मंगलवार, 1 मार्च 2011

रानी चटर्जी मुझे आकर्षित करती हैं . यह कहना मेरे लिए जितना आसान है इसे सिद्ध कर पाना उतना आसान नहीं है. वे मुझे क्यों अच्छी लगती हैं ? इसका उत्तर और भी कठिन है. उनका व्यक्तित्व बहु आयामी है.उसके सारे आयाम मेरी समझ में आते हैं और उनके सारे आयाम मुझे रुचते हैं ऐसा मैं नहीं कह सकता . उनकी सारी स्थापनाओं, सारे विचारों से सहमत हूँ ऐसा भी नहीं है. फिर भी वे मुझे अच्छी लगती हैं

शुक्रवार, 15 अक्टूबर 2010

आँसुओं से नयन तर हैं देखिए

खौफ के मंजर उधर हैं देखिए
आँसुओं से नयन तर हैं देखिए

देखते थे बैठकर सपने जहाँ,
आज वो घर  खंडहर हैं देखिए

हैं कहीं लाशें, लहू, क्रंदन करुण,
मातमी जद में सफर हैं देखिए

आदमीयत का है ये इम्तहां 'मुकेश',
कब से जख्मी मुंतजिर हैं देखिए

ओही खाती रुसल बाड़ें ना

सईयाँ अलगे बिछाके खाटी आज सुतल बाड़ें
ओही खाती रुसल बाड़ें ना
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(१)बोललो पर बोलत नईखन, सुनत नईखन कहल
     इनके चलते घर में मुश्किल,भईल बाटे  रहल
  हमके डाहे ख़ातिर लेके धंधा उठल बाड़ें
    ओही ..............................................
(२)हफ्ता दिन से सुतत बाड़े, दुअरा  सईयाँ जाई के
    आवतारे दुनो बेरा, होटल से खाना खाई के
   बाकी घर के खाना खईला बीना टूटल बाड़ें
    ओही ..........................................................
(३) मुकेश आधी रात आके, सिकड़ी बजईलें
    जननी ना सुतला में, कब अईलें -  गईलें
   हमरो  पिया दामोदर तहिये से टिहुकल बाड़ें
   ओही ...................................................

शनिवार, 9 अक्टूबर 2010

अंजाना अंजानी : फिल्म समीक्षा

बैनर : नाडियाडवाला ग्रेंडसन एंटरटेनमेंट, इरोज़ एंटरटेनमेंट

निर्माता : साजिद नाडियाडवाला
निर्देशक : सिद्धार्थ आनंद
संगीत : विशाल शेखर
कलाकार : रणबीर कपूर, प्रियंका चोपड़ा, जायद खान
सेंसर सर्टिफिकेट : यू/ए * 2 घंटे 5 मिनट

