खौफ के मंजर उधर हैं देखिए
आँसुओं से नयन तर हैं देखिए
देखते थे बैठकर सपने जहाँ,
आज वो घर खंडहर हैं देखिए
हैं कहीं लाशें, लहू, क्रंदन करुण,
मातमी जद में सफर हैं देखिए
आदमीयत का है ये इम्तहां 'मुकेश',
कब से जख्मी मुंतजिर हैं देखिए
शुक्रवार, 15 अक्टूबर 2010
ओही खाती रुसल बाड़ें ना
सईयाँ अलगे बिछाके खाटी आज सुतल बाड़ें
ओही खाती रुसल बाड़ें ना
----------------------------------------------
(१)बोललो पर बोलत नईखन, सुनत नईखन कहल
इनके चलते घर में मुश्किल,भईल बाटे रहल
हमके डाहे ख़ातिर लेके धंधा उठल बाड़ें
ओही ..............................................
(२)हफ्ता दिन से सुतत बाड़े, दुअरा सईयाँ जाई के
आवतारे दुनो बेरा, होटल से खाना खाई के
बाकी घर के खाना खईला बीना टूटल बाड़ें
ओही ..........................................................
(३) मुकेश आधी रात आके, सिकड़ी बजईलें
जननी ना सुतला में, कब अईलें - गईलें
हमरो पिया दामोदर तहिये से टिहुकल बाड़ें
ओही ...................................................
ओही खाती रुसल बाड़ें ना
----------------------------------------------
(१)बोललो पर बोलत नईखन, सुनत नईखन कहल
इनके चलते घर में मुश्किल,भईल बाटे रहल
हमके डाहे ख़ातिर लेके धंधा उठल बाड़ें
ओही ..............................................
(२)हफ्ता दिन से सुतत बाड़े, दुअरा सईयाँ जाई के
आवतारे दुनो बेरा, होटल से खाना खाई के
बाकी घर के खाना खईला बीना टूटल बाड़ें
ओही ..........................................................
(३) मुकेश आधी रात आके, सिकड़ी बजईलें
जननी ना सुतला में, कब अईलें - गईलें
हमरो पिया दामोदर तहिये से टिहुकल बाड़ें
ओही ...................................................
शनिवार, 9 अक्टूबर 2010
अंजाना अंजानी : फिल्म समीक्षा
बैनर : नाडियाडवाला ग्रेंडसन एंटरटेनमेंट, इरोज़ एंटरटेनमेंट
निर्माता : साजिद नाडियाडवाला
निर्देशक : सिद्धार्थ आनंद
संगीत : विशाल शेखर
कलाकार : रणबीर कपूर, प्रियंका चोपड़ा, जायद खान
सेंसर सर्टिफिकेट : यू/ए * 2 घंटे 5 मिनट
कहानी को अगर ज्यादा लंबा खींचा जाए तो वो अपना असर खो बैठती है। ऐसा ही कुछ हुआ है ‘अंजाना अंजानी’ के साथ। इस फिल्म को ज्यादा से ज्यादा 90 मिनट में खत्म कर देना था, लेकिन 125 मिनट का वक्त लिया गया। जिससे न केवल फिल्म की गति धीमी हो गई है बल्कि कई लंबे दृश्यों की वजह से यह उबाऊ भी लगती है।
आकाश (रणबीर कपूर) और कियारा (प्रियंका चोपड़ा) एक ब्रिज पर मिलते हैं, जहाँ से दोनों आत्महत्या करने वाले हैं। आकाश को बिज़नेस में जबरदस्त नुकसान हुआ है और कियारा के प्रेमी कुणाल (जायद खान) ने उसे धोखा दिया है, इसलिए वे कायराना कदम उठा रहे हैं।
