इस बार के विधानसभा चुनाव में बिहार नया इतिहास लिखने जा रहा है. यहां की बहुमत आबादी ने मन बना लिया है. लोग जाति की राजनीति की सीमाएं देख चुके हैं. और इस बार वे जाति की राजनीति करनेवालों को सबक सिखायेंगे. पिछले पांच वर्षो व उसके पहले के पंद्रह वर्षो के शासन का अंतर लोग साफ़-साफ़ देख रहे हैं.
अंतर ऐसा झलक रहा है कि दूसरे प्रदेशों यहां तक कि विदेश के भी लोग बिहार के बदलाव को महसूस कर रहे हैं. वह चाहे सड़क का मामला हो या कानून-व्यवस्था या फ़िर शिक्षा का-हर जगह विकास दिख रहा है. इसीलिए आनेवाला चुनाव बहुत हद तक जाति आधारित नहीं होने जा रहा है. एक तरह से कहें तो बिहार में अंदर ही अंदर साइलेंट मूवमेंट (चुपचाप आंदोलन) चल रहा है. 20 साल पहले जिनका जन्म हुआ वे पहली बार इस चुनाव में मतदान करेंगे.
नवनिर्माण में अपनी भूमिका बढ़-चढ़ कर निभायेंगे, क्योंकि उन्होंने यथार्थ को भोगा है. तब और अब को महसूस किया है, उसको जिया है.बिहार में कुछ लोग जातीय समीकरण बनाने की कोशिश कर रहे हैं. उन्हें लगता है कि वे अपनी जाति के बड़े नेता हैं, लेकिन वे भ्रम में हैं. अभी छपरा में महापंचायत हुई.
इसमें राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद ने प्रभुनाथ सिंह से अपनी नयी दोस्ती के बारे में कहा कि यह ब्रह्म बाबा के लासा-जैसा है. लालू जी को मालूम होना चाहिए कि ब्रह्म बाबा का लासा निर्जीव चीजों को जोड़ता है, सजीव चीजों को नहीं. प्रभुनाथ सिंह निर्जीव होंगे, तो जुड़ जायेंगे. प्रभुनाथ व लालू प्रसाद जितना कह लें, राजपूतों व यादवों का मिलन असंभव है. दोनों के बीच जमीनी स्तर पर संघर्ष है.
जमीनी स्तर का प्रतिवाद किसी लालू प्रसाद या प्रभुनाथ सिंह के प्रयास से खत्म होनेवाला नहीं है.समाज में ये दानों जातियां लाठी के मामले में भी ताकतवर हैं, लेकिन अपनी राजनीतिक प्रगति के लिए स्वाभिमान की बात भी खड़ा करती हैं. और उसे पूरा करने की ताकत दोनों नेताओं में नहीं है. जिसे सीटें नहीं मिलेंगी, वह अलग हो जायेगा. निर्दलीय खड़ा हो जायेगा.बिहार में बाहुबली-अपराधियों का अपने-अपने इलाके में राज चलता था.
विधानसभा व संसद में भी ये पहुंचते थे. आज वही बिहार बता रहा है कि ऐसे लोगों की जगह केवल जेल में है. कोई भी बाहुबली या कानून तोड़नेवाला कानून बनाने वाली संस्था का सदस्य नहीं बनेगा. बिहार का जनादेश राष्ट्रीय स्तर पर भी दिशा देगा.
राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेसनीत महंगाई, भ्रष्टाचार व आतंकवाद के कारण राजनीतिक निराशा का माहौल है. राजनीति में तीन चीजों का बड़ा महत्व है. वे हैं संघर्ष, संवाद व संपर्क. इसके साथ ही राजनीति में बाजार व पैसे का महत्व बढ़ा है. इसी कारण आम लोग राजनीति से निराश हुए हैं.
राजनीतिक दलों से लोगों की अपेक्षाएं पूरी नहीं हो रही हैं. दल रचनात्मक काम से दूर होते जा रहे हैं.1974 में भी ऐसी ही निराशा आयी थी, तब भी बिहार ने दिशा दी थी. इस चुनाव से देश को बड़ी उम्मीद है.