कहानी को अगर ज्यादा लंबा खींचा जाए तो वो अपना असर खो बैठती है। ऐसा ही कुछ हुआ है ‘अंजाना अंजानी’ के साथ। इस फिल्म को ज्यादा से ‍ज्यादा 90 मिनट में खत्म कर देना था, लेकिन 125 मिनट का वक्त लिया गया। जिससे न केवल फिल्म की गति धीमी हो गई है बल्कि कई लंबे दृश्यों की वजह से यह उबाऊ भी लगती है।
आकाश (रणबीर कपूर) और कियारा (प्रियंका चोपड़ा) एक ब्रिज पर मिलते हैं, जहाँ से दोनों आत्महत्या करने वाले हैं। आकाश को बिज़नेस में जबरदस्त नुकसान हुआ है और कियारा के प्रेमी कुणाल (जायद खान) ने उसे धोखा दिया है, इसलिए वे कायराना कदम उठा रहे हैं।
आत्महत्या की कोशिश असफल होती है। कुछ देर बाद उनकी फिर मुलाकात होती है और वे पाँच बार अपने आपको खत्म करना चाहते हैं, लेकिन हर बार बच जाते हैं। आखिरकार दोनों बीस दिन बाद 31 दिसंबर को आत्महत्या करने की प्लानिंग करते हैं।
इन बीस दिनों में वे वो सब कुछ करना चाहते हैं जो हमेशा से वे करना चाहते थे। एक लंबे सफर पर वे निकलते हैं और एक-दूसरे को वे चाहने लगते हैं। हालाँकि इस बात को वे स्वीकारते नहीं हैं।
31 दिसंबर के पहले आकाश को लगता है कि कियारा को अपने प्रेमी को माफ करना चाहिए और वह उसे अपने घर लौटने पर मजबूर करता है। किस तरह बिछड़ने के बाद उन्हें महसूस होता है कि वे आपस में प्यार करने लगे हैं, ये फिल्म का सार है।
फिल्म की कहानी अच्छी है और इसमें भरपूर इमोशन और एंटरटेनमेंट की गुंजाइश थी, लेकिन इस पर आधारित स्क्रीनप्ले बेहद कमजोर हैं। सीन कुछ इस तरह लिखे गए हैं कि वो बेजान लगते हैं।
शुरुआत के आधे घंटे तक फिल्म बेहद उबाऊ है जब आकाश और कियारा अलग-अलग तरीके से आत्महत्या की कोशिश करते दिखाए गए हैं। सब कुछ इस तरह फिल्माया गया है मानो वे मजाक कर रहे हों। इसके बाद जब आकाश और कियारा बीस दिनों तक जिंदगी का मजा लूटने का प्लान बनाते हैं, तब भी फिल्म में मौज-मस्ती नदारद नजर आती है।
कियारा और आकाश के किरदार भी ठीक से लिखे नहीं गए हैं। आकाश जब भी कियारा के नजदीक आने की कोशिश करता है तो वह उसे बताती है कुणाल को वह भूला नहीं पा रही है। जब वह उसे कुणाल के पास भेज देता है तो उसे आकाश की याद सताने लगती है।
साथ ही दोनों के आत्महत्या करने की कोशिश के पीछे जो कारण बताए गए हैं वो बेहद कमजोर हैं। इतनी छोटी-सी बातों के लिए क्यों कोई अपनी मूल्यवान जिंदगी गँवाना चाहेगा?
किसी भी प्रेम कहानी में इमोशन और कैमेस्ट्री का बहुत महत्व रहता है। ‘अंजाना अंजानी’ की कहानी में वो इमोशन नहीं हैं कि दर्शकों को कियारा और आकाशा से हमदर्दी हो।
रणबीर और प्रियंका की कैमेस्ट्री भी परदे पर दिखाई नहीं देती। जहाँ तक अभिनय का सवाल है तो दोनों ने बेहतरीन काम किया है। खासकर प्रियंका चोपड़ा को अपने किरदार में कई शेड्स दिखाने का मौका मिला और उन्होंने बखूबी अपने पात्र को जिया। रणबीर कपूर कुछ ज्यादा ही उदास नजर आएँ। छोटे से रोल में जायद खान भी ठीक हैं।
निर्देशक सिद्धार्थ आनंद को लगातार बड़े मौके मिले हैं। यशराज फिल्म्स के लिए उन्होंने तीन फिल्में बनाईं और अब साजिद नाडियाडवाला जैसा निर्माता, लेकिन उनके द्वारा बनाई गई फिल्मों से दर्शक जुड़ नहीं पाता है।
जहाँ तक फिल्म के सकारात्मक पक्ष का सवाल है तो कुछ दृश्य ऐसे हैं जो मनोरंजन करते हैं। गुदगुदाते हैं। फिल्म का संगीत पक्ष बहुत मजबूत है। विशाल-शेखर द्वारा संगीतबद्ध ‘अंजाना अंजानी’, ‘आस पास है खुदा’, ‘तुझे भूला दिया’ सुनने लायक हैं।
निर्माता साजिद नाडियाडवाला ने जमकर पैसा खर्च किया है। न्यूयॉर्क, लास वेगास और सेन फ्रांसिस्को में फिल्म को फिल्माया गया है और फिल्म में भव्यता नजर आती है। लेकिन पूरी फिल्म की बात की जाए तो ‘अंजाना अंजानी’ से अंजान बने रहना ही बेहतर है।

क्रुक : बैड एंड बोरिंग

बैनर : विशेष फिल्म्स
निर्माता : मुकेश भट्ट
निर्देशक : मोहित सूरी
संगीत : प्रीतम चक्रवर्ती
कलाकार : इमरान हाशमी, नेहा शर्मा, अर्जन बाजवा, गुलशन ग्रोवर, शेला एलेन