आत्महत्या की कोशिश असफल होती है। कुछ देर बाद उनकी फिर मुलाकात होती है और वे पाँच बार अपने आपको खत्म करना चाहते हैं, लेकिन हर बार बच जाते हैं। आखिरकार दोनों बीस दिन बाद 31 दिसंबर को आत्महत्या करने की प्लानिंग करते हैं।
इन बीस दिनों में वे वो सब कुछ करना चाहते हैं जो हमेशा से वे करना चाहते थे। एक लंबे सफर पर वे निकलते हैं और एक-दूसरे को वे चाहने लगते हैं। हालाँकि इस बात को वे स्वीकारते नहीं हैं।
31 दिसंबर के पहले आकाश को लगता है कि कियारा को अपने प्रेमी को माफ करना चाहिए और वह उसे अपने घर लौटने पर मजबूर करता है। किस तरह बिछड़ने के बाद उन्हें महसूस होता है कि वे आपस में प्यार करने लगे हैं, ये फिल्म का सार है।
फिल्म की कहानी अच्छी है और इसमें भरपूर इमोशन और एंटरटेनमेंट की गुंजाइश थी, लेकिन इस पर आधारित स्क्रीनप्ले बेहद कमजोर हैं। सीन कुछ इस तरह लिखे गए हैं कि वो बेजान लगते हैं।
शुरुआत के आधे घंटे तक फिल्म बेहद उबाऊ है जब आकाश और कियारा अलग-अलग तरीके से आत्महत्या की कोशिश करते दिखाए गए हैं। सब कुछ इस तरह फिल्माया गया है मानो वे मजाक कर रहे हों। इसके बाद जब आकाश और कियारा बीस दिनों तक जिंदगी का मजा लूटने का प्लान बनाते हैं, तब भी फिल्म में मौज-मस्ती नदारद नजर आती है।
कियारा और आकाश के किरदार भी ठीक से लिखे नहीं गए हैं। आकाश जब भी कियारा के नजदीक आने की कोशिश करता है तो वह उसे बताती है कुणाल को वह भूला नहीं पा रही है। जब वह उसे कुणाल के पास भेज देता है तो उसे आकाश की याद सताने लगती है।
साथ ही दोनों के आत्महत्या करने की कोशिश के पीछे जो कारण बताए गए हैं वो बेहद कमजोर हैं। इतनी छोटी-सी बातों के लिए क्यों कोई अपनी मूल्यवान जिंदगी गँवाना चाहेगा?
किसी भी प्रेम कहानी में इमोशन और कैमेस्ट्री का बहुत महत्व रहता है। ‘अंजाना अंजानी’ की कहानी में वो इमोशन नहीं हैं कि दर्शकों को कियारा और आकाशा से हमदर्दी हो।
रणबीर और प्रियंका की कैमेस्ट्री भी परदे पर दिखाई नहीं देती। जहाँ तक अभिनय का सवाल है तो दोनों ने बेहतरीन काम किया है। खासकर प्रियंका चोपड़ा को अपने किरदार में कई शेड्स दिखाने का मौका मिला और उन्होंने बखूबी अपने पात्र को जिया। रणबीर कपूर कुछ ज्यादा ही उदास नजर आएँ। छोटे से रोल में जायद खान भी ठीक हैं।
निर्देशक सिद्धार्थ आनंद को लगातार बड़े मौके मिले हैं। यशराज फिल्म्स के लिए उन्होंने तीन फिल्में बनाईं और अब साजिद नाडियाडवाला जैसा निर्माता, लेकिन उनके द्वारा बनाई गई फिल्मों से दर्शक जुड़ नहीं पाता है।
जहाँ तक फिल्म के सकारात्मक पक्ष का सवाल है तो कुछ दृश्य ऐसे हैं जो मनोरंजन करते हैं। गुदगुदाते हैं। फिल्म का संगीत पक्ष बहुत मजबूत है। विशाल-शेखर द्वारा संगीतबद्ध ‘अंजाना अंजानी’, ‘आस पास है खुदा’, ‘तुझे भूला दिया’ सुनने लायक हैं।
