सोमवार, 30 अगस्त 2010
उचित खुराक न मिलना शर्मनाक
पश्चिमीअर्थशास्त्र ने खाद्य सुरक्षा और खाद्य असुरक्षा जैसे शब्द दिये है। हमारे लिए उसका परम्परागत अर्थ एक मनुष्य को गर्भ में आने से लेकर अन्तिम सांस तक स्वस्थ रहने के लिए जितना और जैसा न्यूनतम आहार चाहिए उसकी निश्चित उपलब्धता एवं अनुपलब्धता ही है। इस कसौटी पर यदि हम भारत के नौनिहाल और उनको जनने वाली माताओं की दशा का आकलन करें तो तस्वीर दिल दहलाने वाली और भारत के भविष्य की ष्टि से अत्यंत ही चिंताजनक है। वर्तमान अंतरराष्ट्रीय आर्थिक ढांचे में भविष्य की आर्थिक महाशक्ति माने जाने वाले हमारे देश के नीतिनि र्माताओं और उनके समर्थन में ढोल पीटनेवाले विशेषज्ञों, बुद्धिजीवियों, पूंजीशाहों के सामने यह शर्मनाक और भयावह तथ्य बिल्कुल स्पष्ट है कि हमारे यहां कुपोषित-न्यूनपोषित बच्चों तथा माताआें का प्रतिशत दुनिया में सबसे ज्यादा है। विश्व बैक ने अपनी रिपोर्ट इंडियाज अंडरनरिस्ड चिल्ड्रेन यानी भारत के अंतपाषित बच्चे में कहा है कि भारत में औसत छ: करोड़ बच्चे कम वजन के शिकार है। यानी सब सहारा अफ्रीका से दोगुना। 30 प्रतिशत बच्चे कम वजन वाले पैदा होते है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि पिछले एक दशक में आवश्यक पोषक तत्वांे से वंचित बच्चों की संख्या कम करने की दिशा में प्रगति अन्य अनेक देशों की तुलना में कम एवं धीमी है। कुपोषित-अल्पपोषित बच्चों एवं माताओं सम्बन्धी तस्वीर तब और डरावनी हो जाती है जब हम विभिन्न राज्यों एवं उनमें अलग-अलग सामाजिक-आर्थिक समूहों के बीच व्याप्त असमानता देखते है। ग्रामीण क्षेत्रों में आधे बच्चे कम वजन वाले पैदा होते है, जबकि शहरों में 38 प्रतिशत। कम वजन वाली बच्चियों का अनुपात 48.9 प्रतिशत एवं बच्चों का 45.5 प्रतिशत है। दलितों यानी अनुसूचित जनजाति में 56.2 प्रतिशत एवं अनुसूचित जनजाति 53.2 प्रतिशत जबकि अन्य जातियों में औसतन 44.1 प्रतिशत बच्चे ही कम वजन वाले पैदा होते है। कम वजन या अस्वस्थ बच्चों का कारण ही माताओं का कुपोषण। नेशनल फैमिली हेल्थ सव यानी राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सवक्षण के तीसरे दौर 2005-06 को सभी मानकों पर विश्वसनीय माना जाता है। इसने माना है कि आवश्यक पौष्टिक खुराक नहीं मिलने के कारण भारत में 50 लाख बच्चे प्रतिवर्ष मर जाते है। यानी प्रति छ: सेकेण्ड में एक बच्चा आवश्यक भोजन के अभाव में हमारे यहां दम तोड़ देता है। विश्व बैक की रिपोर्ट कहती है कि बच्चों की कुल मृत्यु में से आधी केवल आवश्यक न्यूनतम भोजन न मिलने के कारण होता है। साथ ही भारत में कुल बीमारियों में 22 प्रतिशत का कारण भी यही है। यूनिसेफ की रिपोर्ट कहती है कि हमारे यहां प्रति एक लाख गर्भस्थ माताओं में 450 तो बच्चा जनने के दौरान ही चल बसती है। इनकी संख्या प्रतिवर्ष है, 78 हजार। महिलाओं के स्वास्थ्य को मापने के लिए बीएमआई यानी बड़ी मॉस इन्डेक्स का मानक है, जिसमें वजन का उम््रा से भाग किया जाता है। इसमें दुबलापन की न्यूनतम सीमा रेखा 18.5 है, जिसका अर्थ है, भीषण कुपोषण का शिकार। इसी प्रकार, बीएमआई 25 का अर्थ है, अत्यधिक वजन और मोटापा। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सवक्षण के अनुसार 15 से 49 वर्ष की 36 प्रतिशत यानी एक तिहाई से ज्यादा महिलाएं 18.5 के मानक से कम है। यानी ये भयानक कुपोषण से ग्रस्त हंै। दूसरे शब्दों में कहें तो यदि ये जीवित है तो भगवान भरोसे और यदि जीवित रहते हुए भी अपनी जिम्मेवारी निभा रहीं है तो केवल भारत के पारिवारिक संस्कारों और उससे मिली अदम्य जिजीविषा की बदौलत ही। विवाहित महिलाओं में 33 प्रतिशत इस श्रेणी में है। कुपोषण की शिकार इन महिलाओं द्वारा जन्म दिए गए बच्चे स्वभाविक ही सामान्य महिलाओं के बच्चों से ज्यादा कुपोषण के शिकार होंगे। विश्व स्वास्थ्य संगठन से लेकर, विश्व बैक एवं ऐसी अन्य रिपोटां में वर्तमान स्वास्थ्य विश्लेषण के अनुसार लौह, आयोडिन, विटामिन ए, प्रोटीन आदि की कमी का ब्योरा दिया गया है। इसके अनुसार गर्भस्थ माताओं की मृत्यु का करीब 22 प्रतिशत कारण