मोहित सूरी द्वारा निर्देशित फिल्म ‘क्रुक’ इतनी बुरी फिल्म है कि सिनेमाघर में बैठना मुश्किल हो जाता है।

लव स्टोरी की बैकड्रॉप में सामयिक घटनाएँ डालकर फिल्म बनाना इन दिनों फिल्मकारों को बेहद पसंद आ रहा है। ऑस्ट्रेलिया में भारतीयों पर कुछ महीनों पहले हमले हुए थे और अभी भी यह मामला पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। इसी को आधार बनाकर ‘क्रुक’ की कहानी का तानाबाना बुना गया है।
प्रेम कहानी, नस्लीय हमले, सेक्सी सीन, फिल्म के हीरो का अच्छाई और बुराई को लेकर असमंजस जैसे कई ट्रेक्स पर फिल्म चलती है और इन सबको समेटना स्क्रीनप्ले राइटर अंकुर तिवारी और निर्देशक मोहित सूरी के लिए मुश्किल हो गया।
फिल्म पर से पूरी तरह उनका नियंत्रण छूट गया और स्क्रीन पर घट रहे घटनाक्रमों में कोई तालमेल नजर नहीं आता।
असल में फिल्म से जुड़े लोग यह निर्धारित नहीं कर पाए कि वे प्रेम कहानी पर फोकस करें या ऑस्ट्रेलिया में हो रह हमलों पर। आधे-अधूरे मन से इस पर काम किया गया है। इससे लव स्टोरी में इतनी तीव्रता नजर नहीं आती कि दर्शक उनके प्रेम से प्रभावित हो और न ही नस्लीय हमलों के इश्यू को ठीक से उठाया गया है।
मोहित सूरी ने यह मान लिया कि इमरान हाशमी फिल्म हैं इसलिए दर्शक हॉट या बोल्ड सीन की आशा लिए आएँगे। इसलिए उन्होंने इस तरह के दृश्यों को बिना कहानी में जगह बनाए ठूँस दिया है।
फिल्म के किरदारों को भी ठीक से नहीं लिखा गया है। इमरान हाशमी अभिनीत किरदार जय/सूरज के पिता वाला प्रसंग अधूरा सा लगता है। वह प्यार करता है सुहानी को, लेकिन सोता है निकोल के साथ। उसकी अच्छाई और बुराई के बीच की उलझन को भी ठीक से स्पष्ट ‍नहीं किया गया है। सुहानी के भाई समर्थ के किरदार को समझना भी टेढ़ी खीर है।
नस्लीय मामले में लेखक ने भारतीयों को दोषी ठहरा दिया है और वो भी बिना किसी ठोस कारण के, इससे फिल्म देखने का मजा और खराब हो जाता है। इमरान हाशमी के दोस्तों के जरिये हँसाने की कोशिश की गई है जो बेहद बनावटी लगती है और चिढ़ पैदा करती है।
‘जहर’ और ‘वो लम्हें’ जैसी फिल्में बना चुके और बड़ी-बड़ी बातें करने वाले निर्देशक मोहित सूरी का निर्देशन भी घटिया है। एक खराब लिखे स्क्रीनप्ले को उन्होंने बेहद खराब तरीके से पेश किया है। दृश्यों में तालमेल का अभाव है।
इमरान हाशमी और नेहा शर्मा का अभिनय अच्छे से बुरे के बीच झूलता रहता है। अर्जन बाजवा और शेला एलेन असर छोड़ते हैं। प्रीतम ने कुछ अच्छी धुनें बनाई है। कुल मिलाकर ‘क्रूक : इट्स गुड टू बी बैड’ बुरी और बोरिंग फिल्म है।

गुरुवार, 30 सितंबर 2010

खामोश मिलन (कविता)

आज


जबकि ये तय है

कि हमें बिछड़ जाना है

हमारे और तुम्हारे रास्ते

अलग अलग हो चुके हैं

तो

ये सोचना जरूरी है

कि हम गलत थे

या तुम?

मैं सोचता हूँ

और सोचता चला जाता हूँ...

कहीं मैं तो गलत नहीं था

शायद !

क्योंकि तुम तो गलत हो नहीं सकते

मुझे लगता है

मैं ही गलत था

मैं ये भी जानता हूँ

कि

तुम भी यही सोच रही हो

कि कहीं तुम तो गलत नहीं थी?