निर्माता साजिद नाडियाडवाला ने जमकर पैसा खर्च किया है। न्यूयॉर्क, लास वेगास और सेन फ्रांसिस्को में फिल्म को फिल्माया गया है और फिल्म में भव्यता नजर आती है। लेकिन पूरी फिल्म की बात की जाए तो ‘अंजाना अंजानी’ से अंजान बने रहना ही बेहतर है।
निर्माता : साजिद नाडियाडवाला
निर्देशक : सिद्धार्थ आनंद
संगीत : विशाल शेखर
कलाकार : रणबीर कपूर, प्रियंका चोपड़ा, जायद खान
सेंसर सर्टिफिकेट : यू/ए * 2 घंटे 5 मिनट
कहानी को अगर ज्यादा लंबा खींचा जाए तो वो अपना असर खो बैठती है। ऐसा ही कुछ हुआ है ‘अंजाना अंजानी’ के साथ। इस फिल्म को ज्यादा से ज्यादा 90 मिनट में खत्म कर देना था, लेकिन 125 मिनट का वक्त लिया गया। जिससे न केवल फिल्म की गति धीमी हो गई है बल्कि कई लंबे दृश्यों की वजह से यह उबाऊ भी लगती है।
आकाश (रणबीर कपूर) और कियारा (प्रियंका चोपड़ा) एक ब्रिज पर मिलते हैं, जहाँ से दोनों आत्महत्या करने वाले हैं। आकाश को बिज़नेस में जबरदस्त नुकसान हुआ है और कियारा के प्रेमी कुणाल (जायद खान) ने उसे धोखा दिया है, इसलिए वे कायराना कदम उठा रहे हैं।
आत्महत्या की कोशिश असफल होती है। कुछ देर बाद उनकी फिर मुलाकात होती है और वे पाँच बार अपने आपको खत्म करना चाहते हैं, लेकिन हर बार बच जाते हैं। आखिरकार दोनों बीस दिन बाद 31 दिसंबर को आत्महत्या करने की प्लानिंग करते हैं।
इन बीस दिनों में वे वो सब कुछ करना चाहते हैं जो हमेशा से वे करना चाहते थे। एक लंबे सफर पर वे निकलते हैं और एक-दूसरे को वे चाहने लगते हैं। हालाँकि इस बात को वे स्वीकारते नहीं हैं।
31 दिसंबर के पहले आकाश को लगता है कि कियारा को अपने प्रेमी को माफ करना चाहिए और वह उसे अपने घर लौटने पर मजबूर करता है। किस तरह बिछड़ने के बाद उन्हें महसूस होता है कि वे आपस में प्यार करने लगे हैं, ये फिल्म का सार है।
फिल्म की कहानी अच्छी है और इसमें भरपूर इमोशन और एंटरटेनमेंट की गुंजाइश थी, लेकिन इस पर आधारित स्क्रीनप्ले बेहद कमजोर हैं। सीन कुछ इस तरह लिखे गए हैं कि वो बेजान लगते हैं।
शुरुआत के आधे घंटे तक फिल्म बेहद उबाऊ है जब आकाश और कियारा अलग-अलग तरीके से आत्महत्या की कोशिश करते दिखाए गए हैं। सब कुछ इस तरह फिल्माया गया है मानो वे मजाक कर रहे हों। इसके बाद जब आकाश और कियारा बीस दिनों तक जिंदगी का मजा लूटने का प्लान बनाते हैं, तब भी फिल्म में मौज-मस्ती नदारद नजर आती है।
कियारा और आकाश के किरदार भी ठीक से लिखे नहीं गए हैं। आकाश जब भी कियारा के नजदीक आने की कोशिश करता है तो वह उसे बताती है कुणाल को वह भूला नहीं पा रही है। जब वह उसे कुणाल के पास भेज देता है तो उसे आकाश की याद सताने लगती है।
साथ ही दोनों के आत्महत्या करने की कोशिश के पीछे जो कारण बताए गए हैं वो बेहद कमजोर हैं। इतनी छोटी-सी बातों के लिए क्यों कोई अपनी मूल्यवान जिंदगी गँवाना चाहेगा?
