अभिनीत खबरें भी उनके लिए स्वतंत्र मनोरंजन हैं। प्रारंभ में खबरों का असर था, परंतु अतिरेक और दोहराव के कारण चैनल स्वयं का कैरीकेचर बनकर रह गए हैं।
इस विकराल तंत्र के लगातार फैलते दायरे को रोकने के लिए दूरदर्शन को लोकप्रियता आकलन का तंत्र विकसित करना चाहिए। शासन शासित लोकप्रियता आकलन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से कचरा बुहार देगा। गौरतलब है कि सरकार में व्यापक भ्रष्टाचार के बावजूद दूरदर्शन ने नितांत भारतीय कार्यक्रम रचे हैं, जबकि प्राइवेट चैनल अपने असीमित बजट के बावजूद सिर्फ फूहड़ता ही रच पाया है। देश के सांस्कृतिक डीएनए के साथ छेड़छाड़ के षड्यंत्र को रोकना आवश्यक है। आमिर और अनुषा रिजवी ने राष्ट्रीय हित का सार्थक सिनेमा रचा है।
मीडिया ने इस पर एतराज भी नहीं किया क्योंकि उन्हें किसी भी कीमत पर सितारा चाहिए, भले ही उसके हाथ में इनके लिए जूता ही क्यों न हो। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने आत्मसम्मान खो दिया है और उनकी इनस्यूलर आत्मा पर आलोचना का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। उनकी चमड़ी चमकदार होते हुए भी मोटी है।
यह सच है कि भारत में प्राय: मनोरंजन उद्योग अर्धशिक्षित लोगों के हाथ रहा है, परंतु पारंपरिक अर्थ में अशिक्षित फिल्मकारों ने सामाजिक सोद्देश्यता की महान फिल्में भी रची हैं। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के कर्णधार बहुत पढ़े-लिखे लोग हैं, इसलिए उनकी संवेदनहीनता पर बहुत दुख होता है।
ये पढ़े-लिखे कर्णधार आमिर खान अभिनीत थ्री इडियट्स के उस पात्र की तरह हैं, जो घोटा लगाकर येन केन प्रकारेण उच्चतम अंक अर्जित करता है। चैनल संचालकों के दिमाग इतने छोटे हैं कि उन्हें निकालकर कीड़े-मकोड़ों के जिस्म में फिट किया जा सकता है, परंतु इनकी फितरत ऐसी है कि वहां भी ये नेटवर्क बना लेंगे।
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की आत्मा का तोता टीआरपी नामक पिंजरे में कैद है। टेलीविजन पर लोकप्रियता का आकलन करने वाली अंतरराष्ट्रीय ख्याति की कंपनी ने सांस्कृतिक विविधता वाले भारत में मात्र सात हजार घरों में उनके मीटर लगाए हैं और यह बताना कठिन है कि मीटर नौकर के कक्ष में लगा है या मालिक के टीवी में। कितने मीटर ग्रामीण क्षेत्र में हैं और कितने महानगरों में।
आकलन की यह विधि उन देशों में काम करती है, जहां अधिकांश लोग एक ही भाषा और धर्म के होते हैं। विविधता, विरोधाभास और विसंगतियों वाले देश में लोकप्रियता का आकलन आसानी से नहीं हो सकता। हमारे यहां तो लोकप्रिय सरकारें भी अल्पमतों से बनती हैं। इसी टीआरपी के आधार पर विज्ञापन मिलते हैं और उनकी दरें भी तय होती हैं। चैनल युद्ध इसी टीआरपी के लिए होता है और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की सारी संवेदनहीनता तथा गलाकाट प्रतिद्वंद्विता का कारण भी यही है।
खबरें देने वाले चैनल सातों दिन चौबीस घंटे सक्रिय रहते हैं और यथेष्ट खबरें नहीं होने पर खबरें गढ़ी जाती हैं। अतिरेक उनकी शैली नहीं, उनकी मजबूरी है। मनगढ़ंत व्याख्या करके घटना के इर्दगिर्द धुंध पैदा करना उनके लिए आवश्यक है। वे सत्य नहीं, सनसनी फैलाने में यकीन रखते हैं। कुछ उद्घोषक इतनी नाटकीयता से ऊंची आवाज में साधारण घटना को पेश करते हैं कि विश्व युद्ध का आभास होता है।
पीपली लाइव में एक पत्रकार और नेता की दोस्ती को भी प्रस्तुत किया गया है और मीडिया को नेता अपनी सुविधानुसार इस्तेमाल करते हैं। इस फिल्म में अखबार के एक पत्रकार को उसके प्रथम दृश्य में कविता पढ़ते दिखाया गया है और इस छोटे से दृश्य में ही उसका संवेदनशील होना स्थापित किया गया है। यह गौरतलब है कि यह संवेदनशील पत्रकार इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़ना चाहता है और उसकी यह ललक ही उसे उनके लिए काम करने को मजबूर करती है।
वह एक बददिमाग औरत को भी बर्दाश्त करता है। वह उस समय आहत होता है जब एक मुफलिस मेहनतकश किसान की मृत्यु को अनदेखा किया जाता है क्योंकि आत्महत्या करने वाला व्यक्ति मीडिया की निगाह में ‘स्टार’ है। यह पूरा खेल ही इस कदर ‘स्टार केंद्रित’ है कि आम आदमी हाशिए पर धकेल दिया गया है। यही संवेदनशील पत्रकार झुलसकर मरता है और उसे किसी और की लाश समझा जाता है। इस निर्मम व्यवसाय में इसे संवेदना का शव ही माना जाना चाहिए।
इस फिल्म में एक तरफ यह नामहीन शव है और दूसरी तरफ नायक महानगर में गुमशुदा का जीवन जीने के लिए बाध्य है। वह अनपढ़ स्वयं को तमाशा बनाए जाने से इतना दुखी है कि पहचानरहित जीवन का चयन करता है। यह प्रकरण कम डिग्री में प्यासा के नायक की तरह है जो स्वयं के वजूद से इनकार कर देता है, क्योंकि वह जानता है कि ‘ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है?’
मीडिया के इस सर्कस में जोकर का रुतबा रिंगमास्टर से बड़ा है। इसका राष्ट्रीय हानि का यह पक्ष भयावह है कि ट्रिविया के कारण हार्ड न्यूज का महत्व घट गया है। देश की असली समस्याओं का कभी जिक्र ही नहीं होता और महत्वहीन बातों को खूब उछाला जाता है। शनि के प्रकोप पर कार्यक्रमों की भरमार है। हमारी सारी कुरीतियों को इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने पुन: जीवित कर दिया है।
इस प्रायोजित खेल ने अपने सितारों का निर्माण किया है, जिनका जमीन से कोई रिश्ता ही नहीं है। एक साथ ढेरों खबर चैनल अस्तित्व में आए और इस विस्फोट के समय प्रशिक्षित लोगों का अभाव था, अत: जबरन की भर्ती हुई है। कुकुरमुत्ते की तरह प्रशिक्षण संस्थाओं का उदय हुआ, जहां शिक्षकों का अभाव था। इस विधा में कोई एकलव्य नहीं हुआ। बंदरों के हाथ उस्तरा लग गया है।
लेडी डायना की कार दुर्घटना में मौत हुई, क्योंकि मीडिया की कारें उसके पीछे शिकारी कुत्तों की तरह पड़ी थीं। श्रीमती जैकलीन कैनेडी व्यक्तिगत समुद्र तट पर स्नान करती थीं तो उनके चित्र लेने के लिए मीडिया के लोग उपकरणों से लैस होकर जल के भीतर दूर से तैरते हुए आए। भारत का मीडिया पश्चिम के मीडिया की नकल कर रहा है। कत्ल हो, आत्महत्या हो, सूखा हो, अतिवृष्टि हो, वे सब जगह पहुंचकर मूर्खतापूर्ण प्रश्न पूछते हैं और परेशान लोगों के जख्मों पर नमक छिड़कते हैं। सबसे दुखद बात यह कि खबर चैनल और सीरियल एक वैकल्पिक संसार की रचना कर रहे हैं और यथार्थ से दूर एक नया संसार रच रहे हैं। विज्ञापन शक्तियों का यह सबसे मारक हथियार है।
जब चौबीस घंटे सातों दिन सक्रिय खबरी चैनलों का उदय हुआ, तब यह संभावना थी कि अखबारों की बिक्री घट जाएगी, परंतु इसी दौर में अखबारों की प्रसार संख्या खूब बढ़ी है। स्पष्ट है कि तमाशबीन जनता छोटे परदे पर खबरों का स्वांग देखती है, लेकिन भरोसा अखबारों पर करती है। हमारे पाठक फिल्मी समालोचना को मजे लेकर पढ़ते हैं, परंतु फिल्म चुनने का उनका अपना अलग तरीका है। जैसे समालोचना उनके लिए स्वतंत्र मनोरंजन है, वैसे ही नाटकीय और अतिरेक के साथ अभिनीत खबरें भी उनके लिए स्वतंत्र मनोरंजन हैं। प्रारंभ में खबरों का असर था, परंतु अतिरेक और दोहराव के कारण चैनल स्वयं का कैरीकेचर बनकर रह गए हैं।
इस विकराल तंत्र के लगातार फैलते दायरे को रोकने के लिए दूरदर्शन को लोकप्रियता आकलन का तंत्र विकसित करना चाहिए। शासन शासित लोकप्रियता आकलन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से कचरा बुहार देगा। गौरतलब है कि सरकार में व्यापक भ्रष्टाचार के बावजूद दूरदर्शन ने नितांत भारतीय कार्यक्रम रचे हैं, जबकि प्राइवेट चैनल अपने असीमित बजट के बावजूद सिर्फ फूहड़ता ही रच पाया है। देश के सांस्कृतिक डीएनए के साथ छेड़छाड़ के षड्यंत्र को रोकना आवश्यक है। आमिर और अनुषा रिजवी ने राष्ट्रीय हित का सार्थक सिनेमा रचा है।
फिल्मों में छाए लोकगीत..
आजकल गाने की जबर्दस्त धूम है- ‘मुन्नी बदनाम हुई डार्लिग तेरे लिए..’! टीवी के हर चैनल पर ‘बदनाम’ होकर मुन्नी नाम कमा रही है। लेकिन कानों में पड़ते ही फिल्म ‘दबंग’ का यह गीत हमें अतीत की ओर खींचता है, जहां इसी गीत के बोल कुछ बदले हुए हैं- ‘लौंडा बदनाम हुआ नसीबन तेरे लिए..’।
‘दबंग’ के डायरेक्टर अभिनव कश्यप से पूछने पर पता चलता है- ‘यह यूपी-बिहार का लोकगीत है, जिसे मैं बचपन से सुनता आ रहा हूं। मस्ती के मूड में लिखा गया यह गाना किसी ख़ुराफ़ाती दिमाग़ की उपज है, इसलिए हमारी फिल्म में जब सिचुएशन निकली कि शादी-ब्याह में बजने वाला नौटंकी टाइप का डबल मीनिंग गाना चाहिए.. ललित पंडित ने मुझे ‘मुन्नी..’ की धुन सुनाई, तो मैं उछल पड़ा.. बस, मुझे यही चाहिए!’ चूंकि अभिनव यूपी में ही पले-बढ़े हैं, लिहाज आवश्यकता पड़ने पर उन्होंने अनुभव को ही अपना रेफरेंस बनाया। लेकिन बॉलीवुड की ऐसी तमाम फिल्में हैं, जिनमें लोकगीतों का इस्तेमाल धड़ल्ले से हुआ है।
हाल की ही फिल्मों की बात करें, तो ‘दिल्ली-6’ और ‘पीपली लाइव’ में छत्तीसगढ़ी लोकगीतों का न सिर्फ़ बख़ूबी उपयोग किया गया, बल्कि उन्हें लोकप्रियता भी काफ़ी मिली। जी हां, हम ‘ससुराल गेंदा फूल..’ और ‘सखी सैंया तो खूबई कमात हैं..’ जैसे गीतों की बात कर रहे हैं।
इस बारे में सुप्रसिद्ध गीतकार समीर बताते हैं- ‘यह कोई नई बात नहीं है। हुस्नलाल-भगतराम और नौशाद के जमाने के भी लोकगीत हमारी फिल्मों में आए हैं। फिर ‘मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है..’ (‘लावारिस’) और ‘रंग बरसे..’ (‘सिलसिला’) भी तो पहले लोकगीत ही था न! यहां तक कि गुलजार साहब को जिस ‘चल छैंया छैंया..’ के लिए ख़ूब वाहवाही मिली, वह भी पंजाब का फोक सॉन्ग है.. इसे सूफ़ी गायक बुल्ले शाह गाया करते थे।’
वैसे समीर भी लोकगीत-प्रेम से अछूते नहीं हैं। बनारस से ताल्लुक रखने वाले समीर के पिता अनजान ने ‘आज का अर्जुन’ के लिए ‘साढ़े तीन बजे मुन्नी जरूर मिलना..’ लिखा, तो बेटे ने लाइन ही लगा दी- ‘बगल वाली आंख मार है..’ (‘खुल्लम खुल्ला प्यार करें’), ‘सरकाय लेओ खटिया जाड़ा लगे..’ (‘राजा बाबू’), ‘मैं आई हूं यूपी बिहार लूटने..’ (‘शूल’) आदि। इसी तरह सुप्रसिद्ध गीतकार आनंद बख्शी का गीत ‘सात सहेलियां खड़ी-खड़ी..’ (‘विधाता’) असल में हमारे बुंदेलखंडी गीत से उठाया गया है, जिसके बोल हैं- ‘पनघट पे खड़ी चार गुइयां बताओ सखी कैसे हैं सइयां..’।
सवाल यह उठता है कि लोकगीतों में कुछ शब्दों का हेर-फेर करके फिल्मों के लिए अपना नाम दे देना क्या उचित है? बहरहाल, ढेर सारे बॉलीवुड के कई गीतकार वजह जो भी रही हो, लोकगीतों से ‘इंस्पायर्ड’ जरूर रहे हैं! समीर इस आरोप से इंकार करते हैं- ‘फोक पर कानूनी हक़ का दावा कोई नहीं कर सकता। इसीलिए ‘हम न जइबे..’, ‘कैसे बनी कैसे बनी.. ’, ‘चने के खेत में..’, और ‘टपकी जाए जलेबी..’ जैसे गाने सुन हमें फोक की याद आती है।’
अभिनव की मानें तो लोकगीतों के रचयिता गुमनामी में रह जाते हैं, इसलिए उन्हें मालूम ही नहीं कि ‘लौंडा बदनाम..’ असल में लिखा किसने था? ‘पिछली सदी के नौवें और आख़िरी दशक में यह गीत ताराबानो फैजाबादी गाती थीं। वे न केवल गुलशन कुमार की खोज थीं, बल्कि ‘टी-सीरीज’ के अंतर्गत इस गीत का उनका एलबम भी रिलीज हुआ था।
चूंकि इसके बावजूद ताराबानो की पहचान एक स्ट्रीट सिंगर के रूप में रही.. ढोलक-हारमोनियम लेकर वे कहीं भी शुरू हो जाती थीं। मेरे ख्याल से ‘मुन्नी..’ के लिए उन्हें क्रेडिट तो मिलनी ही चाहिए थी।’ लेकिन अभिनव इससे सहमत नहीं हैं- ‘कवर वर्जन तो बहुत से लोगों ने गाए होंगे, पर इसके ओरिजिनल सोर्स के बारे में कौन जानता है? मैंने अगर किसी एक को क्रेडिट दे दी, तो कई लोग खड़े हो जाएंगे कि मैंने गाया है। सो, मैं इस क्रेडिट के पचड़े में पड़ूंगा ही नहीं!’
बहरहाल, सुप्रसिद्ध फिल्मकार टूटू शर्मा के मुताबिक़, ‘पहले की तरह इंडस्ट्री में फोक सॉन्ग का भरपूर इस्तेमाल शुरू से होता आया है। लेकिन यूपी-बिहार की आबादी चूंकि बहुत अधिक है, इसलिए फिल्मों में वहां का लोकगीत-संगीत रखना फ़ायदेमंद होता है।’ बहरहाल, यह तो अच्छी बात है कि आमिर ख़ान ने छत्तीसगढ़ तक सीमित रहे एक लोकगीत (‘सखी सैंया तो खूबई कमात हैं..’) को आज पूरे देश के घर-घर तक पहुंचा दिया है!
चर्चित रहे कुछ लोकगीत
गीत / फिल्म / गीतकार
‘चलत मुसाफ़िर मोह..’ / ‘तीसरी क़सम’ / शैलेंद्र सिंह
‘पान खाए सैंया हमारो..’ / ‘तीसरी क़सम’ / शैलेंद्र सिंह
‘दइया रे दइया चढ़ गयो..’ / ‘मधुमति’/ शैलेंद्र सिंह
‘दइया रे दइया लाज मोहे..’ / ‘लीडर’ / शकील बदायूंनी
‘सात सहेलियां खड़ी खड़ी..’ / ‘विधाता’ / आनंद बख्शी
‘मेरे अंगने में तुम्हारा क्या ..’ / ‘लावारिस’ / आनंद बख्शी
‘रंग बरसे भीगे चुनर..’ / ‘सिलसिला’ / हरिवंश राय बच्चन
‘इन्ही लोगों ने ले लीना..’ / ‘पाकीजा’ / मजरूह सुल्तानपुरी
‘चढ़ गया ऊपर रे अटरिया पे..’ / ‘दलाल’ / माया गोविंद
‘अंखियों से गोली मारे..’ / ‘दूल्हे राजा’ / समीर
‘बगल वाली आंख..’ / ‘खुल्लम खुल्ला प्यार करें’ / समीर
‘सरकाय लेओ खटिया जाड़ा लगे..’ / ‘राजा बाबू’ / समीर
‘मैं आई हूं यूपी बिहार लूटने..’ / ‘शूल’ / समीर
‘आरा हीले छपरा हीले..’ / ‘अपने दम पर’ / योगेश
‘भरतपुर लुट गया.’ / ‘इंगलिश बाबू देसी मेम’ / योगेश
‘ससुराल गेंदा फूल..’ / ‘दिल्ली-6’ / प्रसून जोशी
‘एक चुम्मा तू मुझको..’ / ‘छोटे सरकार’ / रानी मलिक
‘चल छैंया छैंया..’ / ‘दिल से’ / गुलजार
‘दबंग’ के डायरेक्टर अभिनव कश्यप से पूछने पर पता चलता है- ‘यह यूपी-बिहार का लोकगीत है, जिसे मैं बचपन से सुनता आ रहा हूं। मस्ती के मूड में लिखा गया यह गाना किसी ख़ुराफ़ाती दिमाग़ की उपज है, इसलिए हमारी फिल्म में जब सिचुएशन निकली कि शादी-ब्याह में बजने वाला नौटंकी टाइप का डबल मीनिंग गाना चाहिए.. ललित पंडित ने मुझे ‘मुन्नी..’ की धुन सुनाई, तो मैं उछल पड़ा.. बस, मुझे यही चाहिए!’ चूंकि अभिनव यूपी में ही पले-बढ़े हैं, लिहाज आवश्यकता पड़ने पर उन्होंने अनुभव को ही अपना रेफरेंस बनाया। लेकिन बॉलीवुड की ऐसी तमाम फिल्में हैं, जिनमें लोकगीतों का इस्तेमाल धड़ल्ले से हुआ है।
हाल की ही फिल्मों की बात करें, तो ‘दिल्ली-6’ और ‘पीपली लाइव’ में छत्तीसगढ़ी लोकगीतों का न सिर्फ़ बख़ूबी उपयोग किया गया, बल्कि उन्हें लोकप्रियता भी काफ़ी मिली। जी हां, हम ‘ससुराल गेंदा फूल..’ और ‘सखी सैंया तो खूबई कमात हैं..’ जैसे गीतों की बात कर रहे हैं।
इस बारे में सुप्रसिद्ध गीतकार समीर बताते हैं- ‘यह कोई नई बात नहीं है। हुस्नलाल-भगतराम और नौशाद के जमाने के भी लोकगीत हमारी फिल्मों में आए हैं। फिर ‘मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है..’ (‘लावारिस’) और ‘रंग बरसे..’ (‘सिलसिला’) भी तो पहले लोकगीत ही था न! यहां तक कि गुलजार साहब को जिस ‘चल छैंया छैंया..’ के लिए ख़ूब वाहवाही मिली, वह भी पंजाब का फोक सॉन्ग है.. इसे सूफ़ी गायक बुल्ले शाह गाया करते थे।’
वैसे समीर भी लोकगीत-प्रेम से अछूते नहीं हैं। बनारस से ताल्लुक रखने वाले समीर के पिता अनजान ने ‘आज का अर्जुन’ के लिए ‘साढ़े तीन बजे मुन्नी जरूर मिलना..’ लिखा, तो बेटे ने लाइन ही लगा दी- ‘बगल वाली आंख मार है..’ (‘खुल्लम खुल्ला प्यार करें’), ‘सरकाय लेओ खटिया जाड़ा लगे..’ (‘राजा बाबू’), ‘मैं आई हूं यूपी बिहार लूटने..’ (‘शूल’) आदि। इसी तरह सुप्रसिद्ध गीतकार आनंद बख्शी का गीत ‘सात सहेलियां खड़ी-खड़ी..’ (‘विधाता’) असल में हमारे बुंदेलखंडी गीत से उठाया गया है, जिसके बोल हैं- ‘पनघट पे खड़ी चार गुइयां बताओ सखी कैसे हैं सइयां..’।
सवाल यह उठता है कि लोकगीतों में कुछ शब्दों का हेर-फेर करके फिल्मों के लिए अपना नाम दे देना क्या उचित है? बहरहाल, ढेर सारे बॉलीवुड के कई गीतकार वजह जो भी रही हो, लोकगीतों से ‘इंस्पायर्ड’ जरूर रहे हैं! समीर इस आरोप से इंकार करते हैं- ‘फोक पर कानूनी हक़ का दावा कोई नहीं कर सकता। इसीलिए ‘हम न जइबे..’, ‘कैसे बनी कैसे बनी.. ’, ‘चने के खेत में..’, और ‘टपकी जाए जलेबी..’ जैसे गाने सुन हमें फोक की याद आती है।’
अभिनव की मानें तो लोकगीतों के रचयिता गुमनामी में रह जाते हैं, इसलिए उन्हें मालूम ही नहीं कि ‘लौंडा बदनाम..’ असल में लिखा किसने था? ‘पिछली सदी के नौवें और आख़िरी दशक में यह गीत ताराबानो फैजाबादी गाती थीं। वे न केवल गुलशन कुमार की खोज थीं, बल्कि ‘टी-सीरीज’ के अंतर्गत इस गीत का उनका एलबम भी रिलीज हुआ था।
चूंकि इसके बावजूद ताराबानो की पहचान एक स्ट्रीट सिंगर के रूप में रही.. ढोलक-हारमोनियम लेकर वे कहीं भी शुरू हो जाती थीं। मेरे ख्याल से ‘मुन्नी..’ के लिए उन्हें क्रेडिट तो मिलनी ही चाहिए थी।’ लेकिन अभिनव इससे सहमत नहीं हैं- ‘कवर वर्जन तो बहुत से लोगों ने गाए होंगे, पर इसके ओरिजिनल सोर्स के बारे में कौन जानता है? मैंने अगर किसी एक को क्रेडिट दे दी, तो कई लोग खड़े हो जाएंगे कि मैंने गाया है। सो, मैं इस क्रेडिट के पचड़े में पड़ूंगा ही नहीं!’