सच मानो-

रास्ते आज भले ही अलग-अलग हो गए हों

पर

न मैं गलत था

और न ही तुम।

फिर ये जुदाई क्यों?

ये प्रश्न बार बार कौंध जाता है

मेरे जेहन में .

मैं सोचने लगता हूँ...

जमीं आसमां नहीं मिलते

( विज्ञान में यही पढ़ा है

पर विज्ञान कुछ भी कहे )

जमीं आसमां मिलते हैं

एक छोर से मिलते हुए

वे जुदा होते हैं

और

फिर मिल जाते हैं

सच्चाई यही है कि

चारो दिशाओं में

वे एक हैं.

बीच में हम जैसे लोग हैं

जो ये समझते हैं कि

जमीं आसमां एक नहीं हैं.

करोड़ों तारों की तपिश

अपने कलेजे में रखने वाला आसमां

और

अरबों लातों की मार सहने वाली धरती

एक हैं।

फिर हम तुम जुदा कैसे?

हम मिलकर चले थे,

आज जुदा हैं..

पर आगे फिर मिलेंगे।

हाँ !

उसके बाद जुदाई नहीं होगी

क्योंकि

जितना दर्द तुमने अपने कलेजे में छुपा कर रखा है

उतना ही शायद मैंने भी।

और दर्द सीने में दबाये रखने वाले

एक होकर रहते हैं

वो भी ऐसे

जैसे दूर क्षितिज पर

जमीं और आसमां

जहाँ से वे अलग नहीं होते।

मैं तुम्हें रुकने को नहीं कहूँगा

और न ही मिलने को कहूँगा

पर हम फिर मिलेंगे

उसी ख़ामोशी से जैसे पहले मिले थे।

हाँ !

ये मिलन खामोश होगा

क्योंकि

जिनके कलेजे में दर्द होता है

उनकी जुबां नहीं हिलती

बिलकुल मेरी तरह....

बिलकुल तुम्हारी तरह.....

मोहम्मद रफी : कुछ अनजाने तथ्य

हिन्दी फिल्मी गीतों के लिए कभी अपरिहार्य नाम मोहम्मद रफी की आवाज़ को लोग आज भी याद करते हैं और उतनी ही चाव से सुनते हैं. उनकी जिंदगी से जुड़े कुछ रोचक तथ्य:






बचपन में वे फीका के नाम से जाने जाते थे.
रफी के जीजा मोहम्मद हामिद ने उनकी गायकी की प्रतिभा को पहचाना और उन्हें गाने को प्रोत्साहित किया था
13 वर्ष की उम्र में रफी ने पहली बार गाना गया था
रफी के परिवार का लाहौर में सलून था
रफी ने अपने फिल्मी करियर की शुरूआत 1941 में गुल बलोच से की थी
रफी मानते थे कि उनका पहला हिन्दी गाना "अजी दिल हो काबू में" था जो कि 1945 में बनी फिल्म गावँ की गोरी में था
1945 में उन्होनें अपनी चचेरी बहन बशिरा से विवाह किया
रफी ने मात्र नौशाद के लिए कुल 149 गाने गाए.
 रफी ने सबसे अधिक गाने लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के लिए गाए [369]
रफी के द्वारा गाया गया गाना "मन तडपत है हरी दर्शन को आज" इस वजह से भी प्रसिद्ध है क्योंकि इसके लेखक [शकील बदायूँ], संगीत निर्देशक [नौशाद] और गायक [मो. रफी] तीनों मुस्लिम थे
रफी ने अपना पहला फिल्मफेयर पुरस्कार "चौदवीं का चाँद" गीत के लिए प्राप्त किया था
1965 मे उनको "पद्मश्री" दिया गया
रफी का गाया अंतिम गाना "शाम फिर क्यो उदास है" था
31 जुलाई 1980 को दिल का दौरा पड़ने  से उनका देहांत हुआ वे अपने पीछे सात संतान [सईद रफी, खालिद रफी, हामिद रफी, शाहिद रफी, परवीन, नसरीन और यास्मीन] और 18 पोते पोतियाँ छोड गएउनके निधन पर भारत सरकार ने दो दिन का राष्ट्रीय शोक रखा

बुधवार, 22 सितंबर 2010

ई कवन चाल हवे मार के पलट गईल (भोजपुरी ग़ज़ल )

