बुधवार, 22 सितंबर 2010

ई कवन चाल हवे मार के पलट गईल (भोजपुरी ग़ज़ल )

जाड़ जब आवे त लगे आके सट गईल
ई कवन चाल हवे मार के पलट गईल

झूठ बोल के झगरा लगा दिहलस छिनरी
पूछे जब गईनी त बात से उलट गईल

गाछ पर चढ़ाके  कहलस कूदs हम बचा  लेब 
कूद जब गईनी त धीरे से हट  गईल 

डोरा मांगी पईंचा हम खूब ढिल्ली छोड़नी

दोसरा से फंस के पतंग हमार कट  गईल


फुहरी  के लईका  के संगे  रही -रही  के
गारी  हमार बाबू  त सुग्गा  नियर  रट  गईल


पास  हम कर गईनी बिना  कुछ  पढ़ले  
जे  रहे  पढ़ले  ऊ  परीक्षा  से छंट   गईल


मार -काट  दंगे  में  निकलल  बा  नतीजा  
मियां  के लईकी  अगर  हिन्दू  से पट  गईल


आपन  जे  ठुकरईली  पिरितिया  हमार
भगवानो  पर से विस्वास  हमार हट गईल