बहरहाल, सुप्रसिद्ध फिल्मकार टूटू शर्मा के मुताबिक़, ‘पहले की तरह इंडस्ट्री में फोक सॉन्ग का भरपूर इस्तेमाल शुरू से होता आया है। लेकिन यूपी-बिहार की आबादी चूंकि बहुत अधिक है, इसलिए फिल्मों में वहां का लोकगीत-संगीत रखना फ़ायदेमंद होता है।’ बहरहाल, यह तो अच्छी बात है कि आमिर ख़ान ने छत्तीसगढ़ तक सीमित रहे एक लोकगीत (‘सखी सैंया तो खूबई कमात हैं..’) को आज पूरे देश के घर-घर तक पहुंचा दिया है!
चर्चित रहे कुछ लोकगीत
गीत / फिल्म / गीतकार
‘चलत मुसाफ़िर मोह..’ / ‘तीसरी क़सम’ / शैलेंद्र सिंह
‘पान खाए सैंया हमारो..’ / ‘तीसरी क़सम’ / शैलेंद्र सिंह
‘दइया रे दइया चढ़ गयो..’ / ‘मधुमति’/ शैलेंद्र सिंह
‘दइया रे दइया लाज मोहे..’ / ‘लीडर’ / शकील बदायूंनी
‘सात सहेलियां खड़ी खड़ी..’ / ‘विधाता’ / आनंद बख्शी
‘मेरे अंगने में तुम्हारा क्या ..’ / ‘लावारिस’ / आनंद बख्शी
‘रंग बरसे भीगे चुनर..’ / ‘सिलसिला’ / हरिवंश राय बच्चन
‘इन्ही लोगों ने ले लीना..’ / ‘पाकीजा’ / मजरूह सुल्तानपुरी
‘चढ़ गया ऊपर रे अटरिया पे..’ / ‘दलाल’ / माया गोविंद
‘अंखियों से गोली मारे..’ / ‘दूल्हे राजा’ / समीर
‘बगल वाली आंख..’ / ‘खुल्लम खुल्ला प्यार करें’ / समीर
‘सरकाय लेओ खटिया जाड़ा लगे..’ / ‘राजा बाबू’ / समीर
‘मैं आई हूं यूपी बिहार लूटने..’ / ‘शूल’ / समीर
‘आरा हीले छपरा हीले..’ / ‘अपने दम पर’ / योगेश
‘भरतपुर लुट गया.’ / ‘इंगलिश बाबू देसी मेम’ / योगेश
‘ससुराल गेंदा फूल..’ / ‘दिल्ली-6’ / प्रसून जोशी
‘एक चुम्मा तू मुझको..’ / ‘छोटे सरकार’ / रानी मलिक
‘चल छैंया छैंया..’ / ‘दिल से’ / गुलजार
कृष्ण के इलाज के लिए गोपियों ने दी चरणरज
भगवान श्रीकृष्ण की पटरानियां प्राय: ब्रज की गोपियों के प्रेम का परिहास करते हुए स्वयं के प्रेम को श्रेष्ठ बताती थीं। उनके अहंकार को भंग करने के लिए श्रीकृष्ण ने एक युक्ति सोची। वे बीमारी का बहाना बनाकर लेट गए, तभी नारदजी आए। वे श्रीकृष्ण का उद्देश्य समझकर बोले- प्रभु के रोग की औषधि तो है किंतु वह उनके किसी प्रेमी भक्त की चरणरज का सेवन है।
क्या आप में से कोई अपनी चरणरज देगा। रुक्मिणी, सत्यभामा आदि सभी पटरानियों ने इंकार कर दिया। तब श्रीकृष्ण ने नारद को ब्रज जाकर गोपियों से आग्रह करने के लिए कहा। नारदजी श्यामसुंदर के पास से आए हैं, यह सुनकर सभी गोपियां दौड़ पड़ीं। जब नारदजी ने श्रीकृष्ण की बीमारी की बात बताई तो उन सभी के प्राण सूख गए।
औषधि के विषय में पूछने पर नारदजी बोले- संपूर्ण जगत में चक्कर लगा आया पर व्यर्थ ही रहा। गोपियों ने पूछा- क्या वह औषधि हमारे पास भी है? नारदजी से उस औषधि के विषय में जानने के बाद गोपियों ने अपनी चरणरज देने पर सहमति जाहिर की। तब नारदजी ने कहा- क्या तुम यह नहीं जानतीं कि श्रीकृष्ण भगवान हैं। भला उन्हें खाने को अपने पैरों की धूल, क्या तुम्हें नर्क का भय नहीं। तब गोपियां बोलीं- हमारा सब कुछ हमारे प्रिय श्रीकृष्ण हैं।
हम उन्हें स्वस्थ कर सकें इसके लिए हमें नर्क भी स्वीकार हैं। नारदजी ने उन सभी की चरणरज की पोटली बांधी और आकर श्रीकृष्ण को दी। यह देख पटरानियां, गोपियों की प्रेम की महानता के समक्ष नतमस्तक हो गईं। वस्तुत: निर्मल प्रेम छोटे-बड़े का भेद नहीं देखता। अपनापन और निष्ठा देखता है। सच्चे प्रेम में अहंकार व अधिकार भाव नहीं, मात्र समर्पण होता है।
क्या आप में से कोई अपनी चरणरज देगा। रुक्मिणी, सत्यभामा आदि सभी पटरानियों ने इंकार कर दिया। तब श्रीकृष्ण ने नारद को ब्रज जाकर गोपियों से आग्रह करने के लिए कहा। नारदजी श्यामसुंदर के पास से आए हैं, यह सुनकर सभी गोपियां दौड़ पड़ीं। जब नारदजी ने श्रीकृष्ण की बीमारी की बात बताई तो उन सभी के प्राण सूख गए।
औषधि के विषय में पूछने पर नारदजी बोले- संपूर्ण जगत में चक्कर लगा आया पर व्यर्थ ही रहा। गोपियों ने पूछा- क्या वह औषधि हमारे पास भी है? नारदजी से उस औषधि के विषय में जानने के बाद गोपियों ने अपनी चरणरज देने पर सहमति जाहिर की। तब नारदजी ने कहा- क्या तुम यह नहीं जानतीं कि श्रीकृष्ण भगवान हैं। भला उन्हें खाने को अपने पैरों की धूल, क्या तुम्हें नर्क का भय नहीं। तब गोपियां बोलीं- हमारा सब कुछ हमारे प्रिय श्रीकृष्ण हैं।
हम उन्हें स्वस्थ कर सकें इसके लिए हमें नर्क भी स्वीकार हैं। नारदजी ने उन सभी की चरणरज की पोटली बांधी और आकर श्रीकृष्ण को दी। यह देख पटरानियां, गोपियों की प्रेम की महानता के समक्ष नतमस्तक हो गईं। वस्तुत: निर्मल प्रेम छोटे-बड़े का भेद नहीं देखता। अपनापन और निष्ठा देखता है। सच्चे प्रेम में अहंकार व अधिकार भाव नहीं, मात्र समर्पण होता है।
ये भरोसा ना टूटे
हर आदमी धीरे-धीरे इसीलिए अकेला होता जा रहा है, क्योंकि उसने अब अपने आसपास के लोगों पर भरोसा करना छोड़ दिया है। यह सच है कि अब दुनिया उतनी सरल नहीं रही, जैसी वह कभी हुआ करती थी। लेकिन जैसे ही हम भरोसा करना छोड़ देते हैं, वैसे ही हम खुद को भीतर से बंद कर लेते हैं और अकेलेपन की कंदरा में खो जाते हैं। हम प्यार कम करते हैं और डरते ज्यादा हैं।
हम एक ऐसी दुनिया में जी रहे हैं जो भरोसा करना भूलती जा रही है। इससे भी बुरा यह कि हम एक ऐसी दुनिया में जी रहे हैं, जहां भरोसे की इसी खाई के इर्द-गिर्द नए उद्योग पनप रहे हैं। वे हमें मजबूर करते हैं कि हम कम से कम भरोसा करें और भय की भावना से ज्यादा से ज्यादा ग्रस्त हों।
सुरक्षा के नाम पर होने वाला समूचा कारोबार जाने-पहचाने खतरों से हमारी रक्षा नहीं करता। इसके उलट वह तो भय का ऐसा माहौल बना रहा है, जहां हम किसी भी अनजानी चीज से खुद को डरा हुआ महसूस करते हैं। मेडिकल ट्रीटमेंट भी इसी राह चल रहे हैं। पहले हमें बीमारियों का डर रहा करता था। आज हम बीमारियों के अंदेशे तक से डरे हुए रहते हैं।
लिहाजा हम बार-बार अपनी जांच करवाते हैं, पैथोलॉजी टेस्ट करवाते हैं, डॉक्टरों की चौखट पर बार-बार आमद दर्ज करवाते रहते हैं। नए अध्ययनों के नाम पर अखबारों में जो डराने वाले लेख छपते हैं, वे किसी भी भले-चंगे आदमी को अपनी सेहत को लेकर शंकाओं से भर देने के लिए काफी हैं।
बीते हफ्ते मैंने एक ऐसे ऑटो ड्राइवर के बारे में पढ़ा, जिसे एक बच्ची से बलात्कार के संदेह में पुलिस ने उठवा लिया था। वह अब भी संदिग्ध आरोपी ही है। उसके खिलाफ जो सबूत मिले, वे कुछ भी साबित नहीं करते। उसे जमानत मिल सकती है, लेकिन कोई भी उसकी गारंटी देने को तैयार नहीं। यहां तक कि उसके करीबी दोस्त और उसका अपना परिवार भी उसका विश्वास नहीं करते।
उसके पास अपनी जमानत के पैसे नहीं हैं। उसकी बीवी उसे छोड़कर जा चुकी है और किसी और व्यक्ति के साथ ब्याह रचाकर नया घर बसा चुकी है। वह कहती है कि वह ऐसे किसी आदमी के साथ गुजारा नहीं कर सकती, जिस पर इतने घृणित अपराध का संदेह है।
उसके परिवार ने उससे इसलिए किनारा कर लिया है, क्योंकि उन्हें डर है कि उसके बचाव के लिए कोई कदम उठाने पर उनका अपने पास-पड़ोस में ही उठना-बैठना बंद हो सकता है। वो अपने घर भी नहीं लौट सकता क्योंकि उसे डर है कि वहां उसे मार दिया जाएगा।
इस आदमी के खिलाफ पाए गए सबूत अभी अदालत में भी नहीं पहुंचे, लेकिन उसकी जिंदगी पहले ही तबाह हो चुकी है। उसे गिरफ्तार किए जाने की खबर भर ने उसके जीवन की तस्वीर बदलकर रख दी। इस आदमी को इस बात की सजा नहीं मिल रही है कि उसका अपराध साबित हो गया है। उसे इस बात की सजा मिल रही है कि हमारा समाज अब भरोसा करने की ताकत खो चुका है। हम हमेशा किसी भी व्यक्ति की बुराइयों को मान लेने के लिए तैयार रहते हैं।
मैं एक अति सुरक्षित बहुमंजिला इमारत के चौबीसवें माले पर रहता हूं, जिसमें बिना आईडी कार्ड कोई दाखिल नहीं हो सकता। इसके बावजूद कितनी दफे मैंने घर का दरवाजा खुला छोड़ा है? कभी नहीं। कितनी दफे मैंने अपनी कार को जरा देर के लिए अनलॉक छोड़ दिया है? कभी नहीं। कितनी बार मैं किसी जरूरतमंद की मदद करने के लिए सड़क पर अपनी गाड़ी रोकता हूं? उतनी बार नहीं, जितनी बार मुझे रोकना चाहिए।
कितनी बार मैं किसी भूखे आवारा कुत्ते को कुछ खिलाने के लिए रुकता हूं? उतनी बार नहीं, जितनी बार मैं रुक सकता हूं। क्यों? क्योंकि मेरे जेहन में यह डर पैवस्त हो चुका है कि ऐसा करने पर मैं मुश्किल में पड़ सकता हूं। कितनी बार मैं किसी हादसे के शिकार व्यक्ति की मदद करता हूं? बमुश्किल कभी।
क्योंकि मुझे डर है कि इससे मुझे किसी पुलिस केस में घसीट लिया जाएगा। कितनी बार मैं किसी लावारिस बच्चे को पैसा देकर उसकी मदद करता हूं? उतनी बार नहीं, जितनी बार मैं करना चाहता हूं। क्योंकि मुझे डर है कि शायद इस तरह मैं भीख मांगने की प्रवृत्ति को बढ़ावा दे रहा होऊंगा। हमारी हर छोटी से छोटी हरकत के पीछे भरोसे की कमी झलकती है।
इसी कारण हमें टूटती दोस्तियों और बिखरते रिश्तों की कहानियां सुनना अच्छा लगता है। ऐसे मौकों पर हम हमेशा यह कहने को तैयार रहते हैं: ‘मैंने तो तुम्हें पहले ही कहा था!’ हम हमेशा अपने दोस्तों, नाते-रिश्तेदारों, सहकर्मियों, बच्चों को चौकस रहने की हिदायत देते रहते हैं। मां की अपने बच्चे को पहली यही हिदायत होती है कि किसी अजनबी से खाने की चीज न ले।
बीवियों की अपने पति को यही चेतावनी होती है कि खूबसूरत सेक्रेटरी रखने के बारे में सोचें भी नहीं। दोस्त एक-दूसरे को मशविरा देते हैं कि खूबसूरत या कामयाब व्यक्ति से शादी करने से पहले दो बार सोच लें। दरअसल आप जब भी किसी से कोई सलाह मांगते हैं तो बदले में आपको चेतावनियां ही मिलती हैं। हर चीज के बारे में हमारी पहली प्रतिक्रिया होती है: ‘देखना, जरा संभल के।’
भरोसे की इसी कमी को मीडिया भुनाता है। मेरी बेटियां हॉलीवुड की नामी-गिरामी शख्सियतों का एक शो देखती हैं। इस शो में कुल जमा यही बातें की जाती हैं कि किस तरह सभी एक-दूसरे को धोखा दे रहे हैं। हम भूल जाते हैं कि मीडिया और समाज का आपसी रिश्ता होता है। हम भरोसा तोड़ने की जितनी कहानियां दिखाते हैं, हमारे संबंध उतने ही कम भरोसे के लायक बनते जाते हैं।
केवल विवाह और प्रेम संबंध ही नहीं टूट रहे हैं, अविश्वास की खाई हमारे परिवार, समाज और हमारे समुदाय में भी पसरती जा रही है। उत्तरप्रदेश में यादव दलितों पर भरोसा नहीं करते। बिहार में दलित ब्राrाणों पर भरोसा नहीं करते। पाकिस्तान में सुन्नी शियाओं पर भरोसा नहीं करते। मुंबई के स्थानीय लोग किसी पर भरोसा नहीं करते। हरियाणा में बड़े-बुजुर्ग अपनी बेटियों पर ही भरोसा नहीं करते। वे खानदान की इज्जत के नाम पर बेरहमी से उनका कत्ल कर देते हैं।
हर आदमी धीरे-धीरे इसीलिए अकेला होता जा रहा है, क्योंकि उसने अब भरोसा करना छोड़ दिया है। यह सच है कि अब दुनिया उतनी सरल नहीं रही, जैसी वह कभी हुआ करती थी। लेकिन जैसे ही हम भरोसा करना छोड़ देते हैं, वैसे ही हम खुद को भीतर से बंद कर लेते हैं और अकेलेपन की कंदरा में खो जाते हैं।
हम प्यार कम करते हैं और डरते ज्यादा हैं। हम वहां भी कुछ न कुछ गलत होने का अंदाजा लगा लेते हैं, जहां कुछ भी गलत नहीं था। कुछ भी शक और गफलत के दायरे के परे नहीं रह गया है। भरोसा नहीं करने और गलतियां ढूंढ़ने की अपनी इसी प्रवृत्ति के चलते हम दिन-ब-दिन नाखुश, भयभीत और शंकालु होते चले जा रहे हैं।
भरोसे की कमी के चलते ही हमारे भीतर डर अपना डेरा डाल लेता है। यही डर दिन-ब-दिन हमें नुकसान पहुंचाता जा रहा है, क्योंकि जिंदगी को महज डरकर नहीं जिया जा सकता। जिंदगी में भरोसे की भी जगह है। जिंदगी में सम्मान, प्रेम और विश्वास की भी जगह है। यदि हम इन सबसे महरूम हो गए तो हमारे जीवन में कोई अर्थ नहीं रह जाएगा।
हम एक ऐसी दुनिया में जी रहे हैं जो भरोसा करना भूलती जा रही है। इससे भी बुरा यह कि हम एक ऐसी दुनिया में जी रहे हैं, जहां भरोसे की इसी खाई के इर्द-गिर्द नए उद्योग पनप रहे हैं। वे हमें मजबूर करते हैं कि हम कम से कम भरोसा करें और भय की भावना से ज्यादा से ज्यादा ग्रस्त हों।
सुरक्षा के नाम पर होने वाला समूचा कारोबार जाने-पहचाने खतरों से हमारी रक्षा नहीं करता। इसके उलट वह तो भय का ऐसा माहौल बना रहा है, जहां हम किसी भी अनजानी चीज से खुद को डरा हुआ महसूस करते हैं। मेडिकल ट्रीटमेंट भी इसी राह चल रहे हैं। पहले हमें बीमारियों का डर रहा करता था। आज हम बीमारियों के अंदेशे तक से डरे हुए रहते हैं।
लिहाजा हम बार-बार अपनी जांच करवाते हैं, पैथोलॉजी टेस्ट करवाते हैं, डॉक्टरों की चौखट पर बार-बार आमद दर्ज करवाते रहते हैं। नए अध्ययनों के नाम पर अखबारों में जो डराने वाले लेख छपते हैं, वे किसी भी भले-चंगे आदमी को अपनी सेहत को लेकर शंकाओं से भर देने के लिए काफी हैं।
बीते हफ्ते मैंने एक ऐसे ऑटो ड्राइवर के बारे में पढ़ा, जिसे एक बच्ची से बलात्कार के संदेह में पुलिस ने उठवा लिया था। वह अब भी संदिग्ध आरोपी ही है। उसके खिलाफ जो सबूत मिले, वे कुछ भी साबित नहीं करते। उसे जमानत मिल सकती है, लेकिन कोई भी उसकी गारंटी देने को तैयार नहीं। यहां तक कि उसके करीबी दोस्त और उसका अपना परिवार भी उसका विश्वास नहीं करते।
उसके पास अपनी जमानत के पैसे नहीं हैं। उसकी बीवी उसे छोड़कर जा चुकी है और किसी और व्यक्ति के साथ ब्याह रचाकर नया घर बसा चुकी है। वह कहती है कि वह ऐसे किसी आदमी के साथ गुजारा नहीं कर सकती, जिस पर इतने घृणित अपराध का संदेह है।
उसके परिवार ने उससे इसलिए किनारा कर लिया है, क्योंकि उन्हें डर है कि उसके बचाव के लिए कोई कदम उठाने पर उनका अपने पास-पड़ोस में ही उठना-बैठना बंद हो सकता है। वो अपने घर भी नहीं लौट सकता क्योंकि उसे डर है कि वहां उसे मार दिया जाएगा।
इस आदमी के खिलाफ पाए गए सबूत अभी अदालत में भी नहीं पहुंचे, लेकिन उसकी जिंदगी पहले ही तबाह हो चुकी है। उसे गिरफ्तार किए जाने की खबर भर ने उसके जीवन की तस्वीर बदलकर रख दी। इस आदमी को इस बात की सजा नहीं मिल रही है कि उसका अपराध साबित हो गया है। उसे इस बात की सजा मिल रही है कि हमारा समाज अब भरोसा करने की ताकत खो चुका है। हम हमेशा किसी भी व्यक्ति की बुराइयों को मान लेने के लिए तैयार रहते हैं।
मैं एक अति सुरक्षित बहुमंजिला इमारत के चौबीसवें माले पर रहता हूं, जिसमें बिना आईडी कार्ड कोई दाखिल नहीं हो सकता। इसके बावजूद कितनी दफे मैंने घर का दरवाजा खुला छोड़ा है? कभी नहीं। कितनी दफे मैंने अपनी कार को जरा देर के लिए अनलॉक छोड़ दिया है? कभी नहीं। कितनी बार मैं किसी जरूरतमंद की मदद करने के लिए सड़क पर अपनी गाड़ी रोकता हूं? उतनी बार नहीं, जितनी बार मुझे रोकना चाहिए।
कितनी बार मैं किसी भूखे आवारा कुत्ते को कुछ खिलाने के लिए रुकता हूं? उतनी बार नहीं, जितनी बार मैं रुक सकता हूं। क्यों? क्योंकि मेरे जेहन में यह डर पैवस्त हो चुका है कि ऐसा करने पर मैं मुश्किल में पड़ सकता हूं। कितनी बार मैं किसी हादसे के शिकार व्यक्ति की मदद करता हूं? बमुश्किल कभी।
क्योंकि मुझे डर है कि इससे मुझे किसी पुलिस केस में घसीट लिया जाएगा। कितनी बार मैं किसी लावारिस बच्चे को पैसा देकर उसकी मदद करता हूं? उतनी बार नहीं, जितनी बार मैं करना चाहता हूं। क्योंकि मुझे डर है कि शायद इस तरह मैं भीख मांगने की प्रवृत्ति को बढ़ावा दे रहा होऊंगा। हमारी हर छोटी से छोटी हरकत के पीछे भरोसे की कमी झलकती है।
इसी कारण हमें टूटती दोस्तियों और बिखरते रिश्तों की कहानियां सुनना अच्छा लगता है। ऐसे मौकों पर हम हमेशा यह कहने को तैयार रहते हैं: ‘मैंने तो तुम्हें पहले ही कहा था!’ हम हमेशा अपने दोस्तों, नाते-रिश्तेदारों, सहकर्मियों, बच्चों को चौकस रहने की हिदायत देते रहते हैं। मां की अपने बच्चे को पहली यही हिदायत होती है कि किसी अजनबी से खाने की चीज न ले।
बीवियों की अपने पति को यही चेतावनी होती है कि खूबसूरत सेक्रेटरी रखने के बारे में सोचें भी नहीं। दोस्त एक-दूसरे को मशविरा देते हैं कि खूबसूरत या कामयाब व्यक्ति से शादी करने से पहले दो बार सोच लें। दरअसल आप जब भी किसी से कोई सलाह मांगते हैं तो बदले में आपको चेतावनियां ही मिलती हैं। हर चीज के बारे में हमारी पहली प्रतिक्रिया होती है: ‘देखना, जरा संभल के।’
भरोसे की इसी कमी को मीडिया भुनाता है। मेरी बेटियां हॉलीवुड की नामी-गिरामी शख्सियतों का एक शो देखती हैं। इस शो में कुल जमा यही बातें की जाती हैं कि किस तरह सभी एक-दूसरे को धोखा दे रहे हैं। हम भूल जाते हैं कि मीडिया और समाज का आपसी रिश्ता होता है। हम भरोसा तोड़ने की जितनी कहानियां दिखाते हैं, हमारे संबंध उतने ही कम भरोसे के लायक बनते जाते हैं।
केवल विवाह और प्रेम संबंध ही नहीं टूट रहे हैं, अविश्वास की खाई हमारे परिवार, समाज और हमारे समुदाय में भी पसरती जा रही है। उत्तरप्रदेश में यादव दलितों पर भरोसा नहीं करते। बिहार में दलित ब्राrाणों पर भरोसा नहीं करते। पाकिस्तान में सुन्नी शियाओं पर भरोसा नहीं करते। मुंबई के स्थानीय लोग किसी पर भरोसा नहीं करते। हरियाणा में बड़े-बुजुर्ग अपनी बेटियों पर ही भरोसा नहीं करते। वे खानदान की इज्जत के नाम पर बेरहमी से उनका कत्ल कर देते हैं।
हर आदमी धीरे-धीरे इसीलिए अकेला होता जा रहा है, क्योंकि उसने अब भरोसा करना छोड़ दिया है। यह सच है कि अब दुनिया उतनी सरल नहीं रही, जैसी वह कभी हुआ करती थी। लेकिन जैसे ही हम भरोसा करना छोड़ देते हैं, वैसे ही हम खुद को भीतर से बंद कर लेते हैं और अकेलेपन की कंदरा में खो जाते हैं।
हम प्यार कम करते हैं और डरते ज्यादा हैं। हम वहां भी कुछ न कुछ गलत होने का अंदाजा लगा लेते हैं, जहां कुछ भी गलत नहीं था। कुछ भी शक और गफलत के दायरे के परे नहीं रह गया है। भरोसा नहीं करने और गलतियां ढूंढ़ने की अपनी इसी प्रवृत्ति के चलते हम दिन-ब-दिन नाखुश, भयभीत और शंकालु होते चले जा रहे हैं।
भरोसे की कमी के चलते ही हमारे भीतर डर अपना डेरा डाल लेता है। यही डर दिन-ब-दिन हमें नुकसान पहुंचाता जा रहा है, क्योंकि जिंदगी को महज डरकर नहीं जिया जा सकता। जिंदगी में भरोसे की भी जगह है। जिंदगी में सम्मान, प्रेम और विश्वास की भी जगह है। यदि हम इन सबसे महरूम हो गए तो हमारे जीवन में कोई अर्थ नहीं रह जाएगा।
अचानक इतने सारे अरबपति कहां से पैदा हो गए?