जाड़ जब आवे त लगे आके सट गईल
ई कवन चाल हवे मार के पलट गईल

झूठ बोल के झगरा लगा दिहलस छिनरी
पूछे जब गईनी त बात से उलट गईल

गाछ पर चढ़ाके  कहलस कूदs हम बचा  लेब 
कूद जब गईनी त धीरे से हट  गईल 

डोरा मांगी पईंचा हम खूब ढिल्ली छोड़नी

दोसरा से फंस के पतंग हमार कट  गईल


फुहरी  के लईका  के संगे  रही -रही  के
गारी  हमार बाबू  त सुग्गा  नियर  रट  गईल


पास  हम कर गईनी बिना  कुछ  पढ़ले  
जे  रहे  पढ़ले  ऊ  परीक्षा  से छंट   गईल


मार -काट  दंगे  में  निकलल  बा  नतीजा  
मियां  के लईकी  अगर  हिन्दू  से पट  गईल


आपन  जे  ठुकरईली  पिरितिया  हमार
भगवानो  पर से विस्वास  हमार हट गईल














धुंआ (भोजपुरी कविता )

कबले धुंआ अईंठ के
रसरी बनावत  रहीं
शीशा से आपन
मुँह चोरावत रहीं
आखिर तहरो  किहाँ त
बादल  उठत होई  

तेरी जय हो गणेश

गणेश के बारे में बताया जाता है कि शुरू में वे निहायत उपद्रवी और उदंड देवता थे -लूटपाट उनकी सहज गतिविधि थी .जहाँ भी कोई पूजा पाठ ,हवन-यज्ञं होता ,वे अपने गणों को लेकर पहुँच जाते और सारे आयोजन को तहस- नहस कर डालते ,आधा खाते, आधा उड़ाते और जो कुछ ले जा सकते थे उसे समेटकर ही वहाँ से टलते .कोई भी आयोजन करते हुवे लोग डरते थे ,कहीं गणेश न आ जाये ...हो सकता है उन्होंने शिव जी से भी शिकायत की हो;मगर हर असमर्थ पिता की तरह उन्होंने भी लाचारी जताई हो: "वह मेरे कहने में थोड़े ही है ....सुनता कहाँ है किसी की ...."इस तरह चारो तरफ गणेश का आतंक था .कोई भी मंगल कार्य करते हुवे गणेश का हिस्सा निकालकर बाहर ही रखवा दिया जाता कि वहीं से ले जाये ...कुछ खिला-पिला कर ख़ातिर वातिर भी  कर दी जाती होगी .इस तरह कालांतर में उपद्रव और अमंगल की साक्षात् मूर्ति गणेश अपनी भ्योत्पद्कता के कारण ही पूजे जाने लगे और फिर तो उन्हें मंगलकारी ,विघ्नविनाशक और न जाने क्या-क्या विरुदावलियाँ मिलने लगीं .वे सुरक्षा और शांति  के विग्रह बने .
                                                                                     कल तक मुहल्ले के जिस दादा के नाम से लोग थर -थर कांपते थे ,जो कहीं भी हत्या और बलात्कार करा सकता था ,वह अपनी शरण में लेकर सबसे बड़ा रक्षक बन जाता है ---बस उसे उसका हफ्ता पहुंचाते रहिये .कुछ और चाहे तो वो भी मुहैया करा दीजिये .जब तक आप उसे खुश रखेंगे पैर फटकार चैन  की नींद सोयेंगे .दूसरा कोई आपका बाल भी बांका नही कर सकता   .इतिहास के सारे राजा महाराजा पहले सबसे बड़े लुटेरे और इलाके के आतंकवादी थे जो बाद में अपने राज्य स्थापित कर चुकने पर सबसे बड़े धर्म रक्षक,प्रजा -वत्सल ,न्याय प्रिय  और विश्वविजयी महाराजाधिराज के रूप में पूजे गये .स्वयं  ईश्वर का जन्म  इसी अनिष्ट के भय से हुआ था  

मंगलवार, 21 सितंबर 2010

कल रात भूल हो गयी उनसे

गर्भनिरोधक की हर खोज ने स्त्री को कुछ और मुक्ति दी है, कुछ और विकल्प दिया है . जीवन जीने की शैली का चुनाव, बच्चे होँ या न होँ , होँ तो कितने और कब? यह सब चुनाव तभी सम्भव हुआ जबसे गर्भनिरोधक का विकल्प उसे मिला. उससे पहले यदि विकल्प नाम की कोई वस्तु थी तो केवल विवाह करना या न करना हीँ .




