हिन्दी फिल्मी गीतों के लिए कभी अपरिहार्य नाम मोहम्मद रफी की आवाज़ को लोग आज भी याद करते हैं और उतनी ही चाव से सुनते हैं. उनकी जिंदगी से जुड़े कुछ रोचक तथ्य:
बचपन में वे फीका के नाम से जाने जाते थे.
रफी के जीजा मोहम्मद हामिद ने उनकी गायकी की प्रतिभा को पहचाना और उन्हें गाने को प्रोत्साहित किया था
13 वर्ष की उम्र में रफी ने पहली बार गाना गया था
रफी के परिवार का लाहौर में सलून था
रफी ने अपने फिल्मी करियर की शुरूआत 1941 में गुल बलोच से की थी
रफी मानते थे कि उनका पहला हिन्दी गाना "अजी दिल हो काबू में" था जो कि 1945 में बनी फिल्म गावँ की गोरी में था
1945 में उन्होनें अपनी चचेरी बहन बशिरा से विवाह किया
रफी ने मात्र नौशाद के लिए कुल 149 गाने गाए.
रफी ने सबसे अधिक गाने लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के लिए गाए [369]
रफी के द्वारा गाया गया गाना "मन तडपत है हरी दर्शन को आज" इस वजह से भी प्रसिद्ध है क्योंकि इसके लेखक [शकील बदायूँ], संगीत निर्देशक [नौशाद] और गायक [मो. रफी] तीनों मुस्लिम थे
रफी ने अपना पहला फिल्मफेयर पुरस्कार "चौदवीं का चाँद" गीत के लिए प्राप्त किया था
1965 मे उनको "पद्मश्री" दिया गया
रफी का गाया अंतिम गाना "शाम फिर क्यो उदास है" था
31 जुलाई 1980 को दिल का दौरा पड़ने से उनका देहांत हुआ वे अपने पीछे सात संतान [सईद रफी, खालिद रफी, हामिद रफी, शाहिद रफी, परवीन, नसरीन और यास्मीन] और 18 पोते पोतियाँ छोड गएउनके निधन पर भारत सरकार ने दो दिन का राष्ट्रीय शोक रखा