इस समय हम हिंदुस्तान में डॉलर अरबपतियों की बढ़ रही संख्या का जश्न मना रहे हैं। हमारे मुताबिक यह वैश्विक अर्थव्यवस्था में हमारे बढ़ते दखल का संकेत है और हमारी समृद्धि का प्रमाण भी। संरचनागत सुधारों के मार्फत हमारी अर्थव्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन हो रहा है।
सरकार के इन दावों का आधार यही है कि दूसरी बार यूपीए की सरकार ने राष्ट्र के आर्थिक ढांचे में सुधार के लिए जितने प्रयास किए हैं, उतना और किसी ने नहीं किया। इस दावे में कितनी सच्चई है? क्या सचमुच हिंदुस्तान ने इतनी सारी संपदा पैदा कर दी है और अगर की है तो किस उद्देश्य से की है?
ऐसा दावा है कि वैश्विक आर्थिक मंदी के पहले पूरी दुनिया में डॉलर अरबपतियों के मामले में भारत रूस के बाद दूसरे नंबर पर था। अब हमारे प्रधानमंत्री के एक आर्थिक सलाहकार कहते हैं कि संभवत: हम ऐसे देश हैं, जहां ऐसे अरबपतियों की संख्या सबसे ज्यादा है।
अचानक इतने सारे अरबपति कहां से पैदा हो गए? क्या वे सॉफ्टवेअर उद्यमी हैं? नहीं। क्या वे रचनात्मक व्यवसाय से ताल्लुक रखने वाले हैं? नहीं। क्या वे मीडिया के लोग हैं? नहीं। क्या हमने गूगल, फेसबुक या ट्विटर बनाया है? नहीं। विश्व के सर्वश्रेष्ठ १क्क् ब्रांडों में कितने हमारे हैं? टाटा और संभवत: एयरटेल को छोड़कर शायद ही कोई ऐसा वैश्विक ब्रांड है।
प्रतिवर्ष हम कितने नए आविष्कार और वैश्विक स्तर के पेंटेंट रजिस्टर करते हैं? आप उनकी संख्या अपनी उंगलियों पर गिन सकते हैं। फिर इतनी विपुल धन-संपदा कहां से आ गई? बिल्कुल उसी तरह, जिस तरह रूसी अरबपतियों ने अपनी संपदा का निर्माण किया। सत्ता और जोड़गांठ के कामों में लगे हुए लोगों से नजदीकियां बनाकर, उन चीजों को हथियाकर जो दरअसल हमारी और आपकी हैं। हिंदुस्तान के समस्त नए धन का अधिकांश हिस्सा संदिग्ध जमीनों, रियल इस्टेट के धंधे, गैरकानूनी खनन, सरकारी ठेकों, विशेष आर्थिक क्षेत्रों, जो कभी अस्तित्व में आ ही नहीं सके, से आ रहा है।
दरअसल उन विशेष आर्थिक क्षेत्रों को अस्तित्व में लाना मकसद था भी नहीं, बल्कि उसका मकसद गरीब किसानों और उससे भी ज्यादा गरीब आदिवासियों को विस्थापित कर राज्य से मुनाफा वसूलना था। हम दुनिया की सबसे ऊंची इमारतों से मुकाबला करने के लिए 117 मंजिल वाले ऊंचे टॉवर खड़े कर रहे हैं, जबकि हमारे शहरों में पर्याप्त बिजली, पानी, पार्क, सड़कें और सार्वजनिक परिवहन की भी कोई व्यवस्था नहीं है। इन ऊंचे-ऊंचे टॉवरों के फ्लैट कौन खरीद रहा है? ये फ्लैट वे लोग खरीद रहे हैं, जो कानूनों को तोड़ते-मरोड़ते हैं, जो मंजूरी देते हैं।
जो यह मुमकिन बनाते हैं कि ये ऊंचे टॉवर खड़े किए जा सकें। ये वे लोग हैं, जो ये सुनिश्चित करते हैं कि मुझसे और आपसे पानी और बिजली छीनकर इन टॉवरों तक पहुंचाई जा सके। नेता, बाबू, बिल्डर, सत्ता के दलाल उनके इर्द-गिर्द छाए हुए हैं। यह हिंदुस्तान का सबसे शांत और सुकूनदेह नेटवर्क है। सबसे अमीर है और सबसे ज्यादा भ्रष्ट भी। नहीं, ये बात मैं नहीं कह रहा हूं। प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार ने यह बात कही। कॉमनवेल्थ खेलों से जुड़ा अनैतिकता और लालच का हर कांड यही बता रहा है।
600 करोड़ रुपए के प्रोजेक्ट में ये लोग 36,000 करोड़ रुपए निगल गए और अभी तक निगलते जा रहे हैं। इस लूट का परिमाण और इसका आकार इतना बड़ा था कि पूरी दुनिया के सामने भारत ने अपनी प्रतिष्ठा खो दी। रूस का विनाशकारी तत्व चोर-चोर मौसेरे भाई वाला पूंजीवाद यहां भी आ पहुंचा है। इसने हिंदुस्तान में सच्चे अर्थो में और बड़ी मजबूती से अपनी जड़ें जमा ली हैं। बिना कहे चुपके-चुपके निजीकरण हो रहा है। सिर्फ मुंबई के बिल्डरों को पता है कि माल को किस तरह बांटना है।
किससे लेकर किसको देना है, किस चीज के बदले में देना है। वे अपना मुंह नहीं खोल रहे हैं क्योंकि माल पाने के लिए वे खुद कतार में लगे हुए हैं और वे भलीभांति जानते हैं कि अगर कोई इसके खिलाफ गुस्सा प्रकट करेगा तो यह व्यवस्था किस तरह उससे प्रतिशोध ले सकती है। हर कोई जानता है कि जो भी कीमत चुकाने को तैयार हो, मुंबई की जमीन का एक-एक कोना उसके हाथों बिकने को तैयार है। पार्क, भिखारियों के घर, बूढ़े लोगों के आशियाने, वक्फ की संपत्ति, सारी झुग्गी-झोपड़ियां, समंदर के आसपास की वो जमीनें जहां नमक बनता है, मैंग्रूव्स (एक किस्म की झाड़ी, जो समंदर किनारे बसे शहरों में उगाई जाती है), पुरानी विरासत वाली संपत्ति, पहाड़, जंगल, समुद्र तट की जमीनें सबकुछ बिकने के लिए तैयार है। अब कुछ भी पवित्र नहीं है।
सीआरजेड (कोस्टल रेगुलेशन जोन) का भी कोई अर्थ नहीं है। सबकुछ हथियाने, कब्जा करने के लिए तैयार है। इतनी बड़ी संख्या में घर बनाए जा रहे हैं, जितने खरीदने वाले लोग भी नहीं हैं। इतने ऑफिस बन रहे हैं, जितनी शहर को कभी जरूरत ही नहीं पड़ेगी। एक के बाद एक बड़ी संख्या में मॉल उग रहे हैं, जहां बिक्री कम-से-कम होती जा रही है। फिर भी कीमतें कम नहीं हो रहीं क्योंकि अगर ऐसा हुआ तो मुनाफाखोरों को नुकसान होगा और आम आदमी को फायदा। और आखिर कौन चाहता है कि आम आदमी को फायदा पहुंचे?
निश्चित ही सरकार तो ऐसा बिल्कुल नहीं चाहती। एक समय ऐसा था, जब 64 करोड़ के बोफोर्स घोटाले के कारण 400 सांसदों के साथ सरकार गिर गई थी। आज हजारों करोड़ रुपयों के घोटाले हो रहे हैं, फिर भी किसी को कोई डर नहीं है क्योंकि विपक्ष भी मुनाफे के इस धंधे में दीवार नहीं बनना चाहता। हर कोई लूट में हिस्सेदार है और जब कोई पत्रकार या आरटीआई कार्यकर्ता इसके खिलाफ खड़ा होता है तो उसका मुंह बंद करने के लिए सिर्फ भाड़े के हत्यारों या झूठे मुकदमे की जरूरत होती है।
उसका मुंह बंद हो जाएगा। आप इसे जो कहना चाहें कहें - चोर-चोर मौसेरे भाई वाला पूंजीवाद, सरकारी खजाने की लूट या सीधे-सादे शब्दों में भ्रष्टाचार। लेकिन जो सरकार में बैठे हैं, वे इसे विकास कहते हैं। लेकिन यह कैसा विकास है, जिसमें मैं देख रहा हूं कि और-और लोग बेघर होते जा रहे हैं, और-और भिखारी बढ़ते जा रहे हैं, और-और बीमार लोग हैं, जो बिना इलाज के मर रहे हैं क्योंकि इलाज के लिए उनके पास पैसे नहीं हैं। और-और गरीब लोग और-और दरिद्रता और अभाव की हालत में जी रहे हैं? यह कैसा विकास है कि मैं और-और आत्महत्या कर रहे किसानों के बारे में पढ़ता हूं, और-और विद्यार्थी आत्महत्या कर रहे हैं क्योंकि वे नहीं जानते कि आखिर उनका भविष्य क्या है।
और-और लोग अपनी नौकरियां खोते जा रहे हैं, वे बेरोजगार हो रहे हैं। क्या हम हिंदुस्तान को और ज्यादा कुंठाओं, अपराधों और हिंसा के लिए तैयार कर रहे हैं? अगर ऐसा हुआ तो फिर हमारे इतने सारे अरबपति कहां जाएंगे?
सरकार के इन दावों का आधार यही है कि दूसरी बार यूपीए की सरकार ने राष्ट्र के आर्थिक ढांचे में सुधार के लिए जितने प्रयास किए हैं, उतना और किसी ने नहीं किया। इस दावे में कितनी सच्चई है? क्या सचमुच हिंदुस्तान ने इतनी सारी संपदा पैदा कर दी है और अगर की है तो किस उद्देश्य से की है?
ऐसा दावा है कि वैश्विक आर्थिक मंदी के पहले पूरी दुनिया में डॉलर अरबपतियों के मामले में भारत रूस के बाद दूसरे नंबर पर था। अब हमारे प्रधानमंत्री के एक आर्थिक सलाहकार कहते हैं कि संभवत: हम ऐसे देश हैं, जहां ऐसे अरबपतियों की संख्या सबसे ज्यादा है।
अचानक इतने सारे अरबपति कहां से पैदा हो गए? क्या वे सॉफ्टवेअर उद्यमी हैं? नहीं। क्या वे रचनात्मक व्यवसाय से ताल्लुक रखने वाले हैं? नहीं। क्या वे मीडिया के लोग हैं? नहीं। क्या हमने गूगल, फेसबुक या ट्विटर बनाया है? नहीं। विश्व के सर्वश्रेष्ठ १क्क् ब्रांडों में कितने हमारे हैं? टाटा और संभवत: एयरटेल को छोड़कर शायद ही कोई ऐसा वैश्विक ब्रांड है।
प्रतिवर्ष हम कितने नए आविष्कार और वैश्विक स्तर के पेंटेंट रजिस्टर करते हैं? आप उनकी संख्या अपनी उंगलियों पर गिन सकते हैं। फिर इतनी विपुल धन-संपदा कहां से आ गई? बिल्कुल उसी तरह, जिस तरह रूसी अरबपतियों ने अपनी संपदा का निर्माण किया। सत्ता और जोड़गांठ के कामों में लगे हुए लोगों से नजदीकियां बनाकर, उन चीजों को हथियाकर जो दरअसल हमारी और आपकी हैं। हिंदुस्तान के समस्त नए धन का अधिकांश हिस्सा संदिग्ध जमीनों, रियल इस्टेट के धंधे, गैरकानूनी खनन, सरकारी ठेकों, विशेष आर्थिक क्षेत्रों, जो कभी अस्तित्व में आ ही नहीं सके, से आ रहा है।
दरअसल उन विशेष आर्थिक क्षेत्रों को अस्तित्व में लाना मकसद था भी नहीं, बल्कि उसका मकसद गरीब किसानों और उससे भी ज्यादा गरीब आदिवासियों को विस्थापित कर राज्य से मुनाफा वसूलना था। हम दुनिया की सबसे ऊंची इमारतों से मुकाबला करने के लिए 117 मंजिल वाले ऊंचे टॉवर खड़े कर रहे हैं, जबकि हमारे शहरों में पर्याप्त बिजली, पानी, पार्क, सड़कें और सार्वजनिक परिवहन की भी कोई व्यवस्था नहीं है। इन ऊंचे-ऊंचे टॉवरों के फ्लैट कौन खरीद रहा है? ये फ्लैट वे लोग खरीद रहे हैं, जो कानूनों को तोड़ते-मरोड़ते हैं, जो मंजूरी देते हैं।
जो यह मुमकिन बनाते हैं कि ये ऊंचे टॉवर खड़े किए जा सकें। ये वे लोग हैं, जो ये सुनिश्चित करते हैं कि मुझसे और आपसे पानी और बिजली छीनकर इन टॉवरों तक पहुंचाई जा सके। नेता, बाबू, बिल्डर, सत्ता के दलाल उनके इर्द-गिर्द छाए हुए हैं। यह हिंदुस्तान का सबसे शांत और सुकूनदेह नेटवर्क है। सबसे अमीर है और सबसे ज्यादा भ्रष्ट भी। नहीं, ये बात मैं नहीं कह रहा हूं। प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार ने यह बात कही। कॉमनवेल्थ खेलों से जुड़ा अनैतिकता और लालच का हर कांड यही बता रहा है।
600 करोड़ रुपए के प्रोजेक्ट में ये लोग 36,000 करोड़ रुपए निगल गए और अभी तक निगलते जा रहे हैं। इस लूट का परिमाण और इसका आकार इतना बड़ा था कि पूरी दुनिया के सामने भारत ने अपनी प्रतिष्ठा खो दी। रूस का विनाशकारी तत्व चोर-चोर मौसेरे भाई वाला पूंजीवाद यहां भी आ पहुंचा है। इसने हिंदुस्तान में सच्चे अर्थो में और बड़ी मजबूती से अपनी जड़ें जमा ली हैं। बिना कहे चुपके-चुपके निजीकरण हो रहा है। सिर्फ मुंबई के बिल्डरों को पता है कि माल को किस तरह बांटना है।
किससे लेकर किसको देना है, किस चीज के बदले में देना है। वे अपना मुंह नहीं खोल रहे हैं क्योंकि माल पाने के लिए वे खुद कतार में लगे हुए हैं और वे भलीभांति जानते हैं कि अगर कोई इसके खिलाफ गुस्सा प्रकट करेगा तो यह व्यवस्था किस तरह उससे प्रतिशोध ले सकती है। हर कोई जानता है कि जो भी कीमत चुकाने को तैयार हो, मुंबई की जमीन का एक-एक कोना उसके हाथों बिकने को तैयार है। पार्क, भिखारियों के घर, बूढ़े लोगों के आशियाने, वक्फ की संपत्ति, सारी झुग्गी-झोपड़ियां, समंदर के आसपास की वो जमीनें जहां नमक बनता है, मैंग्रूव्स (एक किस्म की झाड़ी, जो समंदर किनारे बसे शहरों में उगाई जाती है), पुरानी विरासत वाली संपत्ति, पहाड़, जंगल, समुद्र तट की जमीनें सबकुछ बिकने के लिए तैयार है। अब कुछ भी पवित्र नहीं है।
सीआरजेड (कोस्टल रेगुलेशन जोन) का भी कोई अर्थ नहीं है। सबकुछ हथियाने, कब्जा करने के लिए तैयार है। इतनी बड़ी संख्या में घर बनाए जा रहे हैं, जितने खरीदने वाले लोग भी नहीं हैं। इतने ऑफिस बन रहे हैं, जितनी शहर को कभी जरूरत ही नहीं पड़ेगी। एक के बाद एक बड़ी संख्या में मॉल उग रहे हैं, जहां बिक्री कम-से-कम होती जा रही है। फिर भी कीमतें कम नहीं हो रहीं क्योंकि अगर ऐसा हुआ तो मुनाफाखोरों को नुकसान होगा और आम आदमी को फायदा। और आखिर कौन चाहता है कि आम आदमी को फायदा पहुंचे?
निश्चित ही सरकार तो ऐसा बिल्कुल नहीं चाहती। एक समय ऐसा था, जब 64 करोड़ के बोफोर्स घोटाले के कारण 400 सांसदों के साथ सरकार गिर गई थी। आज हजारों करोड़ रुपयों के घोटाले हो रहे हैं, फिर भी किसी को कोई डर नहीं है क्योंकि विपक्ष भी मुनाफे के इस धंधे में दीवार नहीं बनना चाहता। हर कोई लूट में हिस्सेदार है और जब कोई पत्रकार या आरटीआई कार्यकर्ता इसके खिलाफ खड़ा होता है तो उसका मुंह बंद करने के लिए सिर्फ भाड़े के हत्यारों या झूठे मुकदमे की जरूरत होती है।
उसका मुंह बंद हो जाएगा। आप इसे जो कहना चाहें कहें - चोर-चोर मौसेरे भाई वाला पूंजीवाद, सरकारी खजाने की लूट या सीधे-सादे शब्दों में भ्रष्टाचार। लेकिन जो सरकार में बैठे हैं, वे इसे विकास कहते हैं। लेकिन यह कैसा विकास है, जिसमें मैं देख रहा हूं कि और-और लोग बेघर होते जा रहे हैं, और-और भिखारी बढ़ते जा रहे हैं, और-और बीमार लोग हैं, जो बिना इलाज के मर रहे हैं क्योंकि इलाज के लिए उनके पास पैसे नहीं हैं। और-और गरीब लोग और-और दरिद्रता और अभाव की हालत में जी रहे हैं? यह कैसा विकास है कि मैं और-और आत्महत्या कर रहे किसानों के बारे में पढ़ता हूं, और-और विद्यार्थी आत्महत्या कर रहे हैं क्योंकि वे नहीं जानते कि आखिर उनका भविष्य क्या है।
और-और लोग अपनी नौकरियां खोते जा रहे हैं, वे बेरोजगार हो रहे हैं। क्या हम हिंदुस्तान को और ज्यादा कुंठाओं, अपराधों और हिंसा के लिए तैयार कर रहे हैं? अगर ऐसा हुआ तो फिर हमारे इतने सारे अरबपति कहां जाएंगे?