अब यह नई इमरजेंसी गोली आ गयी है . इसके विज्ञापन में हीं कहा जाता है कि यह गर्भपात से बेहतर है. जो की गलत नहीं हो सकता. लेकिन क्या सथ मेँ यह न्ही बताया जाना चाहिए कि यह केवल अपातकाल के लिए है. इसका गर्भनिरोधक की तरह उपयोग नही होना चाहिए ? कोई जीवनकाल मेँ दो चार बार ले ले , तो समझा जा सकता है किंतु इसे बार-बार लिया जाए तो यह अपने शरीर के हार्मोंस के साथ खिलवाड है. कहीँ भी इसे नही बताया जाता कि कहुन इसे ना ले.



सिरदर्द की गोली की तरह यदि स्त्रियाँ इसका उपयोग करने लगेंगी तो इसका दिर्घकालिन परिणाम क्या होगा? शायद हमेँ पता नही है . हो सकता है कि गोली लेने के बाद केवल छोटो मोटे दुष्परिणाम हीँ होते होँ जैसे मितली, चक्कर , सिरदर्द फिर भी एक दुष्परिणाम होने का भय तो है हीँ . ठिक वैसे ही जैसे हर अच्छी वस्तु के साथ होता है. यह दो परिणाम हैँ ” यौन रोग” और पुरूष का अपने उत्तरदायित्व से मुँह मोडना .



यह बाज़ार की नई साजिश है. जो प्रो- मेन है . अब वह सोच सकते हैँ कि कोई गलती हुई तो यह गोली तो है न ! होना यह चाहिए की तम्बाकु उत्पादोँ के विज्ञापनोँकी तरह हीँ , इस गोली के विज्ञापन के साथ भी चेतावनी दिखाई जानी चाहिए . यह गोली बलात्कार या अन्य किसी आपदा मेँ वरदान साबित हो सकती है, किन्तु नियमित उपयोग के लिए नही है, यह ध्यान रखना चाहिए . जैसे हम हर स्थिति से निबटने के लिए प्लान “ए” और प्लान “बी” भी बनाते हैँ , वैसे हीँ यह गोली केवल प्लान बी हो सकती है. स्त्रियाँ वैसे हीँ अपने स्वास्थ्य के प्रति लापरवाह होती हैँ. कहीँ यह आपातकालिन गर्भनिरोधक गोली कोई आपदा हीँ न ले आए.



सलाना करीब 82 लाख गोलीयोँ की बिक्री को देखते हुए , दवा कम्पनियाँ , इसका खुब विज्ञापन कर रही हैँ , लेकिन दुरउपयोग को रोकने के बारे मेँ ज्यादा जागरूकता नही पैदा की जा रही. विज्ञापनोँ के चलते जो लोग इस बात को जान गयेँ हैँ , कि ये गोलियाँ , अनचाहे गर्भ को रोकती हैँ , लेकिन आपातकाल शब्द पर जोर नही दिया जा रहा है. सिप्ला की आई- पिल भारत मेँ सबसे ज्यादा बिकने वाला ब्राँड है, जबकी दूसरे ब्राँडो मेँ मैनकाइन्ड फार्मा का अन्वांटेड 72 तथा अन्य ब्रान्ड भी हैँ .



डॉक्टरोँ का बडा वर्ग , इनकी खुलेआम बिक्री का समर्थन करता है, हलांकि कुछ डॉक्टरोँ का मानना है कि इन्हे डॉक्टर की सलाह पर दिया जाना चाहिए. लोगोँ को समझना चाहिए कि एक आई-पिल नियमित गर्भनिरोधकोँ का विकल्प नही हो सकती. इसके साथ हीँ इसका इस्तेमाल आपातकाल मेँ ही करना चाहिए जिसका आशय पैदा किए गये आपातकाल से कतई नही है. यह गोलीयाँ एड्स का खतरा भी पैदा कर सकती हैँ . इन दवाओँ के बारे मेँ जरूरी निर्देषोँ को स्पष्ट रूप से प्रकाशित करने की तत्काल जरूरत है. साथ हीँ इनके दुष्प्रभावोँ और वैधानिक चेतावनी के बारे मेँ बताया जाना चाहिए . इससे इनका दुरउपयोग रूकेगा.ऐसा नही है कि इससे पहले महिलाओँ के लिए कोइ गर्भनिरोधक दवाई बाज़ार मेँ नही आई. लेकिन अब सिर्फ 72 घंटे मेँ ही सुरक्षा की गारंटी देती यह दवाईयाँ अपना युएसपी, इसे ही बना रही हैँ . सामाजिक मनोवोज्ञान के जानकार, इसके अन्य पहलूओँ को गम्भीरता से लेते हैँ , उनका मानना है , कि तेजी से बदलते भारत मेँ , इसका नुकसान ज्यादा है .