किसी भी प्रेम कहानी में इमोशन और कैमेस्ट्री का बहुत महत्व रहता है। ‘अंजाना अंजानी’ की कहानी में वो इमोशन नहीं हैं कि दर्शकों को कियारा और आकाशा से हमदर्दी हो।
रणबीर और प्रियंका की कैमेस्ट्री भी परदे पर दिखाई नहीं देती। जहाँ तक अभिनय का सवाल है तो दोनों ने बेहतरीन काम किया है। खासकर प्रियंका चोपड़ा को अपने किरदार में कई शेड्स दिखाने का मौका मिला और उन्होंने बखूबी अपने पात्र को जिया। रणबीर कपूर कुछ ज्यादा ही उदास नजर आएँ। छोटे से रोल में जायद खान भी ठीक हैं।
निर्देशक सिद्धार्थ आनंद को लगातार बड़े मौके मिले हैं। यशराज फिल्म्स के लिए उन्होंने तीन फिल्में बनाईं और अब साजिद नाडियाडवाला जैसा निर्माता, लेकिन उनके द्वारा बनाई गई फिल्मों से दर्शक जुड़ नहीं पाता है।
जहाँ तक फिल्म के सकारात्मक पक्ष का सवाल है तो कुछ दृश्य ऐसे हैं जो मनोरंजन करते हैं। गुदगुदाते हैं। फिल्म का संगीत पक्ष बहुत मजबूत है। विशाल-शेखर द्वारा संगीतबद्ध ‘अंजाना अंजानी’, ‘आस पास है खुदा’, ‘तुझे भूला दिया’ सुनने लायक हैं।
निर्माता साजिद नाडियाडवाला ने जमकर पैसा खर्च किया है। न्यूयॉर्क, लास वेगास और सेन फ्रांसिस्को में फिल्म को फिल्माया गया है और फिल्म में भव्यता नजर आती है। लेकिन पूरी फिल्म की बात की जाए तो ‘अंजाना अंजानी’ से अंजान बने रहना ही बेहतर है।
क्रुक : बैड एंड बोरिंग
बैनर : विशेष फिल्म्स 
निर्माता : मुकेश भट्ट
निर्देशक : मोहित सूरी
संगीत : प्रीतम चक्रवर्ती
कलाकार : इमरान हाशमी, नेहा शर्मा, अर्जन बाजवा, गुलशन ग्रोवर, शेला एलेन
मोहित सूरी द्वारा निर्देशित फिल्म ‘क्रुक’ इतनी बुरी फिल्म है कि सिनेमाघर में बैठना मुश्किल हो जाता है।
लव स्टोरी की बैकड्रॉप में सामयिक घटनाएँ डालकर फिल्म बनाना इन दिनों फिल्मकारों को बेहद पसंद आ रहा है। ऑस्ट्रेलिया में भारतीयों पर कुछ महीनों पहले हमले हुए थे और अभी भी यह मामला पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। इसी को आधार बनाकर ‘क्रुक’ की कहानी का तानाबाना बुना गया है।
प्रेम कहानी, नस्लीय हमले, सेक्सी सीन, फिल्म के हीरो का अच्छाई और बुराई को लेकर असमंजस जैसे कई ट्रेक्स पर फिल्म चलती है और इन सबको समेटना स्क्रीनप्ले राइटर अंकुर तिवारी और निर्देशक मोहित सूरी के लिए मुश्किल हो गया।
फिल्म पर से पूरी तरह उनका नियंत्रण छूट गया और स्क्रीन पर घट रहे घटनाक्रमों में कोई तालमेल नजर नहीं आता।
असल में फिल्म से जुड़े लोग यह निर्धारित नहीं कर पाए कि वे प्रेम कहानी पर फोकस करें या ऑस्ट्रेलिया में हो रह हमलों पर। आधे-अधूरे मन से इस पर काम किया गया है। इससे लव स्टोरी में इतनी तीव्रता नजर नहीं आती कि दर्शक उनके प्रेम से प्रभावित हो और न ही नस्लीय हमलों के इश्यू को ठीक से उठाया गया है।
मोहित सूरी ने यह मान लिया कि इमरान हाशमी फिल्म हैं इसलिए दर्शक हॉट या बोल्ड सीन की आशा लिए आएँगे। इसलिए उन्होंने इस तरह के दृश्यों को बिना कहानी में जगह बनाए ठूँस दिया है।
फिल्म के किरदारों को भी ठीक से नहीं लिखा गया है। इमरान हाशमी अभिनीत किरदार जय/सूरज के पिता वाला प्रसंग अधूरा सा लगता है। वह प्यार करता है सुहानी को, लेकिन सोता है निकोल के साथ। उसकी अच्छाई और बुराई के बीच की उलझन को भी ठीक से स्पष्ट नहीं किया गया है। सुहानी के भाई समर्थ के किरदार को समझना भी टेढ़ी खीर है।