हमारा फिल्मी हीरो
अरसे बाद ऐसा हुआ है कि किसी फिल्म के प्रोमो ने मुझमें इतनी दिलचस्पी जगाई है कि मैं उसका पहले दिन का पहला शो देखने के लिए बेचैन हूं। मुझे नहीं पता कि फिल्म अच्छी होगी या बुरी। संभावना तो यही है कि फिल्म चलताऊ ही होगी। हाल ही में इस तरह की दो फिल्में आई थीं और वे दोनों भी ऐसी ही थीं। यह अलग बात है कि उन फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर खूब धूम मचाई।
उनमें से एक आमिर खान की फिल्म थी, जिसके बॉक्स ऑफिस प्रदर्शन के बाद आमिर ने मार्केटिंग के महारथी का रुतबा हासिल कर लिया। इसकी एक वजह यह भी रही कि आमिर ने शाहरुख खान की सल्तनत में सेंध लगा दी थी। शाहरुख खान रब ने बना दी जोड़ी जैसी फिल्म में अपने जाने-पहचाने रंग-ढंग के साथ मौजूद थे, लेकिन इस फिल्म के प्रदर्शन के महज दो हफ्तों बाद रिलीज हुई आमिर की फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर तहलका मचा दिया। देखते ही देखते सभी का ध्यान सुरिंदर साहनी से हटकर संजय सिंघानिया पर केंद्रित हो गया। मेरी नजर में दोनों ही फिल्में सामान्य थीं, लेकिन आमिर की फिल्म बहुत बड़ी हिट हो गई। साथ ही इसने बॉलीवुड को कामयाबी का एक नया मंत्र भी दे दिया : खूनखराबे से भरा ‘तमिल तड़का’।
इसकी सफलता के बाद इसी शैली की एक और फिल्म आई, लेकिन वह तमिल के बजाय तेलुगू मूल की थी : वांटेड। आप इससे बुरी किसी दूसरी फिल्म की कल्पना नहीं कर सकते। कमजोर कहानी, ढीली बुनावट, बिना किसी कुशलता के एक साथ नत्थी कर दिए गए अलग-अलग बिखरे हुए हिस्से। इसके बावजूद अगर इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर कामयाबी के झंडे गाड़ दिए तो उसकी वजह थे सलमान खान। सलमान अपने चिर-परिचित अंदाज में परदे पर आए थे और उनका यही जादू काम कर गया। स्क्रीन पर सलमान का होना ही काफी होता है।
अगर आप मेरी तरह फिल्म को उसके प्रीमियर या टीवी पर नहीं देखते हैं। अगर आप फिल्म को मल्टीप्लेक्स के बजाय सिंगल स्क्रीन टॉकीज में देखते हैं, तो आप समझ सकते हैं कि सलमान का जादू क्यों चलता है। अकड़ से भरी उनकी चाल पर सीटियां बजती हैं। पुराने ढब के इन टॉकीजों में सलमान की हर अदा पर तालियां पड़ती हैं। उनके संवादों को दर्शक दोहराते हैं। कई ऐसे भी होते हैं, जो इससे पहले भी कई बार वह फिल्म देख चुके होते हैं। वे भी सलमान के साथ-साथ डायलॉग बोलकर सुनाते हैं।
सलमान अकेले ऐसे सितारे हैं, जिनके प्रशंसक उनसे अभिनय की उम्मीद नहीं करते। वे बस इतना ही चाहते हैं कि सलमान ठसक के साथ अकड़कर चलें, गाहे-बगाहे एकाध करारे डायलॉग छोड़ते रहें और जरूरत पड़ने पर अपने से भी कद्दावर गुंडों की ठुकाई कर दें। हां, वे एक क्षण के लिए अपनी तालियां सबसे ज्यादा सहेजकर रखते हैं, वह पल होता है जब सलमान अपनी शर्ट उतारते हैं। फिर चाहे सलमान को यह काम किसी की पिटाई करने के लिए करना पड़े या कोई चालू किस्म का गाना गाने के लिए।
आमिर इससे ठीक उलट हैं। वे कभी नहीं चाहते कि उनसे कोई गलती हो। उनके लिए हर रोल जिंदगी और मौत का सवाल होता है। उनकी फिल्में भी सलमान की फिल्मों के ठीक उलट होती हैं। वे इतनी एहतियात के साथ बनाई गई होती हैं कि प्रत्येक दृश्य से फिल्म की भावना और अहसास नजर आते हैं। फिल्म के दृश्यों में आमिर का व्यावहारिक कौशल नजर आ ही जाता है, लेकिन उन्हें इसलिए नजरअंदाज कर दिया जाता है क्योंकि वे आमिर हैं और कुछ भी गलत नहीं कर सकते। अब तो आमिर के प्रोडच्यूसरों ने भी खुलकर शाहरुख खान के साथ नंबर गेम की जंग छेड़ दी है।
पूरे-पूरे पन्नों के विज्ञापन छपवाए जाते हैं, जिनमें आमिर की फिल्मों के बॉक्स ऑफिस प्रदर्शन के आंकड़े होते हैं। यह सिलसिला तब तक जारी रहता है, जब तक फिल्मी पंडित इस जोड़-गणित से तौबा नहीं कर लेते। अक्षय कुमार के निर्माताओं ने भी कुछ समय के लिए नंबर गेम की इस होड़ में शिरकत की, पर पिछली कुछ फिल्मों के पिटने के बाद वे अब खामोश हो गए हैं। लेकिन अक्षय का करिश्मा अब भी बरकरार है। अक्षय जानते हैं कि उनके पास हंसी-ठिठोली का ऐसा माद्दा है कि यदि पटकथा में थोड़ी-बहुत झोल भी हो तो वे उसे छुपा लेंगे। शायद इसी भरोसे से अक्षय आंख मूंदकर कोई भी फिल्म साइन कर लेते हैं।
यह बड़े मजे की बात है कि आज सलमान को छोड़ बाकी सारे फिल्मी अभिनेता ‘स्टार’ नहीं लगते। वे अब स्टार से ज्यादा बिजनेसमैन दिखने लगे हैं। शाहरुख तो एक बिजनेस पत्रिका के कवर पर भी अवतरित हो चुके हैं। अब वे स्टार के बजाय किसी प्रोडच्यूसर सरीखा व्यवहार करते ज्यादा नजर आते हैं। यही हाल आमिर का भी है। वे भूल रहे हैं कि इस तरह एक बड़ा प्रशंसक वर्ग तैयार नहीं किया जा सकता।
आम आदमी अमूमन रुपए-पैसों के गणित में उलझे रहने वाले शख्स को पसंद नहीं करता। लोग आम तौर पर बिजनेसमैन को पसंद नहीं करते। जब मैं छोटा था, तब अधिकतर फिल्मों में खलनायक गांव का महाजन या शहर का सफेदपोश साहूकार ही होता था। अब भारत की तस्वीर बदल गई है और लोगों के लिए पैसा कोई खराब चीज नहीं रह गई है, लेकिन हमारे देश का आम आदमी आज भी किसी अमीर आदमी के बजाय अपने हीरो को ही रुपहले परदे पर देखना पसंद करता है। पूरे दो दशक तक हमारे बॉलीवुड का हीरो एक ऐसा एंग्री यंग मैन रहा, जो सिस्टम से अकेले लड़ता था और अकेले ही गुनहगारों का पर्दाफाश भी कर देता था।
इसीलिए मैं एक बार फिर चुलबुल पांडे के बारे में सोच रहा हूं। मुझे कोई शक नहीं है कि दबंग किस तरह की फिल्म होगी। लेकिन मैं ऐसी फिल्मों को पसंद करता हूं, जिनमें कोई सिरफिरा किस्म का हीरो उतनी ही सिरफिरी किस्म की कहानी के साथ हमारे सामने आता है और परदे पर अजीबोगरीब हरकतें करते हुए दर्शकों का दिल जीत लेता है। आज सलमान से बेहतर इस काम को और कोई अंजाम नहीं दे सकता।
क्या मैं खुद कभी इस तरह की कोई फिल्म बनाऊंगा? शायद नहीं। क्या मैं आपको इस तरह की कोई फिल्म देखने का सुझाव दूंगा? कतई नहीं। लेकिन क्या मैं सीटियां बजाते, तालियां पीटते दीवाने प्रशंसकों के बीच किसी एकल ठाठिया टॉकीज में यह फिल्म देखने जाऊंगा? जी हां। फिल्म देखने के इस सबसे मजेदार अनुभव के लिए ही मैं पैसे खर्च करता हूं। यह मुझे अपने बचपन के दिनों की याद दिलाता है। यह मुझे उन फिल्मों की याद दिलाता है, जहां हमारी फिल्में निहायत ‘फिल्मी’ किस्म की हुआ करती थीं और हमारे फिल्मी हीरो कुछ भी कर सकते थे।
उनमें से एक आमिर खान की फिल्म थी, जिसके बॉक्स ऑफिस प्रदर्शन के बाद आमिर ने मार्केटिंग के महारथी का रुतबा हासिल कर लिया। इसकी एक वजह यह भी रही कि आमिर ने शाहरुख खान की सल्तनत में सेंध लगा दी थी। शाहरुख खान रब ने बना दी जोड़ी जैसी फिल्म में अपने जाने-पहचाने रंग-ढंग के साथ मौजूद थे, लेकिन इस फिल्म के प्रदर्शन के महज दो हफ्तों बाद रिलीज हुई आमिर की फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर तहलका मचा दिया। देखते ही देखते सभी का ध्यान सुरिंदर साहनी से हटकर संजय सिंघानिया पर केंद्रित हो गया। मेरी नजर में दोनों ही फिल्में सामान्य थीं, लेकिन आमिर की फिल्म बहुत बड़ी हिट हो गई। साथ ही इसने बॉलीवुड को कामयाबी का एक नया मंत्र भी दे दिया : खूनखराबे से भरा ‘तमिल तड़का’।
इसकी सफलता के बाद इसी शैली की एक और फिल्म आई, लेकिन वह तमिल के बजाय तेलुगू मूल की थी : वांटेड। आप इससे बुरी किसी दूसरी फिल्म की कल्पना नहीं कर सकते। कमजोर कहानी, ढीली बुनावट, बिना किसी कुशलता के एक साथ नत्थी कर दिए गए अलग-अलग बिखरे हुए हिस्से। इसके बावजूद अगर इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर कामयाबी के झंडे गाड़ दिए तो उसकी वजह थे सलमान खान। सलमान अपने चिर-परिचित अंदाज में परदे पर आए थे और उनका यही जादू काम कर गया। स्क्रीन पर सलमान का होना ही काफी होता है।
अगर आप मेरी तरह फिल्म को उसके प्रीमियर या टीवी पर नहीं देखते हैं। अगर आप फिल्म को मल्टीप्लेक्स के बजाय सिंगल स्क्रीन टॉकीज में देखते हैं, तो आप समझ सकते हैं कि सलमान का जादू क्यों चलता है। अकड़ से भरी उनकी चाल पर सीटियां बजती हैं। पुराने ढब के इन टॉकीजों में सलमान की हर अदा पर तालियां पड़ती हैं। उनके संवादों को दर्शक दोहराते हैं। कई ऐसे भी होते हैं, जो इससे पहले भी कई बार वह फिल्म देख चुके होते हैं। वे भी सलमान के साथ-साथ डायलॉग बोलकर सुनाते हैं।
सलमान अकेले ऐसे सितारे हैं, जिनके प्रशंसक उनसे अभिनय की उम्मीद नहीं करते। वे बस इतना ही चाहते हैं कि सलमान ठसक के साथ अकड़कर चलें, गाहे-बगाहे एकाध करारे डायलॉग छोड़ते रहें और जरूरत पड़ने पर अपने से भी कद्दावर गुंडों की ठुकाई कर दें। हां, वे एक क्षण के लिए अपनी तालियां सबसे ज्यादा सहेजकर रखते हैं, वह पल होता है जब सलमान अपनी शर्ट उतारते हैं। फिर चाहे सलमान को यह काम किसी की पिटाई करने के लिए करना पड़े या कोई चालू किस्म का गाना गाने के लिए।
आमिर इससे ठीक उलट हैं। वे कभी नहीं चाहते कि उनसे कोई गलती हो। उनके लिए हर रोल जिंदगी और मौत का सवाल होता है। उनकी फिल्में भी सलमान की फिल्मों के ठीक उलट होती हैं। वे इतनी एहतियात के साथ बनाई गई होती हैं कि प्रत्येक दृश्य से फिल्म की भावना और अहसास नजर आते हैं। फिल्म के दृश्यों में आमिर का व्यावहारिक कौशल नजर आ ही जाता है, लेकिन उन्हें इसलिए नजरअंदाज कर दिया जाता है क्योंकि वे आमिर हैं और कुछ भी गलत नहीं कर सकते। अब तो आमिर के प्रोडच्यूसरों ने भी खुलकर शाहरुख खान के साथ नंबर गेम की जंग छेड़ दी है।
पूरे-पूरे पन्नों के विज्ञापन छपवाए जाते हैं, जिनमें आमिर की फिल्मों के बॉक्स ऑफिस प्रदर्शन के आंकड़े होते हैं। यह सिलसिला तब तक जारी रहता है, जब तक फिल्मी पंडित इस जोड़-गणित से तौबा नहीं कर लेते। अक्षय कुमार के निर्माताओं ने भी कुछ समय के लिए नंबर गेम की इस होड़ में शिरकत की, पर पिछली कुछ फिल्मों के पिटने के बाद वे अब खामोश हो गए हैं। लेकिन अक्षय का करिश्मा अब भी बरकरार है। अक्षय जानते हैं कि उनके पास हंसी-ठिठोली का ऐसा माद्दा है कि यदि पटकथा में थोड़ी-बहुत झोल भी हो तो वे उसे छुपा लेंगे। शायद इसी भरोसे से अक्षय आंख मूंदकर कोई भी फिल्म साइन कर लेते हैं।
यह बड़े मजे की बात है कि आज सलमान को छोड़ बाकी सारे फिल्मी अभिनेता ‘स्टार’ नहीं लगते। वे अब स्टार से ज्यादा बिजनेसमैन दिखने लगे हैं। शाहरुख तो एक बिजनेस पत्रिका के कवर पर भी अवतरित हो चुके हैं। अब वे स्टार के बजाय किसी प्रोडच्यूसर सरीखा व्यवहार करते ज्यादा नजर आते हैं। यही हाल आमिर का भी है। वे भूल रहे हैं कि इस तरह एक बड़ा प्रशंसक वर्ग तैयार नहीं किया जा सकता।
आम आदमी अमूमन रुपए-पैसों के गणित में उलझे रहने वाले शख्स को पसंद नहीं करता। लोग आम तौर पर बिजनेसमैन को पसंद नहीं करते। जब मैं छोटा था, तब अधिकतर फिल्मों में खलनायक गांव का महाजन या शहर का सफेदपोश साहूकार ही होता था। अब भारत की तस्वीर बदल गई है और लोगों के लिए पैसा कोई खराब चीज नहीं रह गई है, लेकिन हमारे देश का आम आदमी आज भी किसी अमीर आदमी के बजाय अपने हीरो को ही रुपहले परदे पर देखना पसंद करता है। पूरे दो दशक तक हमारे बॉलीवुड का हीरो एक ऐसा एंग्री यंग मैन रहा, जो सिस्टम से अकेले लड़ता था और अकेले ही गुनहगारों का पर्दाफाश भी कर देता था।
इसीलिए मैं एक बार फिर चुलबुल पांडे के बारे में सोच रहा हूं। मुझे कोई शक नहीं है कि दबंग किस तरह की फिल्म होगी। लेकिन मैं ऐसी फिल्मों को पसंद करता हूं, जिनमें कोई सिरफिरा किस्म का हीरो उतनी ही सिरफिरी किस्म की कहानी के साथ हमारे सामने आता है और परदे पर अजीबोगरीब हरकतें करते हुए दर्शकों का दिल जीत लेता है। आज सलमान से बेहतर इस काम को और कोई अंजाम नहीं दे सकता।
क्या मैं खुद कभी इस तरह की कोई फिल्म बनाऊंगा? शायद नहीं। क्या मैं आपको इस तरह की कोई फिल्म देखने का सुझाव दूंगा? कतई नहीं। लेकिन क्या मैं सीटियां बजाते, तालियां पीटते दीवाने प्रशंसकों के बीच किसी एकल ठाठिया टॉकीज में यह फिल्म देखने जाऊंगा? जी हां। फिल्म देखने के इस सबसे मजेदार अनुभव के लिए ही मैं पैसे खर्च करता हूं। यह मुझे अपने बचपन के दिनों की याद दिलाता है। यह मुझे उन फिल्मों की याद दिलाता है, जहां हमारी फिल्में निहायत ‘फिल्मी’ किस्म की हुआ करती थीं और हमारे फिल्मी हीरो कुछ भी कर सकते थे।
लोक संगीत का वैभव
लोक संगीत का वास्तविक वैभव प्रदेश में ही जीवित है। लोक गीतों में समर्पण, प्रेम, शौर्य और चारित्रिक वैभव का जादू जागता है। ढोला मारू राजस्थान का मूल लोकसंगीत है लेकिन यहां मालवा, निमाड़ और बुंदेलखंड में जीवित है।
ढोला मारू का प्रेम, उनका बिछड़ना और वापस मिलना इस लोक संगीत में अपने तरीके से रूपायित होता है। कलगी तुर्रा मंडला, मालवा, बुंदेलखंड और निमाड़ में चंग और डफ की बीट्स पर गाया जाता है। महाभारत से लेकर पुराणों की कथाएं इसमें शामिल की जाती हैं। यह चंदेरी राजा शिशुपाल के जमाने से चला आया है।
संत सिंगाजी, कबीर, मीरा और दादू के निगरुणी भजनों की सौगात एकतारा और खड़ताल के जरिये जीवन पाती है। निमाड़ में फाग गाया जाता है। नवरात्रि में शक्तिरूपा की पूजा गरबा में रूपायित होती है। मालवा में भृर्तहरि की कविताएं गूंजती हैं। चिंकारा (सारंगी जैसा वाद्य) पर इनकी धुनें कमाल करती हैं।
यहीं पर संजा भी गाया और बनाया जाता है। बरसाती बार्ता भी मालवा में गाया जाता है। बुंदेलखंड वीरों की भूमि कहलाती है। यहां आल्हा ऊदल गाया जाता है। वीरता, ईमान और आल्हा ऊदल के 52 युद्ध इन गीतों में आकार पाते हैं। होली, ठाकुर, इसुरी, राई फाग भी गाने के वैभवशाली रूप हैं। देवरी भी दीवाली पर गाए जाने वाले गीत हैं जिनका वैभव भी अनूठा है।
ढोला मारू का प्रेम, उनका बिछड़ना और वापस मिलना इस लोक संगीत में अपने तरीके से रूपायित होता है। कलगी तुर्रा मंडला, मालवा, बुंदेलखंड और निमाड़ में चंग और डफ की बीट्स पर गाया जाता है। महाभारत से लेकर पुराणों की कथाएं इसमें शामिल की जाती हैं। यह चंदेरी राजा शिशुपाल के जमाने से चला आया है।
संत सिंगाजी, कबीर, मीरा और दादू के निगरुणी भजनों की सौगात एकतारा और खड़ताल के जरिये जीवन पाती है। निमाड़ में फाग गाया जाता है। नवरात्रि में शक्तिरूपा की पूजा गरबा में रूपायित होती है। मालवा में भृर्तहरि की कविताएं गूंजती हैं। चिंकारा (सारंगी जैसा वाद्य) पर इनकी धुनें कमाल करती हैं।
यहीं पर संजा भी गाया और बनाया जाता है। बरसाती बार्ता भी मालवा में गाया जाता है। बुंदेलखंड वीरों की भूमि कहलाती है। यहां आल्हा ऊदल गाया जाता है। वीरता, ईमान और आल्हा ऊदल के 52 युद्ध इन गीतों में आकार पाते हैं। होली, ठाकुर, इसुरी, राई फाग भी गाने के वैभवशाली रूप हैं। देवरी भी दीवाली पर गाए जाने वाले गीत हैं जिनका वैभव भी अनूठा है।
सोमवार, 6 सितंबर 2010
पूंजी के आदिम संचय का घातक हथियार
चीन में 62 हजार किमी हाइवे बन चुका है और एक भी किसान भू-अधिग्रहण के लिए गोली से नहीं मारा गया। यहां सिर्फ 200 किमी एक्सप्रेस वे बना है और सैकड़ों लोग गोलियों से भून डाले गए है