सिप्ला की वेबसाईट पर निचे गुलाबी रंग से यह साफ-साफ लिखा हुआ है: – इसका उपयोग डॉक्टरी सलाह पर हीँ किया जा सकता है ! साथ हीँ कम्पनी यह लिखना भी नही भूली है कि यह गोली गर्भपात की गोली नही है. भारत मेँ जहाँ नाम भर लिख लेने वालो को सक्षर मान लिया जाता है , वहाँ शिक्षा का प्रतिशत मात्र 64% है . ऐसे मेँ उन्हे अच्छा-बुरा कौन समझाएगा.



हलांकि इस विषय पर बहुत कुछ लिखा जा सकता है पर बेशर्मी की हद पार चुके व्यपार जगत से ज्यादा गुस्सा देश को दशा देने का दावा करने वाले न्यूज़ चैनल और अखाबारोँ मेँ इसके विज्ञापन को देख कर आता है . क्या दिखा रहेँ है यह लोग , अनचाहे गर्भ से मुक्ति दिलाने वाली गोलियोँ का विज्ञापन?



” मैँ अभी प्रेगनेंट नही होना चाहती हूँ – ” की पंच लाइन के साथ कल रात भूल हो गई? गोली खाइये और भूल से छुटकारा. और ऐसी गोलियाँ हैँ , तो डर किस बात का ? करिये भूल और अनचाहे गर्भ से मुक्ति ! क्या बेच रहे हो ? अनचाहे गर्भ से मुक्ति की गारंटी? क्या सिखा रहे हो ? – उन्मुक्त यौनाचार !



आज यह पिल्स युवाओँ की जरूरत बनती जा रही हैँ , इस पिल्स का मीडिया मेँ किया गया धुआँधार प्रचार जिसके कारण आज इस मॉर्निँग पिल्स का इस्तेमाल पार्ंपरिक गर्भ निरोधक के रूप मेँ किया जा रहा है . इसके कई दुष्प्रभाव हैँ . कम्पनी के अनुसार 72 घंटे के अनदर इस पिल्स का सेवन कर अनचाहे गर्भ से मुक्ति पाई जा सकती है. गोली लेनी से प्रेगनेंट होने की सम्भावना 69% तक घट जाती है . देखा गया है कि आजकल की कामकाजी महिलायेँ , इन पिल्स का बेखौफ और लापरवाही के साथ गर्भनिरोधक के रूप मेँ इस्तेमाल कर रही हैँ . यदि रोजाना सेक्स का आनन्द लेता है या लेना चाहता है तो इमरजेंसी पिल्स का सेवन ना करे. यह पिल्स एच. आई. वी से भी रक्षा नही करती . यह पिल्स कंडोम या बर्थ कंडोम की तरह नही है .



अनचाहे गर्भ से छुटकारा पाने के लिए अविवाहित लडकियाँ भी इस्तेमाल करने लगी हैँ . लड्कियाँ इसे एबार्शन पिल्स की तरह इस्तेमाल करती हैँ . सम्बन्ध बनाने के अगले दिन वह बेधडक इस पिल्स को खा लेती हैँ . जैसे रात को कुछ हुआ हीँ न हो , बस एक भूल के अलावा!



टी वी और मीडिया हमे एड्वांस बना रहे हैँ. और दवाई कम्पनियाँ अपना मुनाफा देख रहीँ है, अब ऐसे विज्ञापन आने पर अगर अपने पिता के साथ बैठी हो तो टी वी बन्द करने की जरूरत नही. अब आप देखिए खुशी से कल रात भूल करने और प्रेगनेंट नही होने के नुस्खे !