केवल लोहे की कमी होता है। इसी प्रकार विटामिन ए की कमी बच्चों को विरुपित करने से लेकर उनकी मृत्यु का कारण बनती है। रक्ताल्पता पर अध्ययन करने वालों ने माना है कि भारत में गर्भस्थ स्त्रियों में आधी तथा बच्चा जनने के बाद स्तनपान कराने वाली माताओं में कम से कम एक तिहाई इससे पीड़ित है। कई राज्यों के वंचित तबकों में 87 प्रतिशत तक गर्भस्थ एवं स्तनपान कराने वाली स्त्रियां रक्ताल्पता की शिकार पाई गईं। केवल इसके कारण गर्भावस्था या बच्चा जनने के दौरान 22 हजार महिलाओं की मृत्यु हो जाती है। इसी प्रकार विटामिन ए की कमी के कारण दुनिया भर में जितनी गर्भस्थ महिलाएं रतौधी का शिकार होती है, उनमें हर दूसरी भारत की है-कुल 62 लाख में 30 लाख। विश्व बैक को खलनायक मानने वाले इस रिपोर्ट के पीछे भी कुछ निहितार्थ तलाशेंगे और यह हो भी सकता है, पर यह हवा में तैयार नहीं किया गया है। इसमें अनेक ाोतों से प्राप्त तथ्यों को आधार बनाया गया है। मान लीजिए सवक्षणों, अध्ययनों से रिपोर्ट और आंकड़े न भी दिए जाएं तो क्या हमारी आंखों के सामने कुपोषित-न्यूनपोषित, दुर्बल, अशक्त महिलाएं, बच्चे नहीं आते क्या भूख से बिलबिलाते बच्चों एवं महिलाओं को हम नहीं देखते इनकी एक अखिल भारतीय तस्वीर अपने मन में बना लीजिए, फिर निष्कर्ष आपके सामने होगा। कुपोषित-न्यूनपोषित महिलाओं एवं बच्चों की भारी तादाद हमारे मौजूदा भारत का भयावह सच है। हम अत्यधिक विश्लेषण एवं भारी अंग्रेजी शब्दावलियों में न जाएं तो साफ दिखाई देगा कि कुपोषण या अल्पपोषण का प्राथमिक और एकमात्र मूल कारण उपयुक्त भोजन सामग्री का अभाव है।इसे आप खाद्य असुरक्षा या कोई नाम दे दीजिए। हां, कुपोषण एवं न्यूनपोषण के पीछे दूसरे निर्धारक भी है, किन्तु वे सारे तो समय पर आवश्यक सामान्य पौष्टिक भोजन न मिलने के परिणाम है। यदि भारतीय रसोई की परम्परागत पवित्र थाली किसी माता को मिलती रहे तथा वनस्पतियों और फल-फूलों तक उसकी आसान पहुंच तो फिर उसके शरीर में किसी तत्व, यौगिक, खनिज, या मिश्रण की कमी नहीं होगी। अलग से गोली के रूप में लोहा, या खनिज लेने की आवश्यकता भी पौष्टिक भोजन न मिलने से ही पैदा होती है। फिर महिलाएं क्यों किसी बीमारी की शिकार होंगी! जब महिलाएं स्वस्थ होंगी तो उनका गर्भस्थ शिशु भी स्वस्थ होकर कुलांचे मारते पैदा लेगा और पैदा होने के बाद उसे स्वस्थ मां की छाती से पर्याप्त और पौष्टिक दूध मिलेगा। मनुष्य के विकास का मूल आधार गर्भस्थ होने से लेकर पैदा होने के बाद के दो वर्ष तक हो जाता है और इस काल में जो क्षति हो गयी उसकी पूर्ति असम्भव होती है। कम वजन लेकर पैदा होने वाले बच्चों के भावी विकास की ष्टि से अगले दो वर्ष में क्षति हो चुकी होती है। इसका निदान केवल और केवल उपयुक्त भोज सामग्री की उपलब्धता में है। रिपोटां से यह साफ हो गया है कि अल्पपोषितों के मामले में सामाजिक-आर्थिक एवं भौगोलिक समूहों के बीच असमानता 1990 के दशक में बढ़ी है। यानी आर्थिक सुधारों के काल में। तो इसका अर्थ यह हुआ कि आर्थिक विकास के उछलते आंकड़े पिछड़े परिवारों के बच्चों और माताओं को न्यनूतम आवश्यक पोषणयुक्त भोजन पहुंचाने का आधार साबित नहीं हुए है। सच तो यही है कि तथाकथित विकास के इस ढांचे में पौष्टिक आहार भी नकद आधारित और इतना महंगा हो गया है कि जिस देश में 37 प्रतिशत लोगों के पास अपनी न्यूनतम आवश्यकता की पूर्ति का साधन नहीं है, वे कहां से इसे खरीद पाएंगे! खाद्य सामग्री की महंगाई के लगभग पिछले तीन वष्रो में स्थिति और बदतर हुई है। जाहिर है, इसके लिए हमें आज के सन्दर्भ में परम्परागत भारतीय जीवन शैली की ओर लौटने की आवश्यकता है जिसमें हाथी के लिए मन भर और चींटी के लिए कण भर उपलब्ध कराने की स्वाभाविक-स्वचालित व्यवस्था थी और समाज की मुख्यधारा का स्वभाव न्यूनतम में ही सन्तुष्ट होने का था। कृषि की प्रधानता के रूप में ख्यात देश में हमारे बच्चे और उनकी माताओं को पेट भरने और स्वस्थ रहने लायक, अन्न, दूध और फल-फूल नहीं मिले इससे बड़े शर्म की बात हमारे लिए कुछ नहीं हो सकती। किन्तु हमारे भाग्यविधाताओं को शर्म आए तब न!