आखिर इतनी तेजी के साथ भू-अधिग्रहण क्यों और किसके लिए किया जा रहा है, वह भी एक ऐसे देश में जहां की 70 फीसद आबादी खेती पर निर्भर है। लगता है देश के विकास की देशी अवधारणा वैश्वीकरण की आंधी में उड़ चुकी है और विश्व पूंजी की हवस को विकास का नाम दे दिया गया है। सरकारें किसी भी दल की हों, भू-कानूनों में परिवर्तन करके कारपोरेट जगत के लिए किसानों की जमीनों की हड़प को आसान बना रही है। अटल सरकार ने 2002 में उस कानून को बदल दिया था जिसके जरिए कोई विदेशी कम्पनी भारत में खेती की जमीन खरीद कर अथवा ठेके पर लेकर खेती नहीं कर सकती थी। मनमोहन सरकार 1894 के भू-अधिग्रहण कानून की जगह जो नया विधेयक तैयार कर रही है; उसमें जमीन अधिग्रहण के समय किसानों की सहमति आवश्यक बताने वाली धारा 5(अ) को खत्म किया जा रहा है। साथ ही परियोजना की कुल 70 फीसद जमीन निजी कम्पनियां किसानों से सौदा करके हासिल करेंगी और 30 फीसद सरकार अधिग्रहण करके उन्हें मुहैया करायेगी। इस तरह भविष्य में कान्ट्रेक्ट फार्मिंग और कारपोरेट फार्मिंग की तैयारियां जोर-शोर से शुरू कर दी गई है। खुद मायावती सरकार उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन एक्ट 1950 धारा 3 (अ) 6 (व) में संशोधन करके, निजी कम्पनियों के लिए दी जानी वाली भूमि की मंजूरी का अधिकार मंत्रिमंडल से हटाकर मुख्य मंत्री के अधीन कर चुकी है। इसी तरह कई अन्य राज्य अपने सीलिंग कानूनों को कम्पनियों के दबाव में बदल रहे है। तमिलनाडु सरकार 50 लाख एकड़ सरकारी जमीन बहुराष्ट्रीय व निजी कम्पनियों को सौप चुकी है। पहली बात तो किसान इन विशालकाय कम्पनियों के साथ सौदेबाजी की स्थिति में नहीं होते। दूसरे ये कम्पनियां, किसानों के पुनर्वास आदि से बच कर निकल जाएंगी। किसानों की जमीन को हड़पने की तैयारियां राज्य से केंद्रीय स्तरों पर की जा रही है। यह पूंजी के आदिम संचय का नंगा रूप है। उसकी ताजा मिसाल खुद जिकरपुर है। मॉडल सिटी के नाम पर जेपी समूह पांच गांवों के किसानों की जमीन का मात्र 446 प्रति वर्ग मीटर की दर से मुआवजा दे रहा है और इस जमीन को 5500 प्रति वर्ग मीटर के भाव से बेचा जा रहा है। इसी प्रकार, नोएडा में 880 प्रति वर्गमीटर लेकर उसी जमीन को 6200 में बेचा जा रहा है। यह कैसा विकास लगता है, बहुराष्ट्रीय कम्पनियां, इजारेदार मीडिया एवं समूचे तंत्र ने मिलकर विकास की अवधारणा का ही अपहरण कर लिया है। हाईटैक मॉडल सिटी, गोल्फ कोर्स, नाइट सफारी, कैसिनो, मॉल आदि विकास के प्रतीक बना दिए गए है। भारत में इनका इस्तेमाल 10 फीसद से ज्यादा लोग नहीं कर सकते। अब इतने फीसद लोगों के लिए किसानों की उपजाऊ जमीन का अधिग्रहण देश को कैसे विकास की तरफ ले जाएगा? भारत बाकी एक अरब लोगों के पेट भरने के साधन को नष्ट करके किए जा रहे विकास का देश हित से क्या मतलब है? उत्तर प्रदेश में एक्सप्रेस हाइवे के लिए जमीन का अधिग्रहण हो रहा है। वह भी निजी कम्पनियों द्वारा। ये कम्पनियां 35-40 वषां तक टोल टैक्स वसूल करंेगी। इसके लिए यूपीए सरकार ने 2008 में टोल टैक्स को थोक मूल्य सूचकांक से जोड़कर उनके दीर्घकालीन मुनाफे की पक्की गारंटी कर दी है। इन सड़कों पर देश की 70 फीसद आबादी चलने की हिम्मत नहीं जुटा पाएगी। टेम्पुओं, बसों, रेलों में भेड़-बकरी की तरह भरकर चलने वाले लोगों के लिए ये सड़कें नहीं होंगी। उप्र में लगभग डेढ़ लाख हेक्टेयर उपजाऊ जमीन यमुना एक्सप्रेस हाइवे और गंगा एक्सप्रेस हाइवे के लिए ली जा रही है। किसानों की रोजी-रोटी उजाड़कर पर्यावरण को नष्ट कर आखिर यह विकास किसके लिए है? स्पेशल इकोनॉमिक जोन (सेज) देश भर में लगभग 1 लाख हेक्टेयर जमीन अब तक 300 से अधिक सेज बनाने के लिए दे दी गई है। सस्ते में किसानों की उपजाऊ जमीन लेकर उद्योगों को श्रम कानूनों और टैक्स के नियमों से बरी कर दिया गया। मगर इनका विकास में कितना योगदान है इसका जीता-जागता उदाहरण आन्ध्राप्रदेश है। जहां सबसे अधिक सेज बने है और वहीं सबसे अधिक संख्या में किसान आत्महत्या भी कर चुके है। यह सिलसिला जारी है। स्पष्ट है, विकास के ये उक्त मॉडल कारपोरेट जगत के मुनाफा का दीर्घकालीन आधारभूत ढांचा खड़ा करने के लिए अपनाए जा रहे है। एक अरब लोगों की बुनियादी जरूरतों से इनका कोई लेना-देना नहीं है। विकास के मॉडल में चीन आगे इस विकास की भेंट चढ़ रहे 70 फीसद लोगों के लिए तो विकास की यह प्रक्रिया भयावह प्राकृतिक आपदा का रूप लेती जा रही है। हमसे दो साल बाद आजाद हुआ चीन का उदाहरण लीजिए। वहां 62 हजार किमी हाइवे बन चुका है और एक भी किसान भू-अधिग्रहण के लिए गोली से नहीं मारा गया। यहां सिर्फ 200 किमी एक्सप्रेस वे बना है और सैकड़ों लोग गोलियों से भून डाले गए है। उप्र में नोएडा से मथुरा तक बेहतर मुआवजे की मांग करते हुए 10 लोग पिछले साढ़े तीन वर्ष में गोलियों से भूने जा चुके है। एक भी पुलिस वाले के खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं हुई है। चीन में केवल 6-7 स्पेशल इकोनॉमिक जोन बने है जबकि हमारे देश में 1000 हजार से ज्यादा सेज के प्रस्ताव स्वीकृत किये जा चुके है। चीन में कृषि जमीन हमसे कम होते हुए भी वहां का अनाज उत्पादन 51 करोड़ टन पहुंच चुका है। भारत में अभी 21 करोड़ टन उत्पादन पर ही हम कदम ताल कर रहे है। वहां प्रतिदिन प्रति व्यक्ति डेढ़ किलो औसत अनाज का उपभोग होता है जबकि हमारे देश में प्रति व्यक्ति खपत मात्र 400 ग्राम है। चीन में विकास की जिम्मेदारी सरकार ने खुद संभाली हुई है जबकि हमारी सरकार डब्ल्यू़टीओ की शतां के तहत चल रही है। अहम सवाल विकास का यह मॉडल देश की खाद्य सुरक्षा को खतरे में डाल रहा है। कृषि जिन्सों की आपूर्ति और मांग दोनों को संकुचित कर रहा है। कृषि में मांग-आपूर्ति का संकुचन देर सवेर निरुद्योगीकरण को पैदा करता है। हमें ध्यान रखना होगा कि खेती से उजड़कर 70 फीसद लोग कहां जाएंगें। चूंकि रोजगार विहीन विकास के इस दौर में उनके औद्योगिक मजदूर बनने की प्रक्रिया पहले से ही बन्द हो चुकी है। अत: कम्पनियों की लूट व सरकार के दमन चक्र का व्यापक प्रतिरोध करने तथा उग्रवाद और अराजकता की तरफ किसानों को बढ़ने से रोकने की जिम्मेदारी संगठित किसान आन्दोलन को संभालनी होगी।
आखिर इतनी तेजी के साथ भू-अधिग्रहण क्यों और किसके लिए किया जा रहा है, वह भी एक ऐसे देश में जहां की 70 फीसद आबादी खेती पर निर्भर है। लगता है देश के विकास की देशी अवधारणा वैश्वीकरण की आंधी में उड़ चुकी है और विश्व पूंजी की हवस को विकास का नाम दे दिया गया है। सरकारें किसी भी दल की हों, भू-कानूनों में परिवर्तन करके कारपोरेट जगत के लिए किसानों की जमीनों की हड़प को आसान बना रही है। अटल सरकार ने 2002 में उस कानून को बदल दिया था जिसके जरिए कोई विदेशी कम्पनी भारत में खेती की जमीन खरीद कर अथवा ठेके पर लेकर खेती नहीं कर सकती थी। मनमोहन सरकार 1894 के भू-अधिग्रहण कानून की जगह जो नया विधेयक तैयार कर रही है; उसमें जमीन अधिग्रहण के समय किसानों की सहमति आवश्यक बताने वाली धारा 5(अ) को खत्म किया जा रहा है। साथ ही परियोजना की कुल 70 फीसद जमीन निजी कम्पनियां किसानों से सौदा करके हासिल करेंगी और 30 फीसद सरकार अधिग्रहण करके उन्हें मुहैया करायेगी। इस तरह भविष्य में कान्ट्रेक्ट फार्मिंग और कारपोरेट फार्मिंग की तैयारियां जोर-शोर से शुरू कर दी गई है। खुद मायावती सरकार उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन एक्ट 1950 धारा 3 (अ) 6 (व) में संशोधन करके, निजी कम्पनियों के लिए दी जानी वाली भूमि की मंजूरी का अधिकार मंत्रिमंडल से हटाकर मुख्य मंत्री के अधीन कर चुकी है। इसी तरह कई अन्य राज्य अपने सीलिंग कानूनों को कम्पनियों के दबाव में बदल रहे है। तमिलनाडु सरकार 50 लाख एकड़ सरकारी जमीन बहुराष्ट्रीय व निजी कम्पनियों को सौप चुकी है। पहली बात तो किसान इन विशालकाय कम्पनियों के साथ सौदेबाजी की स्थिति में नहीं होते। दूसरे ये कम्पनियां, किसानों के पुनर्वास आदि से बच कर निकल जाएंगी। किसानों की जमीन को हड़पने की तैयारियां राज्य से केंद्रीय स्तरों पर की जा रही है। यह पूंजी के आदिम संचय का नंगा रूप है। उसकी ताजा मिसाल खुद जिकरपुर है। मॉडल सिटी के नाम पर जेपी समूह पांच गांवों के किसानों की जमीन का मात्र 446 प्रति वर्ग मीटर की दर से मुआवजा दे रहा है और इस जमीन को 5500 प्रति वर्ग मीटर के भाव से बेचा जा रहा है। इसी प्रकार, नोएडा में 880 प्रति वर्गमीटर लेकर उसी जमीन को 6200 में बेचा जा रहा है। यह कैसा विकास लगता है, बहुराष्ट्रीय कम्पनियां, इजारेदार मीडिया एवं समूचे तंत्र ने मिलकर विकास की अवधारणा का ही अपहरण कर लिया है। हाईटैक मॉडल सिटी, गोल्फ कोर्स, नाइट सफारी, कैसिनो, मॉल आदि विकास के प्रतीक बना दिए गए है। भारत में इनका इस्तेमाल 10 फीसद से ज्यादा लोग नहीं कर सकते। अब इतने फीसद लोगों के लिए किसानों की उपजाऊ जमीन का अधिग्रहण देश को कैसे विकास की तरफ ले जाएगा? भारत बाकी एक अरब लोगों के पेट भरने के साधन को नष्ट करके किए जा रहे विकास का देश हित से क्या मतलब है? उत्तर प्रदेश में एक्सप्रेस हाइवे के लिए जमीन का अधिग्रहण हो रहा है। वह भी निजी कम्पनियों द्वारा। ये कम्पनियां 35-40 वषां तक टोल टैक्स वसूल करंेगी। इसके लिए यूपीए सरकार ने 2008 में टोल टैक्स को थोक मूल्य सूचकांक से जोड़कर उनके दीर्घकालीन मुनाफे की पक्की गारंटी कर दी है। इन सड़कों पर देश की 70 फीसद आबादी चलने की हिम्मत नहीं जुटा पाएगी। टेम्पुओं, बसों, रेलों में भेड़-बकरी की तरह भरकर चलने वाले लोगों के लिए ये सड़कें नहीं होंगी। उप्र में लगभग डेढ़ लाख हेक्टेयर उपजाऊ जमीन यमुना एक्सप्रेस हाइवे और गंगा एक्सप्रेस हाइवे के लिए ली जा रही है। किसानों की रोजी-रोटी उजाड़कर पर्यावरण को नष्ट कर आखिर यह विकास किसके लिए है? स्पेशल इकोनॉमिक जोन (सेज) देश भर में लगभग 1 लाख हेक्टेयर जमीन अब तक 300 से अधिक सेज बनाने के लिए दे दी गई है। सस्ते में किसानों की उपजाऊ जमीन लेकर उद्योगों को श्रम कानूनों और टैक्स के नियमों से बरी कर दिया गया। मगर इनका विकास में कितना योगदान है इसका जीता-जागता उदाहरण आन्ध्राप्रदेश है। जहां सबसे अधिक सेज बने है और वहीं सबसे अधिक संख्या में किसान आत्महत्या भी कर चुके है। यह सिलसिला जारी है। स्पष्ट है, विकास के ये उक्त मॉडल कारपोरेट जगत के मुनाफा का दीर्घकालीन आधारभूत ढांचा खड़ा करने के लिए अपनाए जा रहे है। एक अरब लोगों की बुनियादी जरूरतों से इनका कोई लेना-देना नहीं है। विकास के मॉडल में चीन आगे इस विकास की भेंट चढ़ रहे 70 फीसद लोगों के लिए तो विकास की यह प्रक्रिया भयावह प्राकृतिक आपदा का रूप लेती जा रही है। हमसे दो साल बाद आजाद हुआ चीन का उदाहरण लीजिए। वहां 62 हजार किमी हाइवे बन चुका है और एक भी किसान भू-अधिग्रहण के लिए गोली से नहीं मारा गया। यहां सिर्फ 200 किमी एक्सप्रेस वे बना है और सैकड़ों लोग गोलियों से भून डाले गए है। उप्र में नोएडा से मथुरा तक बेहतर मुआवजे की मांग करते हुए 10 लोग पिछले साढ़े तीन वर्ष में गोलियों से भूने जा चुके है। एक भी पुलिस वाले के खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं हुई है। चीन में केवल 6-7 स्पेशल इकोनॉमिक जोन बने है जबकि हमारे देश में 1000 हजार से ज्यादा सेज के प्रस्ताव स्वीकृत किये जा चुके है। चीन में कृषि जमीन हमसे कम होते हुए भी वहां का अनाज उत्पादन 51 करोड़ टन पहुंच चुका है। भारत में अभी 21 करोड़ टन उत्पादन पर ही हम कदम ताल कर रहे है। वहां प्रतिदिन प्रति व्यक्ति डेढ़ किलो औसत अनाज का उपभोग होता है जबकि हमारे देश में प्रति व्यक्ति खपत मात्र 400 ग्राम है। चीन में विकास की जिम्मेदारी सरकार ने खुद संभाली हुई है जबकि हमारी सरकार डब्ल्यू़टीओ की शतां के तहत चल रही है। अहम सवाल विकास का यह मॉडल देश की खाद्य सुरक्षा को खतरे में डाल रहा है। कृषि जिन्सों की आपूर्ति और मांग दोनों को संकुचित कर रहा है। कृषि में मांग-आपूर्ति का संकुचन देर सवेर निरुद्योगीकरण को पैदा करता है। हमें ध्यान रखना होगा कि खेती से उजड़कर 70 फीसद लोग कहां जाएंगें। चूंकि रोजगार विहीन विकास के इस दौर में उनके औद्योगिक मजदूर बनने की प्रक्रिया पहले से ही बन्द हो चुकी है। अत: कम्पनियों की लूट व सरकार के दमन चक्र का व्यापक प्रतिरोध करने तथा उग्रवाद और अराजकता की तरफ किसानों को बढ़ने से रोकने की जिम्मेदारी संगठित किसान आन्दोलन को संभालनी होगी।
मंगलवार, 31 अगस्त 2010
मैथ का रोमांस
अट्ठारह साल के एक नौजवान ने अपने पिता को लिखे पत्र में बड़े उत्साह से अपने रिसर्च टॉपिक के बारे में बताया। जवाब में भेजी गई चिट्ठी में पिता ने लिखा- मेरे बेटे, समानांतर रेखाओं के फेरे में तो तुम हरगिज न पड़ना। यह रास्ता मेरे लिए अच्छी तरह जाना-बूझा है। न जाने कितनी अंतहीन रातें जाग कर मैंने इसकी थाह लेने की कोशिश की है लेकिन मेरे जीवन की सारी रोशनी, मेरी सारी खुशी इस प्रयास में स्वाहा हो गई। इसे उतनी ही हिकारत से त्याग दो, जैसे कोई सच्चरित्र व्यक्ति अवैध यौन संबंध के प्रस्ताव से नजरें फेर लेता है। यह तुम्हें जीवन के हर आनंद से वंचित कर देगा। तुम्हारा स्वास्थ्य चौपट हो जाएगा, आराम छिन जाएगा और तुम्हारे जीवन से प्रसन्नता सदा के लिए लुप्त हो जाएगी।'
हंगरी के दो महान गणितज्ञों जानोस बोल्याई और फर्कास बोल्याई के बीच 1820 में हुआ यह पत्र-व्यवहार गणित के इतिहास में सदियों संजो कर रखने लायक चीज बन गया है। यहां वे ज्योमेट्री (रेखागणित) की आधारशिला रखने वाले यूनानी गणितज्ञ यूक्लिड की पांचवीं प्रस्थापना के बारे में बात कर रहे हैं, जो इस प्रकार है- किसी रेखा के बाहर स्थित एक बिंदु से होकर उस रेखा के समानांतर एक और केवल एक ही रेखा खींची जा सकती है। ईसा के तीन सौ साल पहले दी गई यूक्लिड की प्रस्थापनाओं को पूरी दुनिया में अंतिम सत्य माना जाता था, लेकिन यूरोप के आधुनिक गणितज्ञों में पांचवीं प्रस्थापना को लेकर कुछ शंका मौजूद थी। यह यूक्लिड की बाकी प्रस्थापनाओं, मसलन, दो चीजें अगर तीसरी चीज के बराबर हों तो वे आपस में भी बराबर होती हैं, की तरह कॉमन सेंस वाला मामला तो था नहीं। ऐसे में वे इसे प्रस्थापना के बजाय प्रमेय मानकर सोलहवीं सदी से ही इसे सही या गलत साबित करने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन कहीं पहुंच नहीं पा रहे थे।
जानोस और फर्कास की कहानी को आगे बढ़ाने पर इसका एक कोण विश्व इतिहास के पांच महानतम गणितज्ञों में एक कहे जाने वाले जर्मन मैथमेटिशियन कार्ल फ्रेडरिक गॉस से जुड़ता है। फर्कास अपने बेटे को दस साल की उम्र में गॉस के यहां ले गए थे और उसे अपने शिष्य के रूप में स्वीकार करने का निवेदन किया था। गॉस इसके लिए तैयार नहीं हुए और जानोस को पढ़ाई के लिए विएना भेज दिया गया। वहां घूम-फिर कर उनकी रुचि यूक्लिड की पांचवीं प्रस्थापना में ही अटक गई, जो उनके पिता की पूरी जवानी खा गई थी। लेकिन फर्कास से विपरीत जानोस की कोशिश कामयाब रही। यूक्लिड को सही या गलत साबित करने के प्रयास में वे नॉन-यूक्लिडियन ज्योमेट्री की नींव रखने की ओर चले गए। 1822 में उन्होंने फर्कास को लिखा- 'मैंने शून्य से एक अद्भुत, नया ब्रह्मांड रच डाला है।'
फर्कास बोल्याई को अपने बेटे का काम अपनी तपस्या पूरी होने जैसा लगा। अगले दस वर्षों में उन्होंने अपना ग्रंथ 'टेंटामेन' पूरा किया और उसके परिशिष्ट में जानोस बोल्याई की खोज को महत्वपूर्ण जगह दी। 1932 में प्रकाशित अपनी इस किताब को उन्होंने मूल्यांकन के लिए गॉस के पास भेजा और उनसे खास तौर पर अपने बेटे के काम के बारे में राय मांगी। जवाब में गॉस ने लिखा - 'इसकी प्रशंसा करना मेरे लिए खुद की प्रशंसा करने जैसा होगा। क्योंकि इस काम की लगभग पूरी अंतर्वस्तु .... मेरे खुद के सोच-विचार के संपूर्णत: समतुल्य है।' जानोस के लिए गॉस का यह जवाब दिल तोड़ देने वाला साबित हुआ। उनकी नौकरी छूट गई। वे धीरे-धीरे घुलने लगे और कुल 57 साल की उम्र में 10 हजार पृष्ठों की गणितीय पांडुलिपियां अपने पीछे छोड़कर दुनिया से विदा हो गए।
अपने जवाब में गॉस किसी खलनायक जैसे नजर आते हैं, लेकिन यहां उनका दोष सिर्फ थोड़े अतिकथन का है। नॉन - यूक्लिडियन ज्योमेट्री में उनका काम जानोस बोल्याई से मिलता-जुलता है, लेकिन दोनों में संपूर्णतः समतुल्य जैसा कुछ नहीं है। गॉस का सबसे कमजोर पक्ष यह था कि ज्योमेट्री के पुराण-पुरुष यूक्लिड की बात काटने की हिम्मत वे नहीं कर पाए और इसी हिचक में अपने काम को सार्वजनिक करने से रह गए। जानोस और गॉस के आसपास ही लोबाचेव्स्की ने और फिर राइमान ने नॉन-यूक्लिडियन ज्योमेट्री को मुकम्मल शक्ल दी और आज की गणित या भौतिकी की कल्पना इसके बगैर नहीं की जा सकती।
एक विज्ञान के रूप में गणित की छवि किसी तपस्वी की साधना जैसी ही है। इसकी क्रांतिकारी खोजें भी प्राय: अचर्चित रह जाती हैं। या चर्चित होने में उन्हें इतना वक्त लगता है कि खोजी के लिए अपनी खोज ही बेमानी हो जाती है। इसके दो उज्ज्वल अपवाद यूनान के आर्किमिडीज और ब्रिटेन के आइजक न्यूटन हैं, जो जितने बड़े गणितज्ञ थे, उतने ही बड़े मिलिट्री साइंटिस्ट भी थे। उनका असर जितना आने वाले समय पर पड़ा, उतना ही अपने समय पर भी दर्ज किया गया। बतौर गणितज्ञ उनकी हैसियत को उनके शाही रुतबे के चलते कम करके नहीं आंका गया। लेकिन पिछली सदी में इस खेल के नियम बदल गए।
जी. एच. हार्डी ने ( भारतीय गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन को दुनिया के सामने लाने के लिए हम जिनके प्रति कृतज्ञ हैं ) अपने निबंध 'अ मैथमेटिशियंस अपॉलजी' में प्योर मैथमेटिक्स और एप्लाइड मैथमेटिक्स को बिल्कुल अलग-अलग चीजों की तरह देखा है। वे अपना जीवन एक ऐसे गणित के प्रति समर्पित बताते हैं, जिसका कोई व्यावहारिक महत्व नहीं है। इसका उन्हें कोई दुख नहीं है। बस एक संतोष है कि अपनी जिंदगी उन्होंने एक सौंदर्य की खोज में लगाई है, किसी के लिए मुनाफा कमाने या युद्ध जीतने की कवायद में नहीं। यह बात और है कि अंकगणित से जुड़ा हार्डी और रामानुजन का बहुत सारा काम द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान (यानी अपॉलजी लिखे जाते समय भी) कूट संकेतों के विज्ञान क्रिप्टॉलजी में इस्तेमाल हो रहा था और इसके बारे में उन्हें पता तक नहीं था।
इंसान का लालच और उसकी खुदगर्जी संसार की हर चीज का इस्तेमाल कर सकती है। प्योर मैथमेटिक्स के पुजारी किसी भी गिरि-कंदरा में छिप जाएं, धंधेबाज लोग वहां से भी उनके काम को खोज लाएंगे और अपने धंधे में लगा लेंगे। लेकिन हार्डी के निबंध का मूल तत्व प्योर मैथमेटिक्स को महिमामंडित करने का नहीं, गणित के उस दूसरे पहलू को सामने लाने का है, जो अपने सौंदर्य में पेंटिंग, संगीत या कविता जैसा और सत्य के प्रति अपने आग्रह में दर्शन जैसा है। अभी के समय में रूसी गणितज्ञ ग्रिगोरी पेरेलमान हार्डी के इन मानकों पर सबसे ज्यादा खरे उतरते हैं, हालांकि अपनी ही दुनिया में मगन रहने वाले इस साधक के बारे में उसके करीबी लोगों का कहना है कि गणित से उनका रिश्ता अब बीते दिनों की बात हो चुका है। एक खटास भरे प्रकरण के बाद उन्होंने खुद को अपने दूसरे शौकों, जैसे पियानो बजाने और टेबल टेनिस खेलने तक सिमटा लिया है।