नस्लीय मामले में लेखक ने भारतीयों को दोषी ठहरा दिया है और वो भी बिना किसी ठोस कारण के, इससे फिल्म देखने का मजा और खराब हो जाता है। इमरान हाशमी के दोस्तों के जरिये हँसाने की कोशिश की गई है जो बेहद बनावटी लगती है और चिढ़ पैदा करती है।
‘जहर’ और ‘वो लम्हें’ जैसी फिल्में बना चुके और बड़ी-बड़ी बातें करने वाले निर्देशक मोहित सूरी का निर्देशन भी घटिया है। एक खराब लिखे स्क्रीनप्ले को उन्होंने बेहद खराब तरीके से पेश किया है। दृश्यों में तालमेल का अभाव है।
इमरान हाशमी और नेहा शर्मा का अभिनय अच्छे से बुरे के बीच झूलता रहता है। अर्जन बाजवा और शेला एलेन असर छोड़ते हैं। प्रीतम ने कुछ अच्छी धुनें बनाई है। कुल मिलाकर ‘क्रूक : इट्स गुड टू बी बैड’ बुरी और बोरिंग फिल्म है।

निर्माता : मुकेश भट्ट
निर्देशक : मोहित सूरी
संगीत : प्रीतम चक्रवर्ती
कलाकार : इमरान हाशमी, नेहा शर्मा, अर्जन बाजवा, गुलशन ग्रोवर, शेला एलेन
मोहित सूरी द्वारा निर्देशित फिल्म ‘क्रुक’ इतनी बुरी फिल्म है कि सिनेमाघर में बैठना मुश्किल हो जाता है।
लव स्टोरी की बैकड्रॉप में सामयिक घटनाएँ डालकर फिल्म बनाना इन दिनों फिल्मकारों को बेहद पसंद आ रहा है। ऑस्ट्रेलिया में भारतीयों पर कुछ महीनों पहले हमले हुए थे और अभी भी यह मामला पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। इसी को आधार बनाकर ‘क्रुक’ की कहानी का तानाबाना बुना गया है।
प्रेम कहानी, नस्लीय हमले, सेक्सी सीन, फिल्म के हीरो का अच्छाई और बुराई को लेकर असमंजस जैसे कई ट्रेक्स पर फिल्म चलती है और इन सबको समेटना स्क्रीनप्ले राइटर अंकुर तिवारी और निर्देशक मोहित सूरी के लिए मुश्किल हो गया।
फिल्म पर से पूरी तरह उनका नियंत्रण छूट गया और स्क्रीन पर घट रहे घटनाक्रमों में कोई तालमेल नजर नहीं आता।
असल में फिल्म से जुड़े लोग यह निर्धारित नहीं कर पाए कि वे प्रेम कहानी पर फोकस करें या ऑस्ट्रेलिया में हो रह हमलों पर। आधे-अधूरे मन से इस पर काम किया गया है। इससे लव स्टोरी में इतनी तीव्रता नजर नहीं आती कि दर्शक उनके प्रेम से प्रभावित हो और न ही नस्लीय हमलों के इश्यू को ठीक से उठाया गया है।
मोहित सूरी ने यह मान लिया कि इमरान हाशमी फिल्म हैं इसलिए दर्शक हॉट या बोल्ड सीन की आशा लिए आएँगे। इसलिए उन्होंने इस तरह के दृश्यों को बिना कहानी में जगह बनाए ठूँस दिया है।
फिल्म के किरदारों को भी ठीक से नहीं लिखा गया है। इमरान हाशमी अभिनीत किरदार जय/सूरज के पिता वाला प्रसंग अधूरा सा लगता है। वह प्यार करता है सुहानी को, लेकिन सोता है निकोल के साथ। उसकी अच्छाई और बुराई के बीच की उलझन को भी ठीक से स्पष्ट नहीं किया गया है। सुहानी के भाई समर्थ के किरदार को समझना भी टेढ़ी खीर है।
नस्लीय मामले में लेखक ने भारतीयों को दोषी ठहरा दिया है और वो भी बिना किसी ठोस कारण के, इससे फिल्म देखने का मजा और खराब हो जाता है। इमरान हाशमी के दोस्तों के जरिये हँसाने की कोशिश की गई है जो बेहद बनावटी लगती है और चिढ़ पैदा करती है।
‘जहर’ और ‘वो लम्हें’ जैसी फिल्में बना चुके और बड़ी-बड़ी बातें करने वाले निर्देशक मोहित सूरी का निर्देशन भी घटिया है। एक खराब लिखे स्क्रीनप्ले को उन्होंने बेहद खराब तरीके से पेश किया है। दृश्यों में तालमेल का अभाव है।
इमरान हाशमी और नेहा शर्मा का अभिनय अच्छे से बुरे के बीच झूलता रहता है। अर्जन बाजवा और शेला एलेन असर छोड़ते हैं। प्रीतम ने कुछ अच्छी धुनें बनाई है। कुल मिलाकर ‘क्रूक : इट्स गुड टू बी बैड’ बुरी और बोरिंग फिल्म है।
सोमवार, 4 अक्टूबर 2010
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