बुधवार, 22 सितंबर 2010

तेरी जय हो गणेश

गणेश के बारे में बताया जाता है कि शुरू में वे निहायत उपद्रवी और उदंड देवता थे -लूटपाट उनकी सहज गतिविधि थी .जहाँ भी कोई पूजा पाठ ,हवन-यज्ञं होता ,वे अपने गणों को लेकर पहुँच जाते और सारे आयोजन को तहस- नहस कर डालते ,आधा खाते, आधा उड़ाते और जो कुछ ले जा सकते थे उसे समेटकर ही वहाँ से टलते .कोई भी आयोजन करते हुवे लोग डरते थे ,कहीं गणेश न आ जाये ...हो सकता है उन्होंने शिव जी से भी शिकायत की हो;मगर हर असमर्थ पिता की तरह उन्होंने भी लाचारी जताई हो: "वह मेरे कहने में थोड़े ही है ....सुनता कहाँ है किसी की ...."इस तरह चारो तरफ गणेश का आतंक था .कोई भी मंगल कार्य करते हुवे गणेश का हिस्सा निकालकर बाहर ही रखवा दिया जाता कि वहीं से ले जाये ...कुछ खिला-पिला कर ख़ातिर वातिर भी  कर दी जाती होगी .इस तरह कालांतर में उपद्रव और अमंगल की साक्षात् मूर्ति गणेश अपनी भ्योत्पद्कता के कारण ही पूजे जाने लगे और फिर तो उन्हें मंगलकारी ,विघ्नविनाशक और न जाने क्या-क्या विरुदावलियाँ मिलने लगीं .वे सुरक्षा और शांति  के विग्रह बने .
                                                                                     कल तक मुहल्ले के जिस दादा के नाम से लोग थर -थर कांपते थे ,जो कहीं भी हत्या और बलात्कार करा सकता था ,वह अपनी शरण में लेकर सबसे बड़ा रक्षक बन जाता है ---बस उसे उसका हफ्ता पहुंचाते रहिये .कुछ और चाहे तो वो भी मुहैया करा दीजिये .जब तक आप उसे खुश रखेंगे पैर फटकार चैन  की नींद सोयेंगे .दूसरा कोई आपका बाल भी बांका नही कर सकता   .इतिहास के सारे राजा महाराजा पहले सबसे बड़े लुटेरे और इलाके के आतंकवादी थे जो बाद में अपने राज्य स्थापित कर चुकने पर सबसे बड़े धर्म रक्षक,प्रजा -वत्सल ,न्याय प्रिय  और विश्वविजयी महाराजाधिराज के रूप में पूजे गये .स्वयं  ईश्वर का जन्म  इसी अनिष्ट के भय से हुआ था