गणित के सामने मौजूद सहस्राब्दी की सात सबसे बड़ी चुनौतियों में एक प्वांकारे कंजेक्चर (जिसका कुछ सिर-पैर जानने के लिए आपको सतहों के उतार-चढ़ाव से जुड़े टोपॉलजी के कठिन शास्त्र में घुसना पड़ेगा) को उन्होंने हल किया लेकिन इसके लिए मिले फील्ड्स मेडल और दस लाख डॉलर के मिलेनियम अवार्ड को यह कह कर ठुकरा दिया कि गणित के क्षेत्र में आई अनैतिकता या अनैतिक तत्वों को बर्दाश्त करने की प्रवृत्ति उन्हें इनको अपनाने से रोक रही है। दरअसल, गणित का नोबेल कहे जाने वाले फील्ड्स मेडल से विभूषित चीन के दो गणितज्ञों ने पेरेलमान की खोज का श्रेय अपने देश के ही दो चेलों को देने का प्रयास किया, हालांकि इस पूरे एपीसोड का अंत चीनी गणितज्ञों के माफीनामे और उनके द्वारा अपनी रिसर्च वापस लेने के रूप में हुआ। गणित की दुनिया के लिए ऐसे कथित राष्ट्रवादी प्रयास बिल्कुल बेमानी माने जाते रहे हैं, लेकिन दुनिया को अपने ठेंगे पर रखने वाला गणितज्ञ समुदाय भी आजकल चीन की आर्थिक ताकत के सामने खड़े होने की हिम्मत नहीं जुटा पाता।
हंगरी के दो महान गणितज्ञों जानोस बोल्याई और फर्कास बोल्याई के बीच 1820 में हुआ यह पत्र-व्यवहार गणित के इतिहास में सदियों संजो कर रखने लायक चीज बन गया है। यहां वे ज्योमेट्री (रेखागणित) की आधारशिला रखने वाले यूनानी गणितज्ञ यूक्लिड की पांचवीं प्रस्थापना के बारे में बात कर रहे हैं, जो इस प्रकार है- किसी रेखा के बाहर स्थित एक बिंदु से होकर उस रेखा के समानांतर एक और केवल एक ही रेखा खींची जा सकती है। ईसा के तीन सौ साल पहले दी गई यूक्लिड की प्रस्थापनाओं को पूरी दुनिया में अंतिम सत्य माना जाता था, लेकिन यूरोप के आधुनिक गणितज्ञों में पांचवीं प्रस्थापना को लेकर कुछ शंका मौजूद थी। यह यूक्लिड की बाकी प्रस्थापनाओं, मसलन, दो चीजें अगर तीसरी चीज के बराबर हों तो वे आपस में भी बराबर होती हैं, की तरह कॉमन सेंस वाला मामला तो था नहीं। ऐसे में वे इसे प्रस्थापना के बजाय प्रमेय मानकर सोलहवीं सदी से ही इसे सही या गलत साबित करने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन कहीं पहुंच नहीं पा रहे थे।
जानोस और फर्कास की कहानी को आगे बढ़ाने पर इसका एक कोण विश्व इतिहास के पांच महानतम गणितज्ञों में एक कहे जाने वाले जर्मन मैथमेटिशियन कार्ल फ्रेडरिक गॉस से जुड़ता है। फर्कास अपने बेटे को दस साल की उम्र में गॉस के यहां ले गए थे और उसे अपने शिष्य के रूप में स्वीकार करने का निवेदन किया था। गॉस इसके लिए तैयार नहीं हुए और जानोस को पढ़ाई के लिए विएना भेज दिया गया। वहां घूम-फिर कर उनकी रुचि यूक्लिड की पांचवीं प्रस्थापना में ही अटक गई, जो उनके पिता की पूरी जवानी खा गई थी। लेकिन फर्कास से विपरीत जानोस की कोशिश कामयाब रही। यूक्लिड को सही या गलत साबित करने के प्रयास में वे नॉन-यूक्लिडियन ज्योमेट्री की नींव रखने की ओर चले गए। 1822 में उन्होंने फर्कास को लिखा- 'मैंने शून्य से एक अद्भुत, नया ब्रह्मांड रच डाला है।'
फर्कास बोल्याई को अपने बेटे का काम अपनी तपस्या पूरी होने जैसा लगा। अगले दस वर्षों में उन्होंने अपना ग्रंथ 'टेंटामेन' पूरा किया और उसके परिशिष्ट में जानोस बोल्याई की खोज को महत्वपूर्ण जगह दी। 1932 में प्रकाशित अपनी इस किताब को उन्होंने मूल्यांकन के लिए गॉस के पास भेजा और उनसे खास तौर पर अपने बेटे के काम के बारे में राय मांगी। जवाब में गॉस ने लिखा - 'इसकी प्रशंसा करना मेरे लिए खुद की प्रशंसा करने जैसा होगा। क्योंकि इस काम की लगभग पूरी अंतर्वस्तु .... मेरे खुद के सोच-विचार के संपूर्णत: समतुल्य है।' जानोस के लिए गॉस का यह जवाब दिल तोड़ देने वाला साबित हुआ। उनकी नौकरी छूट गई। वे धीरे-धीरे घुलने लगे और कुल 57 साल की उम्र में 10 हजार पृष्ठों की गणितीय पांडुलिपियां अपने पीछे छोड़कर दुनिया से विदा हो गए।
अपने जवाब में गॉस किसी खलनायक जैसे नजर आते हैं, लेकिन यहां उनका दोष सिर्फ थोड़े अतिकथन का है। नॉन - यूक्लिडियन ज्योमेट्री में उनका काम जानोस बोल्याई से मिलता-जुलता है, लेकिन दोनों में संपूर्णतः समतुल्य जैसा कुछ नहीं है। गॉस का सबसे कमजोर पक्ष यह था कि ज्योमेट्री के पुराण-पुरुष यूक्लिड की बात काटने की हिम्मत वे नहीं कर पाए और इसी हिचक में अपने काम को सार्वजनिक करने से रह गए। जानोस और गॉस के आसपास ही लोबाचेव्स्की ने और फिर राइमान ने नॉन-यूक्लिडियन ज्योमेट्री को मुकम्मल शक्ल दी और आज की गणित या भौतिकी की कल्पना इसके बगैर नहीं की जा सकती।
एक विज्ञान के रूप में गणित की छवि किसी तपस्वी की साधना जैसी ही है। इसकी क्रांतिकारी खोजें भी प्राय: अचर्चित रह जाती हैं। या चर्चित होने में उन्हें इतना वक्त लगता है कि खोजी के लिए अपनी खोज ही बेमानी हो जाती है। इसके दो उज्ज्वल अपवाद यूनान के आर्किमिडीज और ब्रिटेन के आइजक न्यूटन हैं, जो जितने बड़े गणितज्ञ थे, उतने ही बड़े मिलिट्री साइंटिस्ट भी थे। उनका असर जितना आने वाले समय पर पड़ा, उतना ही अपने समय पर भी दर्ज किया गया। बतौर गणितज्ञ उनकी हैसियत को उनके शाही रुतबे के चलते कम करके नहीं आंका गया। लेकिन पिछली सदी में इस खेल के नियम बदल गए।
जी. एच. हार्डी ने ( भारतीय गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन को दुनिया के सामने लाने के लिए हम जिनके प्रति कृतज्ञ हैं ) अपने निबंध 'अ मैथमेटिशियंस अपॉलजी' में प्योर मैथमेटिक्स और एप्लाइड मैथमेटिक्स को बिल्कुल अलग-अलग चीजों की तरह देखा है। वे अपना जीवन एक ऐसे गणित के प्रति समर्पित बताते हैं, जिसका कोई व्यावहारिक महत्व नहीं है। इसका उन्हें कोई दुख नहीं है। बस एक संतोष है कि अपनी जिंदगी उन्होंने एक सौंदर्य की खोज में लगाई है, किसी के लिए मुनाफा कमाने या युद्ध जीतने की कवायद में नहीं। यह बात और है कि अंकगणित से जुड़ा हार्डी और रामानुजन का बहुत सारा काम द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान (यानी अपॉलजी लिखे जाते समय भी) कूट संकेतों के विज्ञान क्रिप्टॉलजी में इस्तेमाल हो रहा था और इसके बारे में उन्हें पता तक नहीं था।
इंसान का लालच और उसकी खुदगर्जी संसार की हर चीज का इस्तेमाल कर सकती है। प्योर मैथमेटिक्स के पुजारी किसी भी गिरि-कंदरा में छिप जाएं, धंधेबाज लोग वहां से भी उनके काम को खोज लाएंगे और अपने धंधे में लगा लेंगे। लेकिन हार्डी के निबंध का मूल तत्व प्योर मैथमेटिक्स को महिमामंडित करने का नहीं, गणित के उस दूसरे पहलू को सामने लाने का है, जो अपने सौंदर्य में पेंटिंग, संगीत या कविता जैसा और सत्य के प्रति अपने आग्रह में दर्शन जैसा है। अभी के समय में रूसी गणितज्ञ ग्रिगोरी पेरेलमान हार्डी के इन मानकों पर सबसे ज्यादा खरे उतरते हैं, हालांकि अपनी ही दुनिया में मगन रहने वाले इस साधक के बारे में उसके करीबी लोगों का कहना है कि गणित से उनका रिश्ता अब बीते दिनों की बात हो चुका है। एक खटास भरे प्रकरण के बाद उन्होंने खुद को अपने दूसरे शौकों, जैसे पियानो बजाने और टेबल टेनिस खेलने तक सिमटा लिया है।
गणित के सामने मौजूद सहस्राब्दी की सात सबसे बड़ी चुनौतियों में एक प्वांकारे कंजेक्चर (जिसका कुछ सिर-पैर जानने के लिए आपको सतहों के उतार-चढ़ाव से जुड़े टोपॉलजी के कठिन शास्त्र में घुसना पड़ेगा) को उन्होंने हल किया लेकिन इसके लिए मिले फील्ड्स मेडल और दस लाख डॉलर के मिलेनियम अवार्ड को यह कह कर ठुकरा दिया कि गणित के क्षेत्र में आई अनैतिकता या अनैतिक तत्वों को बर्दाश्त करने की प्रवृत्ति उन्हें इनको अपनाने से रोक रही है। दरअसल, गणित का नोबेल कहे जाने वाले फील्ड्स मेडल से विभूषित चीन के दो गणितज्ञों ने पेरेलमान की खोज का श्रेय अपने देश के ही दो चेलों को देने का प्रयास किया, हालांकि इस पूरे एपीसोड का अंत चीनी गणितज्ञों के माफीनामे और उनके द्वारा अपनी रिसर्च वापस लेने के रूप में हुआ। गणित की दुनिया के लिए ऐसे कथित राष्ट्रवादी प्रयास बिल्कुल बेमानी माने जाते रहे हैं, लेकिन दुनिया को अपने ठेंगे पर रखने वाला गणितज्ञ समुदाय भी आजकल चीन की आर्थिक ताकत के सामने खड़े होने की हिम्मत नहीं जुटा पाता।
मार दे सटा के लोहा गरम बा
अब मैंने भी मान लिया है कि मैं जिस देश में रहता हूं, वह वीर जवानों का देश है। कोई भी मान लेगा। अरे, किसकी हिम्मत है जो नहीं मानेगा? वीर जवान पटककर मनवा देंगे। दो बजे रात में बैंड वाला बजाता है-’ये देश है वीर जवानों का ..।’ देश की जवानी लाउडस्पीकर पर चिग्घाड़ती है। वीर जवान नाच रहे हैं। दो बजे रात में नाचना-गाना, हंसी-खेल तो है नहीं? वीरता का यह काम वीर जवान ही कर सकते हैं। कर रहे हैं।
अपने देश में वीर बूढ़े भी हैं। उनका भी जमाना था। जवानी थी। अभी वे वीर जवानों से कम्पटीशन कर रहे हैं। उनके, यानी वीर बूढ़ों के लिए चूंकि गाने का कोई बोल लांच नहीं किया है, इसलिए वीर जवानों की धुन से काम चला रहे हैं। वीर जवानों के साथ अलबेला-मस्ताने हो रहे हैं। अहा, क्या सीन है! देखिये :-
जो वीर जवान थोड़ा होश में है, वह पूरे इलाके की होश उड़ा रहा है। दो- ढाई बजे रात में पटाखे फोड़ रहा है। कुछ वीर जवान गोलियां चला रहे हैं। धुआंधार। ताबड़तोड़। तर्ज यही कि अगर पटाखे न फूटें, गोलियां न चलें, तो बैंड की यह धुन चरितार्थ नहीं होगी कि ‘आज मेरे यार की शादी है।’ और शायद इसीलिए ही मंत्रोच्चारण को भी लाउडस्पीकर से जोड़ दिया गया है।
अभी-अभी मेरे मुहल्ले की एक बारात ब्रह्म मुहूर्त (करीब साढ़े तीन बजे) में लगी। इसमें कुछ ज्यादा ही वीर जवान थे। दूल्हा भी वीरता दिखा रहा था। बैंड वाला बजा रहा था- ‘नथुनिये पे गोली मारे सैंया हमार ..’, ‘तू लगईलू जब लिपिस्टिक, त हिले आरा डिस्टिक ..’, ‘जिमी-जिमी- जिमी, आ जा-आ जा-आ जा।’ (शायद बारात एडवांस में चली आयी थी)। किसकी हिम्मत है, जो वीर जवानों के पास जाये? मेरे पड़ोसी ने ‘100′ डायल किया। नो रिस्पांश। मैं उन्हें समझा रहा था। वे उन वीरों पर कानूनी वीरता दिखाना चाहते थे, जिनमें कई लालबत्ती वाले थे। उनके पास राइफल-बंदूकें थीं।
अपना बिहार वीर जवानों की जवानी, उनकी वीरता को कमोबेश हर क्षण जीने का अनुभवी रहा है। लगन, इसका विस्तारित स्वरूप है। नये-नये टाइप्स। तरह-तरह की वीरता। यह चौतरफा फैली है। चिरैयाटांड़ पुल जाम हो जाता है। वीर जवान डाकबंगला चौराहा पर नाचते हैं। मुहल्ले की सड़क को घेर लेते हैं। एकाध दिन की बात तो समझ में आती है मगर शादी के चार दिन पहले से लेकर शादी के तीन दिन बाद तक की घेराबंदी। महीने भर तक वीर जवानों और वीर बूढ़ों के घर के मेनू का लगभग हर सड़ा पक्ष (गरम मसाला से लेकर प्याज तक) मुहल्ले को शादी वाले दिन के पकवान का बड़े ही बेतुके अंदाज में अहसास कराता है।
तनिक इस वीरता को देखिये। अपनी बेटी की शादी में दूसरे की बेटी को नचा रहे हैं। मजलिस में वीर बूढ़े कुछ ज्यादा चहकते हैं। वीर बेटा-भतीजा की बगल में बैठकर नाचने वाली पर रुपये लुटाते हैं। नर्तकी आंचल ओढ़ाती है, मटककर लाउडस्पीकर पर वीर बूढ़े का नाम लेकर शुक्रिया अदा करती है। वीरता दूर तक गूंजती है। शराब-बंदूक और लड़की (डांसर) का त्रिकोण, वीरता का नार्मल सिचुएशन है। और वाकई इससे बड़ी वीरता क्या हो सकती है कि पसंदीदा गाना न सुनाने के चलते नाचने वाली को सबके सामने गोली मार दो।
ऐसे ही एक बारात में मेरी मुलाकात कुछ वीरों से हुई। वे रात में मुझे पटक कर रसगुल्ला खिला रहे थे। सुबह में गोली मारने पर आमादा थे। भई, मूड-मूड की बात है। वीरों का अपना मूड होता है। मैंने एक बारात में दूल्हे को भी अपने ससुराल वालों पर गोली चलाते देखा है। कन्या निरीक्षण के वक्त चंदोवा (शामियाना) को गोलियों से फाड़ डालना, क्या वीरता नहीं है? कुछ वीर दरवाजा लगते समय दूसरे पक्ष की लड़कियों की तस्वीरें उतारने की वीरता दिखाते हैं, तो दूसरे वीर उनका कैमरा तोड़ डालते हैं। कई वीरों ने अपनी गोली से अपनों को ही मार डाला है।
यह वीरता ही तो है कि दहेज में पांच सौ रुपये भी न छोड़ो और पच्चीस हजार के पटाखे फोड़ डालो। असल में अपने यहां वीरता दर्शाने की कुछ ज्यादा ही गुंजाइश है। यहां का आदमी कुछ ज्यादा ही आजाद है। मुकम्मल आजाद है। वह सिर्फ अपना अधिकार याद रखने को आजाद है। उसने इसी आजादी के साथ अपने कर्तव्य की देखरेख का जिम्मा सरकार को दे दिया है। उसकी आजादी, रगों में दौड़ने वाले खून से बाहर निकल स्वतंत्रता की परंपरागत परिभाषा को नया विस्तार दे रही है। तरह-तरह की आजादी है। इनकी चर्चा फिर कभी। फिलहाल, ‘ये देश है वीर जवानों का ..’ की धुन पर रात में दो बजे नाचने की प्रैक्टिस कीजिये। यही आपकी वीरता का प्रमाण है।
अपने देश में वीर बूढ़े भी हैं। उनका भी जमाना था। जवानी थी। अभी वे वीर जवानों से कम्पटीशन कर रहे हैं। उनके, यानी वीर बूढ़ों के लिए चूंकि गाने का कोई बोल लांच नहीं किया है, इसलिए वीर जवानों की धुन से काम चला रहे हैं। वीर जवानों के साथ अलबेला-मस्ताने हो रहे हैं। अहा, क्या सीन है! देखिये :-
जो वीर जवान थोड़ा होश में है, वह पूरे इलाके की होश उड़ा रहा है। दो- ढाई बजे रात में पटाखे फोड़ रहा है। कुछ वीर जवान गोलियां चला रहे हैं। धुआंधार। ताबड़तोड़। तर्ज यही कि अगर पटाखे न फूटें, गोलियां न चलें, तो बैंड की यह धुन चरितार्थ नहीं होगी कि ‘आज मेरे यार की शादी है।’ और शायद इसीलिए ही मंत्रोच्चारण को भी लाउडस्पीकर से जोड़ दिया गया है।
अभी-अभी मेरे मुहल्ले की एक बारात ब्रह्म मुहूर्त (करीब साढ़े तीन बजे) में लगी। इसमें कुछ ज्यादा ही वीर जवान थे। दूल्हा भी वीरता दिखा रहा था। बैंड वाला बजा रहा था- ‘नथुनिये पे गोली मारे सैंया हमार ..’, ‘तू लगईलू जब लिपिस्टिक, त हिले आरा डिस्टिक ..’, ‘जिमी-जिमी- जिमी, आ जा-आ जा-आ जा।’ (शायद बारात एडवांस में चली आयी थी)। किसकी हिम्मत है, जो वीर जवानों के पास जाये? मेरे पड़ोसी ने ‘100′ डायल किया। नो रिस्पांश। मैं उन्हें समझा रहा था। वे उन वीरों पर कानूनी वीरता दिखाना चाहते थे, जिनमें कई लालबत्ती वाले थे। उनके पास राइफल-बंदूकें थीं।
अपना बिहार वीर जवानों की जवानी, उनकी वीरता को कमोबेश हर क्षण जीने का अनुभवी रहा है। लगन, इसका विस्तारित स्वरूप है। नये-नये टाइप्स। तरह-तरह की वीरता। यह चौतरफा फैली है। चिरैयाटांड़ पुल जाम हो जाता है। वीर जवान डाकबंगला चौराहा पर नाचते हैं। मुहल्ले की सड़क को घेर लेते हैं। एकाध दिन की बात तो समझ में आती है मगर शादी के चार दिन पहले से लेकर शादी के तीन दिन बाद तक की घेराबंदी। महीने भर तक वीर जवानों और वीर बूढ़ों के घर के मेनू का लगभग हर सड़ा पक्ष (गरम मसाला से लेकर प्याज तक) मुहल्ले को शादी वाले दिन के पकवान का बड़े ही बेतुके अंदाज में अहसास कराता है।
तनिक इस वीरता को देखिये। अपनी बेटी की शादी में दूसरे की बेटी को नचा रहे हैं। मजलिस में वीर बूढ़े कुछ ज्यादा चहकते हैं। वीर बेटा-भतीजा की बगल में बैठकर नाचने वाली पर रुपये लुटाते हैं। नर्तकी आंचल ओढ़ाती है, मटककर लाउडस्पीकर पर वीर बूढ़े का नाम लेकर शुक्रिया अदा करती है। वीरता दूर तक गूंजती है। शराब-बंदूक और लड़की (डांसर) का त्रिकोण, वीरता का नार्मल सिचुएशन है। और वाकई इससे बड़ी वीरता क्या हो सकती है कि पसंदीदा गाना न सुनाने के चलते नाचने वाली को सबके सामने गोली मार दो।
ऐसे ही एक बारात में मेरी मुलाकात कुछ वीरों से हुई। वे रात में मुझे पटक कर रसगुल्ला खिला रहे थे। सुबह में गोली मारने पर आमादा थे। भई, मूड-मूड की बात है। वीरों का अपना मूड होता है। मैंने एक बारात में दूल्हे को भी अपने ससुराल वालों पर गोली चलाते देखा है। कन्या निरीक्षण के वक्त चंदोवा (शामियाना) को गोलियों से फाड़ डालना, क्या वीरता नहीं है? कुछ वीर दरवाजा लगते समय दूसरे पक्ष की लड़कियों की तस्वीरें उतारने की वीरता दिखाते हैं, तो दूसरे वीर उनका कैमरा तोड़ डालते हैं। कई वीरों ने अपनी गोली से अपनों को ही मार डाला है।
यह वीरता ही तो है कि दहेज में पांच सौ रुपये भी न छोड़ो और पच्चीस हजार के पटाखे फोड़ डालो। असल में अपने यहां वीरता दर्शाने की कुछ ज्यादा ही गुंजाइश है। यहां का आदमी कुछ ज्यादा ही आजाद है। मुकम्मल आजाद है। वह सिर्फ अपना अधिकार याद रखने को आजाद है। उसने इसी आजादी के साथ अपने कर्तव्य की देखरेख का जिम्मा सरकार को दे दिया है। उसकी आजादी, रगों में दौड़ने वाले खून से बाहर निकल स्वतंत्रता की परंपरागत परिभाषा को नया विस्तार दे रही है। तरह-तरह की आजादी है। इनकी चर्चा फिर कभी। फिलहाल, ‘ये देश है वीर जवानों का ..’ की धुन पर रात में दो बजे नाचने की प्रैक्टिस कीजिये। यही आपकी वीरता का प्रमाण है।
सोमवार, 30 अगस्त 2010
मंदिर और मदिरालय
मंदिर और मदिरालय में है कौन बेहतर
ये सवाल एक छोटे बच्चे से पूछा ।
उससे,जो एक शराबखाने के बाहर,
बेचता है बर्फ हर शाम ।
कमर से बांधे रखता है प्लास्टिक का ग्लास
हाथों में एक मग और माचिस ।
पांच रूपये में रच देता है,जो
बार,खुले आसमां के नीचे ।
इसके बदले उसे मिलता है
चंद पैसे और शराब की खाली बोतलें
मुनाफे का सौदा है ये ।
ये जगह मुफिद है उसके लिये
धूल भरी गर्म शामों में भी ।
पर उसे बहुत मतलब नहीं
पास एक मंदिर से ।
उसे बस इतना मालूम है
कि,भगवान रहते हैं यहां ।
हजारों लोग आते हैं,
कुछ ना कुछ मांगने,
नई गाड़ी की पूजा कराने,
तो अच्छी नौकरी मांगने,
लेकिन इससे उसे क्या
रोटी तो नहीं मिल पाती यहां ।
प्रसाद भी लोग बड़ी दुकानों से खरीद लाते हैं
फूल बेचने के लायक पूंजी नहीं उसके पास ।
मंदिर से मिले प्रसाद के बाद भी,
भूख लगी रहती है उसे ।
लिहाजा मदिरालय ही,
बेहतर है उसके लिये ।
यहां वो शान से रहता है
क्योंकि उसे किसी से कुछ मांगना नहीं पड़ता ।
ये सवाल एक छोटे बच्चे से पूछा ।
उससे,जो एक शराबखाने के बाहर,
बेचता है बर्फ हर शाम ।
कमर से बांधे रखता है प्लास्टिक का ग्लास
हाथों में एक मग और माचिस ।
पांच रूपये में रच देता है,जो
बार,खुले आसमां के नीचे ।
इसके बदले उसे मिलता है
चंद पैसे और शराब की खाली बोतलें
मुनाफे का सौदा है ये ।
ये जगह मुफिद है उसके लिये
धूल भरी गर्म शामों में भी ।
पर उसे बहुत मतलब नहीं
पास एक मंदिर से ।
उसे बस इतना मालूम है
कि,भगवान रहते हैं यहां ।
हजारों लोग आते हैं,
कुछ ना कुछ मांगने,
नई गाड़ी की पूजा कराने,
तो अच्छी नौकरी मांगने,
लेकिन इससे उसे क्या
रोटी तो नहीं मिल पाती यहां ।
प्रसाद भी लोग बड़ी दुकानों से खरीद लाते हैं
फूल बेचने के लायक पूंजी नहीं उसके पास ।
मंदिर से मिले प्रसाद के बाद भी,
भूख लगी रहती है उसे ।
लिहाजा मदिरालय ही,
बेहतर है उसके लिये ।
यहां वो शान से रहता है
क्योंकि उसे किसी से कुछ मांगना नहीं पड़ता ।
इंदीवर
1963 में बाबूभाई मिस्त्री की संगीतमय फिल्म ’पारसमणि‘ की सफलता ने इंदीवर की शोहरत को बुलंदियों पर पहुंचा दिया। उनकी जोड़ी मनोज कुमार के साथ खूब जमी
’छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिए, ये मुनासिब नहीं आदमी के लिए, प्यार से भी जरूरी कई काम है, प्यार सबकुछ नहीं आदमी के लिए..।‘ इस गीत को गुनगुना किसे अच्छा नहीं लगता। लेकिन इस गीतों को शब्दों में पिरोना आसान नहीं। यह तो इंदीवर ही थे जिन्होंने कविताओं को फिल्मी गीतों में ढालकर उन्हें अमर बना दिया। ’नदिया चले, चले रे धारा, चन्दा चले, चले रे तारा, तुझको चलना होगा..‘ यह क्या है, कविता ही तो है। ऐसे गीतों के रचनाकार श्यामलाल बाबू राय उर्फ इंदीवर का जन्म उत्तर प्रदेश के झांसी में वर्ष 1924 में हुआ था। बचपन से ही छोटी-छोटी कविताएं लिखते और गीतकार बनने का सपना देखा करते थे। बड़े हुए तो मायानगरी मुंबई पहुंच गए। जमकर धक्के खाए और तब जाकर मिली फिल्म ’डबल क्रास‘ जो 1946 में रिलीज हुई। कहा जाता है न कि समय से पहले और भाग्य से अधिक किसी को कुछ नहीं मिलता। यही इंदीवर पर लागू होती है। फिल्म ’डबल फेस‘ के बाद अगले पांच साल तक उनके फिल्मी करियर में क्रॉस लगा रहा। तब आया साल 1951 और रिलीज हुई फिल्म ’मल्हार‘। जिसमें उन्होंने बड़े अरमान से गीत लिखा, ’बड़े अरमानों से रखा है बलम तेरी कसम‘ जिसने इतनी धूम मचाई कि वो रातोंरात स्टार बन गए। 1963 में बाबूभाई मिस्त्री की संगीतमय फिल्म ’पारसमणि‘ की सफलता ने इंदीवर की शोहरत को बुलंदियों पर ला खड़ा किया। उनकी जोड़ी मनोज कुमार के साथ खूब जमी। उन्होंने फिल्म ’उपकार‘ के लिए ’कस्मे-वादे, प्यार वफा का..‘ जैसे दिल को छू लेने वाले गीत लिखकर श्रोताओं को भाव-विभोर कर दिया। फिल्म ’पूरब और पश्चिम‘ के लिए उन्होंने ’दुल्हन चली, वो पहन चली..‘ और ’कोई जब तुम्हारा हृदय तोड़ दे..‘ जैसे गीतों को लिखकर फिल्मी जगत में तहलका मचा दिया। कल्याणजी-आनंदजी के साथ मिलकर उन्होंने ’छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिए..‘, ’चंदन-सा बदन..‘, ’मै तो भूल चली बाबुल का देश..‘ गीत दिया जो आज भी गाये और गुनगुनाए जाते है। 1970 में फिल्म आई थी ’जानी मेरा नाम‘। इसमें ’नफरत करने वालों के सीने में प्यार भर दूं..‘ और ’पल भर के लिए कोई मुझे प्यार कर ले..‘ जैसे रूमानी गीत लिखकर उन्होंने तहलका मचा दिया। फिल्म ’सच्चा-झूठा‘ का गीत ’मेरी प्यारी बहनियां बनेगी दुल्हनियां..‘, फिल्म ’सफर‘ के गीत ’जीवन से भरी तेरी आंखें और ’जो तुमको हो पसंद..‘ जैसे गानों को लिखकर उन्होंने इतिहास रचा। राकेश रोशन की फिल्मों में उन्होंने ऐसे सदाबहार गाने लिखे जो आज भी बखूबी याद किए जाते है। इनमें ’कामचोर‘, ’खुदगर्ज‘, ’खून भरी मांग‘, ’काला बाजार‘, ’किशन कन्हैया‘, ’करण-अजरुन‘ प्रमुख है। करीब तीन सौ गीतों के रचनाकार इंदीवर के गीतों को किशोर कुमार, आशा भोंसले, मोहम्मद रफी, लता मंगेशकर आदि ने अपनी आवाज दी है। ’ना कजरे की धार ना मोतियों के हार, ना कोई किया सिंगार, फिर भी कितनी सुंदर हो‘, ’पल भर के लिए कोई हमें प्यार कर ले..‘ आदि गानों को कौन भुला सकता है। 1975 में प्रदर्शित फिल्म ’अमानुष‘ के लिए इंदीवर को सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फिल्म फेयर पुरस्कार दिया गया जिसे किशोर कुमार ने गाया था। 27 फरवरी, 1999 को इंदीवर ने इस दुनिया से विदा ले ली।
वक्त का ज्वालामुखी और बरफ जैसी औरतें
सेक्स वर्कर दूसरी औरतों से अलग होती हैं। इसके चार कारण हैं.. ’हम अपनी मर्जी की मालिक होती हैं। हमें खाना बनाकर पति का इंतजार नहीं करना पड़ता। हमें उसके मैले कपड़े नहीं धोने पड़ते। हमें अपने बच्चों को अपने हिसाब से पालने के लिए आदमी की इजाजत नहीं लेनी पड़ती। हमें बच्चे पालने के लिए आदमी की जायदाद पर दावा नहीं करना पड़ता।‘ नलिनी जमीला (एक सेक्स वर्कर की आत्मकथा से )
देह बेचकर पेट पालने वाली औरतें हमेशा हाशिये में ही नहीं रही है, उनको जी भर कर अपमानित भी किया जाता है। उनकी समस्याओं को कभी समस्या नहीं माना जाता है उनके दर्द को महसूसने में समाज की भागीदारी भी नहीं होती। ऐसा बहुत कम हुआ है, जब जिस्म बेचने को मजबूर औरतों ने अपनी दास्तां खुद सुनाई हो। गीताश्री को जो उन्होंने बताया, उसे जानकर उस दुनिया को भी जानिए, जिसको दुत्कारने में कोई कोताही नहीं करते तथाकथित संघान्त-
औरतें साथ रहने वाला एक आदमी पति बन जाता था और दूसरा भाई। ये वे रिश्ते थे, जो बाजार बनाता था और बाजार ही देता था रिश्तों को नाम। रिश्तों को नाम देने के बावजूद ऐसे रिश्तों को समझना मुश्किल है क्योंकि अबूझ रिश्तों की ये ऐसी कहानी है, जो किसी औरत के जिस्म से शुरू होकर औरत के अरमानों पर आकर खत्म हो जाती है। लेकिन किसी के अरमान मिटे या सपने लुटे, इसकी परवाह बाजार कब करता है? हमने अरमानों की ऐसी अनगिनत चिताएं देखीं, जिसे किसी की बेचारगी और लाचारी हवा दे रही थी। सेक्स वर्करों की दुनिया के अनचीन्हे दर्द से साझा करते हुए देखा कि जो आदमी खुद को पति बता रहा है, वह पति नहीं दलाल है और जो खुद को भाई बता रहा है, वह ग्राहक ढूंढलाने वाला बिचौलिया। दोनों जिस्म के सौदे के बाद मिले पैसों से करते थे ऐश। लेकिन यह सब बंद दुनिया का चेहरा था, जिससे खुली दुनिया के लोग कोई मतलब नहीं रखना चाहते। तभी तो हमने पाया कि सेक्सवर्कर समाज से वैसे ही नफरत करती है, जैसे समाज सेक्स वर्कर से। कोई पति बनकर दलाली करेगा और कोई भाई बनकर ग्राहक लाएगा, शायद सामाजिक ताने-बाने पर रिसर्च करनेवाले रिश्तों की इस नई परिभाषा को कुबूल न करपाए, लेकिन सच था। केरल के कोसिकोड में इन्हें ’रोपर्स‘ के नाम से जाना जाता है। रोपर्स, रोप(रस्सी) शब्द से बना है यानी दो किनारों को जोड़ने वाला, रस्सी की तरह जोड़ने वाला रोपड़, यह खुलासा केरल की मशहूर सेक्स वर्कर नलिनी जमाली ने भी अपनी आत्मकथा में किया है। उनकी आत्मकथा खूब बिकी है और हिंदी में भी अनुवाद होकर आई है। इसे पढ़ने के बाद केरल की सेक्सवर्कर के बारे में और करीब से जानने-समझने का मन हुआ। उस ऑफिस में दो महिलाएं हाजिर थीं। रमणी और सरोजनी। कोट्टायम के उनके दफ्तर में बैठी, थोड़ी सकुचाई, झिझकती हुई दो सांवली-काली रंगत वाली यौन कर्मिंयों और मेरे बीच भाषा का संकट था। वे ना तो अंग्रेजी बोल सकती थीं, ना हिंदी समझती थी। ना मैं उनकी भाषा। मगर वे इस बातके लिए तैयार होकर आई थी कि इंटरव्यू देना है। साजू इंटरप्रेटर बन गया। स्त्री का दर्द पहली बार पुरु ष के मुख से अनुवाद होकर स्त्री तक आ रहा था। पता नहीं पुरु ष ने उसमें क्या जोड़ा, क्या घटाया..मगर उन दोनों की दैहिक भाषा ने मुझे समझा दिया, सब कुछ। रमणी थोड़ी कम उम््रा की थी। वह खुल रही थी, साहसपूर्वक, वैसे ही जैसे उसने यौनकर्म की दहलीज पर पैर रखा था। बोलते हुए वह उसके भीतर की खड़खड़ साजू ने नहीं, मैंने सुनी। कुछ था, जो खुलता और बंद होता था। खौफ के साथ अपने बाहर फैलने की ललक को वह रोक नहीं पा रही थी। रमणी को दिल्ली देखना है। उसने देखा नहीं, सुना भर है। बातचीत के दौरान वह लगभग गिड़गिड़ाती है-’ क्या आप मेरे लिए टिकट भेजोगे। अपने पास रखोगे। लालिकला, कुतुबमीनार देखना है। सुना है..बहुत सुंदर और बड़ा शहर है..।‘ मैं भी वादा कर देती हूं पर अभी तक पूरा नहीं कर पाई हूं। शायद कभी कर पाऊं..उनसे संपर्क का जरिया भी तो नहीं कोई। हम कौन सी भाषा में बात करेंगे, फोन पर वे बोल रही थीं और मुझे मुझे निदा फाजली की पंक्तियां याद आ रही थीं- ’ इनके अन्दर पक रहा है वक़्त का ज्वालामुखी किन पहाड़ों को ढंके हैं बरफ जैसी औरतें . रमणी, बोलती कम है, हंसती ज्यादा है। हंसी हंसी में कहती है, ‘मैं पहले एक दिन में पांच छह ग्राहक निपटा देती थी। अब थकान होने लगी है। अब संख्या कोई मायने नहीं रखती..दो तीन निपटा ले, यही बहुत है। वह थोड़ी गंभीर होती है- --ग्राहकों की संख्या मायने नहीं रखती, उनकी संतुष्टि मायने रखती है। धंधे में उतरने का कोई अफसोस रमणी ईमानदारी से स्वीकारती है, अफसोस तो है, मगर जिंदगी चुनौती की तरह है, उसका सामना कर रहे हैं। अब भाग नहीं सकते। देर हो चुकी। इसके आगे का रास्ता बंद है। क्या करेंरमणी का यह वक्तव्य किसी अनुपिस्थत को संबोधित था। साजू मुझे बता रहे थे और वह शून्य में देख रही थी। बात-चीत से पता चला कि रमणी कोट्टायम के संघांत मुहल्ले में रहती है। वहां धंधा करने मे ंसमस्या ही समस्या। उसने रास्ता निकाल लिया। जंगल ही उसका रेडलाइट एरिया बन गया है। वह ग्राहकों को पास के जंगल में ले जाती है। घास के बिछौने होते हैं। मोबाइल हैं, ग्राहक फोन करते हैं फिर जंगल में जगह तय होती है। कुछ ग्राहक जंगल नहीं जाना चाहते, तब सरोजनी की बन आती है। वह अपने ग्राहक उसकी तरफ भेज देती है। सरोजनी का घर भी तंग गलियो में हैं मगर वह घर से धंधा करती है। थोड़ी उम््रा ज्यादा है इसिलए लोग शक कम करते हैं। साथ में पतिनुमा जीव रहता है। पति का जिक्र आया तो नलिनी याद आ गई। नलिनी ने ऐसे पतियों के बारे में साफ लिखा है कि मकान वगैरह किराए पर लेना हो तो ये लोग बड़े काम आते हैं। लेकिन कुल मिलाकर यह किसी सिरदर्द से कम नहीं हैं। सरोजनी का पति भी एसा ही है। सरोजनी ही उसका खर्च चलाती है। बदले में वह उसे सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने का नाटक करता है। घर पर अक्सर ग्रहकों का आना जाना देख कर कई बार पड़ोसी पूछ लेते हैं, सरोजनी का जवाब होता है-’ये लोग प्रोपर्टी डीलर हैं, मेरा प्लाट खरीदना चाहते हैं। देखने आते रहते हैं। सरोजनी बताती है-’कई बार उसके पास युवा लड़कों का ग्रुप आता है। वह पांच मिनट में उन्हें मुक्ति देकर भेज देती है। भीतर से उसे ग्लानी होती है कभी कभी, उनकी और अपनी उम््रा देखकर। लेकिन ग्राहक तो ग्राहक है, चाहे किसी भी वक्त या किसी भी उम््रा का हो.। ’’ लेकिन पैसे की जरूरत ऐसी सोच पर लगाम लगा देती है। रमणी भी कहती है, ‘‘पैसा बड़ी चीज है। उन्हें कैसे लौटा दें। मैंने कहा, छोड़ क्यो नहीं देती ये धंधा..दोनों एक साथ बोल पड़ी, इतना पैसा किस काम में मिलेगा। अब हमें कौन काम देगा। हम किसी काम के लायक बचे ही नहीं..अब तो आदत सी पड़ गई है..। अब छोड़ भी दे तो लोग हमें चैन से नहीं जीने देंगे। रमणी अब बातचीत में सहज हो चुकी है और उसे यह स्वीकारने में झझिक नहीं होती कि इस पेशे में भी वह कभी-कभार आनंद ढूंढ लेती है। वह स्वीकार करती है कि एक स्थाई ग्राहक से वह भी आनंद लेती है। यहां पैसा गौण है। उससे मोल-भाव नहीं करती। रमणी के पास किस्से बहुत है..। एक बार पैसे वाला अधेड़ ग्राहक आया, कहा-’’मैं अपनी पत्नी से बहुत प्यार करता हूं, मगर मैं जिस चीज की तलाश में हूं, वहां नहीं है। चलो, सेक्स में फन करते हैं..।’’ लेकिन रमणी अच्छी तरह जानती है कि दूसरों को भले ही उसके जिस्म में फन की तलाश हो, लेकिन वह खुद अपने पति के मर जाने और कंगाल हो जाने के बाद यातना के जिस रास्ते पर चल रही है, वह रास्ता कहां खत्म होगा। न घर बचा न कोई जमीन का टुकड़ा, जिसे वह अपना कह सके। रिश्तेदारों ने शरण देने से मना कर दिया। कम पढी लिखी थी, सो नौकरी ना मिली। एक शाम उसने खुद को पीकअप प्वाइंट पर पाया। जिस्म की कमाई से पहले बेटियों को पाला, अब खुद को पाल रही है। इसी नरक में अपने लिए सुख का एकाध कतरा भी तलाश लेती है। यह सब बताते हुए उसकी आंखों में कहीं भी संकोच या शरम नहीं.है तो बस थोड़ी शिकायत, थोड़ा धिक्कार। दोनों से बातचीत करते हुए ही हमने जाना कि केरल में कहीं भी कोई रेडलाइट एरिया नहीं है। इसीलिए वहां सेक्सवर्कर पूरे समाज में घुली मिली हैं। उन्हें अलग से चिन्हित नहीं किया जा सकता। इसकी दिक्कते भी हैं। बताते हैं कि केरल में 10,000 स्ट्रीट बेस्ड सेक्सवर्कर हैं। इनमें हिजड़े भी शामिल हैं। इसके बावजूद सोनागाछी की एकता उनके लिए रोल माडल की तरह है। वहां एक अनौपचारिक रूप से संगठन बना है, सेक्सवर्कर फोरम केरला (एसडब्लूएफके) जो इनके हितों का ध्यान रखने लगा है। गाहे-बगाहे आंदोलनों में शिरकत भी करने लगा है। मगर यह सोनागाछी के दुर्वार महिला समन्य समिति की तरह ताकतवर नहीं है। रमणी,सरोजनी उसकी सदस्य बन चुकी हैं। सरोजनी की दो बेटियां हैं, चेन्नई में रहती हैं। वे हिंदी नहीं जानती, किताब नहीं पढ सकती, तो क्या हुआ, फोटो तो पहचान सकती है। रमणी और सरोजनी ने फोटो भी खिचवाए। बेटियां हालांकि अब जान गई हैं कि मां क्या काम करती हैं। पहले तो बहुत विरोध हुआ अब नियित को कुबुल कर चुकी है । साथ कुछ वक्त बिताने के बाद जब वे जाने की अनुमित मांग रहीं थीं तो वहां मौजूद आंखें उन्हें सांय से घूर रही थीं। वे चली गईं, लेकिन दोनों मेरे सामने ऐसे खुली जैसे अंधड़ में जंग लगे दरवाजे-खिड़िकयों की सांकलें भरभरा कर खुल जाती हैं। उन्होंने अपने दर्द को कही से भी अतिरंजित नही किया..बल्कि भोगे हुए को ज्यों का त्यों रख दिया। शायद उन्हें लग रहा था कि इस जलालत से भरी दुनिया में कोई है, जो उसकी व्यथा सहानूभूतिपूर्वक सुन रहा है। भाषाई संकट के कारण पूछ नहीं पा रही थी, शायद साजू की उपिस्थित भी संकोच पैदा कर रही थी। फिर भी साजू के बावजूद उन्हें जो कुछ कहना था साफ-साफ कह गई। सुना गई अपनी कहानी। उस कहानी में गुड गर्ल बनने का सिंड्रोम नहीं था। ये रास्ता उन्होंने खुद चुना था। शिकायतें कम थीं और लहजे में मुक्ति की चाह भी खत्म थी। उनके जाने के बाद भी रमणी की खिलखिलाहट मेरे सामने गूंज रही थी और दर्द की दरिया में भींगने के बाद पनपे अवसाद को कम कर रही थी। सरोजनी ने भी अपनी चालबाजियों को चटखारे लेकर सुनाया था, और उसे सुनाने में मजा भी आ रहा था, लेकिन क्या वे सचमुच चालबाज है।
देह बेचकर पेट पालने वाली औरतें हमेशा हाशिये में ही नहीं रही है, उनको जी भर कर अपमानित भी किया जाता है। उनकी समस्याओं को कभी समस्या नहीं माना जाता है उनके दर्द को महसूसने में समाज की भागीदारी भी नहीं होती। ऐसा बहुत कम हुआ है, जब जिस्म बेचने को मजबूर औरतों ने अपनी दास्तां खुद सुनाई हो। गीताश्री को जो उन्होंने बताया, उसे जानकर उस दुनिया को भी जानिए, जिसको दुत्कारने में कोई कोताही नहीं करते तथाकथित संघान्त-
औरतें साथ रहने वाला एक आदमी पति बन जाता था और दूसरा भाई। ये वे रिश्ते थे, जो बाजार बनाता था और बाजार ही देता था रिश्तों को नाम। रिश्तों को नाम देने के बावजूद ऐसे रिश्तों को समझना मुश्किल है क्योंकि अबूझ रिश्तों की ये ऐसी कहानी है, जो किसी औरत के जिस्म से शुरू होकर औरत के अरमानों पर आकर खत्म हो जाती है। लेकिन किसी के अरमान मिटे या सपने लुटे, इसकी परवाह बाजार कब करता है? हमने अरमानों की ऐसी अनगिनत चिताएं देखीं, जिसे किसी की बेचारगी और लाचारी हवा दे रही थी। सेक्स वर्करों की दुनिया के अनचीन्हे दर्द से साझा करते हुए देखा कि जो आदमी खुद को पति बता रहा है, वह पति नहीं दलाल है और जो खुद को भाई बता रहा है, वह ग्राहक ढूंढलाने वाला बिचौलिया। दोनों जिस्म के सौदे के बाद मिले पैसों से करते थे ऐश। लेकिन यह सब बंद दुनिया का चेहरा था, जिससे खुली दुनिया के लोग कोई मतलब नहीं रखना चाहते। तभी तो हमने पाया कि सेक्सवर्कर समाज से वैसे ही नफरत करती है, जैसे समाज सेक्स वर्कर से। कोई पति बनकर दलाली करेगा और कोई भाई बनकर ग्राहक लाएगा, शायद सामाजिक ताने-बाने पर रिसर्च करनेवाले रिश्तों की इस नई परिभाषा को कुबूल न करपाए, लेकिन सच था। केरल के कोसिकोड में इन्हें ’रोपर्स‘ के नाम से जाना जाता है। रोपर्स, रोप(रस्सी) शब्द से बना है यानी दो किनारों को जोड़ने वाला, रस्सी की तरह जोड़ने वाला रोपड़, यह खुलासा केरल की मशहूर सेक्स वर्कर नलिनी जमाली ने भी अपनी आत्मकथा में किया है। उनकी आत्मकथा खूब बिकी है और हिंदी में भी अनुवाद होकर आई है। इसे पढ़ने के बाद केरल की सेक्सवर्कर के बारे में और करीब से जानने-समझने का मन हुआ। उस ऑफिस में दो महिलाएं हाजिर थीं। रमणी और सरोजनी। कोट्टायम के उनके दफ्तर में बैठी, थोड़ी सकुचाई, झिझकती हुई दो सांवली-काली रंगत वाली यौन कर्मिंयों और मेरे बीच भाषा का संकट था। वे ना तो अंग्रेजी बोल सकती थीं, ना हिंदी समझती थी। ना मैं उनकी भाषा। मगर वे इस बातके लिए तैयार होकर आई थी कि इंटरव्यू देना है। साजू इंटरप्रेटर बन गया। स्त्री का दर्द पहली बार पुरु ष के मुख से अनुवाद होकर स्त्री तक आ रहा था। पता नहीं पुरु ष ने उसमें क्या जोड़ा, क्या घटाया..मगर उन दोनों की दैहिक भाषा ने मुझे समझा दिया, सब कुछ। रमणी थोड़ी कम उम््रा की थी। वह खुल रही थी, साहसपूर्वक, वैसे ही जैसे उसने यौनकर्म की दहलीज पर पैर रखा था। बोलते हुए वह उसके भीतर की खड़खड़ साजू ने नहीं, मैंने सुनी। कुछ था, जो खुलता और बंद होता था। खौफ के साथ अपने बाहर फैलने की ललक को वह रोक नहीं पा रही थी। रमणी को दिल्ली देखना है। उसने देखा नहीं, सुना भर है। बातचीत के दौरान वह लगभग गिड़गिड़ाती है-’ क्या आप मेरे लिए टिकट भेजोगे। अपने पास रखोगे। लालिकला, कुतुबमीनार देखना है। सुना है..बहुत सुंदर और बड़ा शहर है..।‘ मैं भी वादा कर देती हूं पर अभी तक पूरा नहीं कर पाई हूं। शायद कभी कर पाऊं..उनसे संपर्क का जरिया भी तो नहीं कोई। हम कौन सी भाषा में बात करेंगे, फोन पर वे बोल रही थीं और मुझे मुझे निदा फाजली की पंक्तियां याद आ रही थीं- ’ इनके अन्दर पक रहा है वक़्त का ज्वालामुखी किन पहाड़ों को ढंके हैं बरफ जैसी औरतें . रमणी, बोलती कम है, हंसती ज्यादा है। हंसी हंसी में कहती है, ‘मैं पहले एक दिन में पांच छह ग्राहक निपटा देती थी। अब थकान होने लगी है। अब संख्या कोई मायने नहीं रखती..दो तीन निपटा ले, यही बहुत है। वह थोड़ी गंभीर होती है- --ग्राहकों की संख्या मायने नहीं रखती, उनकी संतुष्टि मायने रखती है। धंधे में उतरने का कोई अफसोस रमणी ईमानदारी से स्वीकारती है, अफसोस तो है, मगर जिंदगी चुनौती की तरह है, उसका सामना कर रहे हैं। अब भाग नहीं सकते। देर हो चुकी। इसके आगे का रास्ता बंद है। क्या करेंरमणी का यह वक्तव्य किसी अनुपिस्थत को संबोधित था। साजू मुझे बता रहे थे और वह शून्य में देख रही थी। बात-चीत से पता चला कि रमणी कोट्टायम के संघांत मुहल्ले में रहती है। वहां धंधा करने मे ंसमस्या ही समस्या। उसने रास्ता निकाल लिया। जंगल ही उसका रेडलाइट एरिया बन गया है। वह ग्राहकों को पास के जंगल में ले जाती है। घास के बिछौने होते हैं। मोबाइल हैं, ग्राहक फोन करते हैं फिर जंगल में जगह तय होती है। कुछ ग्राहक जंगल नहीं जाना चाहते, तब सरोजनी की बन आती है। वह अपने ग्राहक उसकी तरफ भेज देती है। सरोजनी का घर भी तंग गलियो में हैं मगर वह घर से धंधा करती है। थोड़ी उम््रा ज्यादा है इसिलए लोग शक कम करते हैं। साथ में पतिनुमा जीव रहता है। पति का जिक्र आया तो नलिनी याद आ गई। नलिनी ने ऐसे पतियों के बारे में साफ लिखा है कि मकान वगैरह किराए पर लेना हो तो ये लोग बड़े काम आते हैं। लेकिन कुल मिलाकर यह किसी सिरदर्द से कम नहीं हैं। सरोजनी का पति भी एसा ही है। सरोजनी ही उसका खर्च चलाती है। बदले में वह उसे सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने का नाटक करता है। घर पर अक्सर ग्रहकों का आना जाना देख कर कई बार पड़ोसी पूछ लेते हैं, सरोजनी का जवाब होता है-’ये लोग प्रोपर्टी डीलर हैं, मेरा प्लाट खरीदना चाहते हैं। देखने आते रहते हैं। सरोजनी बताती है-’कई बार उसके पास युवा लड़कों का ग्रुप आता है। वह पांच मिनट में उन्हें मुक्ति देकर भेज देती है। भीतर से उसे ग्लानी होती है कभी कभी, उनकी और अपनी उम््रा देखकर। लेकिन ग्राहक तो ग्राहक है, चाहे किसी भी वक्त या किसी भी उम््रा का हो.। ’’ लेकिन पैसे की जरूरत ऐसी सोच पर लगाम लगा देती है। रमणी भी कहती है, ‘‘पैसा बड़ी चीज है। उन्हें कैसे लौटा दें। मैंने कहा, छोड़ क्यो नहीं देती ये धंधा..दोनों एक साथ बोल पड़ी, इतना पैसा किस काम में मिलेगा। अब हमें कौन काम देगा। हम किसी काम के लायक बचे ही नहीं..अब तो आदत सी पड़ गई है..। अब छोड़ भी दे तो लोग हमें चैन से नहीं जीने देंगे। रमणी अब बातचीत में सहज हो चुकी है और उसे यह स्वीकारने में झझिक नहीं होती कि इस पेशे में भी वह कभी-कभार आनंद ढूंढ लेती है। वह स्वीकार करती है कि एक स्थाई ग्राहक से वह भी आनंद लेती है। यहां पैसा गौण है। उससे मोल-भाव नहीं करती। रमणी के पास किस्से बहुत है..। एक बार पैसे वाला अधेड़ ग्राहक आया, कहा-’’मैं अपनी पत्नी से बहुत प्यार करता हूं, मगर मैं जिस चीज की तलाश में हूं, वहां नहीं है। चलो, सेक्स में फन करते हैं..।’’ लेकिन रमणी अच्छी तरह जानती है कि दूसरों को भले ही उसके जिस्म में फन की तलाश हो, लेकिन वह खुद अपने पति के मर जाने और कंगाल हो जाने के बाद यातना के जिस रास्ते पर चल रही है, वह रास्ता कहां खत्म होगा। न घर बचा न कोई जमीन का टुकड़ा, जिसे वह अपना कह सके। रिश्तेदारों ने शरण देने से मना कर दिया। कम पढी लिखी थी, सो नौकरी ना मिली। एक शाम उसने खुद को पीकअप प्वाइंट पर पाया। जिस्म की कमाई से पहले बेटियों को पाला, अब खुद को पाल रही है। इसी नरक में अपने लिए सुख का एकाध कतरा भी तलाश लेती है। यह सब बताते हुए उसकी आंखों में कहीं भी संकोच या शरम नहीं.है तो बस थोड़ी शिकायत, थोड़ा धिक्कार। दोनों से बातचीत करते हुए ही हमने जाना कि केरल में कहीं भी कोई रेडलाइट एरिया नहीं है। इसीलिए वहां सेक्सवर्कर पूरे समाज में घुली मिली हैं। उन्हें अलग से चिन्हित नहीं किया जा सकता। इसकी दिक्कते भी हैं। बताते हैं कि केरल में 10,000 स्ट्रीट बेस्ड सेक्सवर्कर हैं। इनमें हिजड़े भी शामिल हैं। इसके बावजूद सोनागाछी की एकता उनके लिए रोल माडल की तरह है। वहां एक अनौपचारिक रूप से संगठन बना है, सेक्सवर्कर फोरम केरला (एसडब्लूएफके) जो इनके हितों का ध्यान रखने लगा है। गाहे-बगाहे आंदोलनों में शिरकत भी करने लगा है। मगर यह सोनागाछी के दुर्वार महिला समन्य समिति की तरह ताकतवर नहीं है। रमणी,सरोजनी उसकी सदस्य बन चुकी हैं। सरोजनी की दो बेटियां हैं, चेन्नई में रहती हैं। वे हिंदी नहीं जानती, किताब नहीं पढ सकती, तो क्या हुआ, फोटो तो पहचान सकती है। रमणी और सरोजनी ने फोटो भी खिचवाए। बेटियां हालांकि अब जान गई हैं कि मां क्या काम करती हैं। पहले तो बहुत विरोध हुआ अब नियित को कुबुल कर चुकी है । साथ कुछ वक्त बिताने के बाद जब वे जाने की अनुमित मांग रहीं थीं तो वहां मौजूद आंखें उन्हें सांय से घूर रही थीं। वे चली गईं, लेकिन दोनों मेरे सामने ऐसे खुली जैसे अंधड़ में जंग लगे दरवाजे-खिड़िकयों की सांकलें भरभरा कर खुल जाती हैं। उन्होंने अपने दर्द को कही से भी अतिरंजित नही किया..बल्कि भोगे हुए को ज्यों का त्यों रख दिया। शायद उन्हें लग रहा था कि इस जलालत से भरी दुनिया में कोई है, जो उसकी व्यथा सहानूभूतिपूर्वक सुन रहा है। भाषाई संकट के कारण पूछ नहीं पा रही थी, शायद साजू की उपिस्थित भी संकोच पैदा कर रही थी। फिर भी साजू के बावजूद उन्हें जो कुछ कहना था साफ-साफ कह गई। सुना गई अपनी कहानी। उस कहानी में गुड गर्ल बनने का सिंड्रोम नहीं था। ये रास्ता उन्होंने खुद चुना था। शिकायतें कम थीं और लहजे में मुक्ति की चाह भी खत्म थी। उनके जाने के बाद भी रमणी की खिलखिलाहट मेरे सामने गूंज रही थी और दर्द की दरिया में भींगने के बाद पनपे अवसाद को कम कर रही थी। सरोजनी ने भी अपनी चालबाजियों को चटखारे लेकर सुनाया था, और उसे सुनाने में मजा भी आ रहा था, लेकिन क्या वे सचमुच चालबाज है।
उचित खुराक न मिलना शर्मनाक
पश्चिमीअर्थशास्त्र ने खाद्य सुरक्षा और खाद्य असुरक्षा जैसे शब्द दिये है। हमारे लिए उसका परम्परागत अर्थ एक मनुष्य को गर्भ में आने से लेकर अन्तिम सांस तक स्वस्थ रहने के लिए जितना और जैसा न्यूनतम आहार चाहिए उसकी निश्चित उपलब्धता एवं अनुपलब्धता ही है। इस कसौटी पर यदि हम भारत के नौनिहाल और उनको जनने वाली माताओं की दशा का आकलन करें तो तस्वीर दिल दहलाने वाली और भारत के भविष्य की ष्टि से अत्यंत ही चिंताजनक है। वर्तमान अंतरराष्ट्रीय आर्थिक ढांचे में भविष्य की आर्थिक महाशक्ति माने जाने वाले हमारे देश के नीतिनि र्माताओं और उनके समर्थन में ढोल पीटनेवाले विशेषज्ञों, बुद्धिजीवियों, पूंजीशाहों के सामने यह शर्मनाक और भयावह तथ्य बिल्कुल स्पष्ट है कि हमारे यहां कुपोषित-न्यूनपोषित बच्चों तथा माताआें का प्रतिशत दुनिया में सबसे ज्यादा है। विश्व बैक ने अपनी रिपोर्ट इंडियाज अंडरनरिस्ड चिल्ड्रेन यानी भारत के अंतपाषित बच्चे में कहा है कि भारत में औसत छ: करोड़ बच्चे कम वजन के शिकार है। यानी सब सहारा अफ्रीका से दोगुना। 30 प्रतिशत बच्चे कम वजन वाले पैदा होते है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि पिछले एक दशक में आवश्यक पोषक तत्वांे से वंचित बच्चों की संख्या कम करने की दिशा में प्रगति अन्य अनेक देशों की तुलना में कम एवं धीमी है। कुपोषित-अल्पपोषित बच्चों एवं माताओं सम्बन्धी तस्वीर तब और डरावनी हो जाती है जब हम विभिन्न राज्यों एवं उनमें अलग-अलग सामाजिक-आर्थिक समूहों के बीच व्याप्त असमानता देखते है। ग्रामीण क्षेत्रों में आधे बच्चे कम वजन वाले पैदा होते है, जबकि शहरों में 38 प्रतिशत। कम वजन वाली बच्चियों का अनुपात 48.9 प्रतिशत एवं बच्चों का 45.5 प्रतिशत है। दलितों यानी अनुसूचित जनजाति में 56.2 प्रतिशत एवं अनुसूचित जनजाति 53.2 प्रतिशत जबकि अन्य जातियों में औसतन 44.1 प्रतिशत बच्चे ही कम वजन वाले पैदा होते है। कम वजन या अस्वस्थ बच्चों का कारण ही माताओं का कुपोषण। नेशनल फैमिली हेल्थ सव यानी राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सवक्षण के तीसरे दौर 2005-06 को सभी मानकों पर विश्वसनीय माना जाता है। इसने माना है कि आवश्यक पौष्टिक खुराक नहीं मिलने के कारण भारत में 50 लाख बच्चे प्रतिवर्ष मर जाते है। यानी प्रति छ: सेकेण्ड में एक बच्चा आवश्यक भोजन के अभाव में हमारे यहां दम तोड़ देता है। विश्व बैक की रिपोर्ट कहती है कि बच्चों की कुल मृत्यु में से आधी केवल आवश्यक न्यूनतम भोजन न मिलने के कारण होता है। साथ ही भारत में कुल बीमारियों में 22 प्रतिशत का कारण भी यही है। यूनिसेफ की रिपोर्ट कहती है कि हमारे यहां प्रति एक लाख गर्भस्थ माताओं में 450 तो बच्चा जनने के दौरान ही चल बसती है। इनकी संख्या प्रतिवर्ष है, 78 हजार। महिलाओं के स्वास्थ्य को मापने के लिए बीएमआई यानी बड़ी मॉस इन्डेक्स का मानक है, जिसमें वजन का उम््रा से भाग किया जाता है। इसमें दुबलापन की न्यूनतम सीमा रेखा 18.5 है, जिसका अर्थ है, भीषण कुपोषण का शिकार। इसी प्रकार, बीएमआई 25 का अर्थ है, अत्यधिक वजन और मोटापा। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सवक्षण के अनुसार 15 से 49 वर्ष की 36 प्रतिशत यानी एक तिहाई से ज्यादा महिलाएं 18.5 के मानक से कम है। यानी ये भयानक कुपोषण से ग्रस्त हंै। दूसरे शब्दों में कहें तो यदि ये जीवित है तो भगवान भरोसे और यदि जीवित रहते हुए भी अपनी जिम्मेवारी निभा रहीं है तो केवल भारत के पारिवारिक संस्कारों और उससे मिली अदम्य जिजीविषा की बदौलत ही। विवाहित महिलाओं में 33 प्रतिशत इस श्रेणी में है। कुपोषण की शिकार इन महिलाओं द्वारा जन्म दिए गए बच्चे स्वभाविक ही सामान्य महिलाओं के बच्चों से ज्यादा कुपोषण के शिकार होंगे। विश्व स्वास्थ्य संगठन से लेकर, विश्व बैक एवं ऐसी अन्य रिपोटां में वर्तमान स्वास्थ्य विश्लेषण के अनुसार लौह, आयोडिन, विटामिन ए, प्रोटीन आदि की कमी का ब्योरा दिया गया है। इसके अनुसार गर्भस्थ माताओं की मृत्यु का करीब 22 प्रतिशत कारण केवल लोहे की कमी होता है। इसी प्रकार विटामिन ए की कमी बच्चों को विरुपित करने से लेकर उनकी मृत्यु का कारण बनती है। रक्ताल्पता पर अध्ययन करने वालों ने माना है कि भारत में गर्भस्थ स्त्रियों में आधी तथा बच्चा जनने के बाद स्तनपान कराने वाली माताओं में कम से कम एक तिहाई इससे पीड़ित है। कई राज्यों के वंचित तबकों में 87 प्रतिशत तक गर्भस्थ एवं स्तनपान कराने वाली स्त्रियां रक्ताल्पता की शिकार पाई गईं। केवल इसके कारण गर्भावस्था या बच्चा जनने के दौरान 22 हजार महिलाओं की मृत्यु हो जाती है। इसी प्रकार विटामिन ए की कमी के कारण दुनिया भर में जितनी गर्भस्थ महिलाएं रतौधी का शिकार होती है, उनमें हर दूसरी भारत की है-कुल 62 लाख में 30 लाख। विश्व बैक को खलनायक मानने वाले इस रिपोर्ट के पीछे भी कुछ निहितार्थ तलाशेंगे और यह हो भी सकता है, पर यह हवा में तैयार नहीं किया गया है। इसमें अनेक ाोतों से प्राप्त तथ्यों को आधार बनाया गया है। मान लीजिए सवक्षणों, अध्ययनों से रिपोर्ट और आंकड़े न भी दिए जाएं तो क्या हमारी आंखों के सामने कुपोषित-न्यूनपोषित, दुर्बल, अशक्त महिलाएं, बच्चे नहीं आते क्या भूख से बिलबिलाते बच्चों एवं महिलाओं को हम नहीं देखते इनकी एक अखिल भारतीय तस्वीर अपने मन में बना लीजिए, फिर निष्कर्ष आपके सामने होगा। कुपोषित-न्यूनपोषित महिलाओं एवं बच्चों की भारी तादाद हमारे मौजूदा भारत का भयावह सच है। हम अत्यधिक विश्लेषण एवं भारी अंग्रेजी शब्दावलियों में न जाएं तो साफ दिखाई देगा कि कुपोषण या अल्पपोषण का प्राथमिक और एकमात्र मूल कारण उपयुक्त भोजन सामग्री का अभाव है।इसे आप खाद्य असुरक्षा या कोई नाम दे दीजिए। हां, कुपोषण एवं न्यूनपोषण के पीछे दूसरे निर्धारक भी है, किन्तु वे सारे तो समय पर आवश्यक सामान्य पौष्टिक भोजन न मिलने के परिणाम है। यदि भारतीय रसोई की परम्परागत पवित्र थाली किसी माता को मिलती रहे तथा वनस्पतियों और फल-फूलों तक उसकी आसान पहुंच तो फिर उसके शरीर में किसी तत्व, यौगिक, खनिज, या मिश्रण की कमी नहीं होगी। अलग से गोली के रूप में लोहा, या खनिज लेने की आवश्यकता भी पौष्टिक भोजन न मिलने से ही पैदा होती है। फिर महिलाएं क्यों किसी बीमारी की शिकार होंगी! जब महिलाएं स्वस्थ होंगी तो उनका गर्भस्थ शिशु भी स्वस्थ होकर कुलांचे मारते पैदा लेगा और पैदा होने के बाद उसे स्वस्थ मां की छाती से पर्याप्त और पौष्टिक दूध मिलेगा। मनुष्य के विकास का मूल आधार गर्भस्थ होने से लेकर पैदा होने के बाद के दो वर्ष तक हो जाता है और इस काल में जो क्षति हो गयी उसकी पूर्ति असम्भव होती है। कम वजन लेकर पैदा होने वाले बच्चों के भावी विकास की ष्टि से अगले दो वर्ष में क्षति हो चुकी होती है। इसका निदान केवल और केवल उपयुक्त भोज सामग्री की उपलब्धता में है। रिपोटां से यह साफ हो गया है कि अल्पपोषितों के मामले में सामाजिक-आर्थिक एवं भौगोलिक समूहों के बीच असमानता 1990 के दशक में बढ़ी है। यानी आर्थिक सुधारों के काल में। तो इसका अर्थ यह हुआ कि आर्थिक विकास के उछलते आंकड़े पिछड़े परिवारों के बच्चों और माताओं को न्यनूतम आवश्यक पोषणयुक्त भोजन पहुंचाने का आधार साबित नहीं हुए है। सच तो यही है कि तथाकथित विकास के इस ढांचे में पौष्टिक आहार भी नकद आधारित और इतना महंगा हो गया है कि जिस देश में 37 प्रतिशत लोगों के पास अपनी न्यूनतम आवश्यकता की पूर्ति का साधन नहीं है, वे कहां से इसे खरीद पाएंगे! खाद्य सामग्री की महंगाई के लगभग पिछले तीन वष्रो में स्थिति और बदतर हुई है। जाहिर है, इसके लिए हमें आज के सन्दर्भ में परम्परागत भारतीय जीवन शैली की ओर लौटने की आवश्यकता है जिसमें हाथी के लिए मन भर और चींटी के लिए कण भर उपलब्ध कराने की स्वाभाविक-स्वचालित व्यवस्था थी और समाज की मुख्यधारा का स्वभाव न्यूनतम में ही सन्तुष्ट होने का था। कृषि की प्रधानता के रूप में ख्यात देश में हमारे बच्चे और उनकी माताओं को पेट भरने और स्वस्थ रहने लायक, अन्न, दूध और फल-फूल नहीं मिले इससे बड़े शर्म की बात हमारे लिए कुछ नहीं हो सकती। किन्तु हमारे भाग्यविधाताओं को शर्म आए तब न!
मैंने मन्दिर की राह जबसे छोड़ी
मैंने मन्दिर की राह जबसे छोड़ी
तक़दीर ने दिशाएँ किस्मत की मोड़ी
पहले मुस्कान का था मैं मालिक
खिलखिलाता हरदम रहता था मिज़ाज
हर एक से मोहब्बत का नाता जुड़ा था
यारों की लय से जुड़ती थी आवाज़
सगे-संबंधी मिलते थे दिल खोल
परिवार को था, इस नाचीज़ पे नाज़
पर अब हर रिश्तेदार ने रिश्ते की डोर तोड़ी
मैंने मन्दिर की राह जबसे छोड़ी
खुशी चली कर आँगन को विदा
तूफां हर पल चिंता के उभरे
अपना जो कहते कभी थे मुझको
नज़र चुरा अब अनजान हो गुज़रे
हर शब्द जनने लगा उलझन
व्यवहार के कोई काज न सुधरे
बेचैनी के धन हो गए ज्यादा, चैन की बारिश थोड़ी
मैंने मन्दिर की राह जबसे छोड़ी
मेरे मन्दिर भीतर कोई देव नहीं
गंभारे में सत्य का प्रकाश था
नियति और न्याय थे वहाँ द्वारपाल
ईमान की लॉ का ओजस उजास था
विनय, सद्भाव के चमकते दिए
त्याग बना वहाँ श्वेत कपास था
प्रेम की घंटी, सत्कार का चामर
और अहिंसा के ढोल का आजीवन निवास था
ऐसे धर्म से हुआ जो दूर, जीवन हुआ दो कौड़ी
मैं ने मन्दिर की राह जबसे छोड़ी ।
तक़दीर ने दिशाएँ किस्मत की मोड़ी
पहले मुस्कान का था मैं मालिक
खिलखिलाता हरदम रहता था मिज़ाज
हर एक से मोहब्बत का नाता जुड़ा था
यारों की लय से जुड़ती थी आवाज़
सगे-संबंधी मिलते थे दिल खोल
परिवार को था, इस नाचीज़ पे नाज़
पर अब हर रिश्तेदार ने रिश्ते की डोर तोड़ी
मैंने मन्दिर की राह जबसे छोड़ी
खुशी चली कर आँगन को विदा
तूफां हर पल चिंता के उभरे
अपना जो कहते कभी थे मुझको
नज़र चुरा अब अनजान हो गुज़रे
हर शब्द जनने लगा उलझन
व्यवहार के कोई काज न सुधरे
बेचैनी के धन हो गए ज्यादा, चैन की बारिश थोड़ी
मैंने मन्दिर की राह जबसे छोड़ी
मेरे मन्दिर भीतर कोई देव नहीं
गंभारे में सत्य का प्रकाश था
नियति और न्याय थे वहाँ द्वारपाल
ईमान की लॉ का ओजस उजास था
विनय, सद्भाव के चमकते दिए
त्याग बना वहाँ श्वेत कपास था
प्रेम की घंटी, सत्कार का चामर
और अहिंसा के ढोल का आजीवन निवास था
ऐसे धर्म से हुआ जो दूर, जीवन हुआ दो कौड़ी
मैं ने मन्दिर की राह जबसे छोड़ी ।
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