सोमवार, 30 अगस्त 2010

वक्त का ज्वालामुखी और बरफ जैसी औरतें

सेक्स वर्कर दूसरी औरतों से अलग होती हैं। इसके चार कारण हैं.. ’हम अपनी मर्जी की मालिक होती हैं। हमें खाना बनाकर पति का इंतजार नहीं करना पड़ता। हमें उसके मैले कपड़े नहीं धोने पड़ते। हमें अपने बच्चों को अपने हिसाब से पालने के लिए आदमी की इजाजत नहीं लेनी पड़ती। हमें बच्चे पालने के लिए आदमी की जायदाद पर दावा नहीं करना पड़ता।‘ नलिनी जमीला (एक सेक्स वर्कर की आत्मकथा से )



देह बेचकर पेट पालने वाली औरतें हमेशा हाशिये में ही नहीं रही है, उनको जी भर कर अपमानित भी किया जाता है। उनकी समस्याओं को कभी समस्या नहीं माना जाता है उनके दर्द को महसूसने में समाज की भागीदारी भी नहीं होती। ऐसा बहुत कम हुआ है, जब जिस्म बेचने को मजबूर औरतों ने अपनी दास्तां खुद सुनाई हो। गीताश्री को जो उन्होंने बताया, उसे जानकर उस दुनिया को भी जानिए, जिसको दुत्कारने में कोई कोताही नहीं करते तथाकथित संघान्त-



औरतें साथ रहने वाला एक आदमी पति बन जाता था और दूसरा भाई। ये वे रिश्ते थे, जो बाजार बनाता था और बाजार ही देता था रिश्तों को नाम। रिश्तों को नाम देने के बावजूद ऐसे रिश्तों को समझना मुश्किल है क्योंकि अबूझ रिश्तों की ये ऐसी कहानी है, जो किसी औरत के जिस्म से शुरू होकर औरत के अरमानों पर आकर खत्म हो जाती है। लेकिन किसी के अरमान मिटे या सपने लुटे, इसकी परवाह बाजार कब करता है? हमने अरमानों की ऐसी अनगिनत चिताएं देखीं, जिसे किसी की बेचारगी और लाचारी हवा दे रही थी। सेक्स वर्करों की दुनिया के अनचीन्हे दर्द से साझा करते हुए देखा कि जो आदमी खुद को पति बता रहा है, वह पति नहीं दलाल है और जो खुद को भाई बता रहा है, वह ग्राहक ढूंढलाने वाला बिचौलिया। दोनों जिस्म के सौदे के बाद मिले पैसों से करते थे ऐश। लेकिन यह सब बंद दुनिया का चेहरा था, जिससे खुली दुनिया के लोग कोई मतलब नहीं रखना चाहते। तभी तो हमने पाया कि सेक्सवर्कर समाज से वैसे ही नफरत करती है, जैसे समाज सेक्स वर्कर से। कोई पति बनकर दलाली करेगा और कोई भाई बनकर ग्राहक लाएगा, शायद सामाजिक ताने-बाने पर रिसर्च करनेवाले रिश्तों की इस नई परिभाषा को कुबूल न करपाए, लेकिन सच था। केरल के कोसिकोड में इन्हें ’रोपर्स‘ के नाम से जाना जाता है। रोपर्स, रोप(रस्सी) शब्द से बना है यानी दो किनारों को जोड़ने वाला, रस्सी की तरह जोड़ने वाला रोपड़, यह खुलासा केरल की मशहूर सेक्स वर्कर नलिनी जमाली ने भी अपनी आत्मकथा में किया है। उनकी आत्मकथा खूब बिकी है और हिंदी में भी अनुवाद होकर आई है। इसे पढ़ने के बाद केरल की सेक्सवर्कर के बारे में और करीब से जानने-समझने का मन हुआ। उस ऑफिस में दो महिलाएं हाजिर थीं। रमणी और सरोजनी। कोट्टायम के उनके दफ्तर में बैठी, थोड़ी सकुचाई, झिझकती हुई दो सांवली-काली रंगत वाली यौन कर्मिंयों और मेरे बीच भाषा का संकट था। वे ना तो अंग्रेजी बोल सकती थीं, ना हिंदी समझती थी। ना मैं उनकी भाषा। मगर वे इस बातके लिए तैयार होकर आई थी कि इंटरव्यू देना है। साजू इंटरप्रेटर बन गया। स्त्री का दर्द पहली बार पुरु ष के मुख से अनुवाद होकर स्त्री तक आ रहा था। पता नहीं पुरु ष ने उसमें क्या जोड़ा, क्या घटाया..मगर उन दोनों की दैहिक भाषा ने मुझे समझा दिया, सब कुछ। रमणी थोड़ी कम उम््रा की थी। वह खुल रही थी, साहसपूर्वक, वैसे ही जैसे उसने यौनकर्म की दहलीज पर पैर रखा था। बोलते हुए वह उसके भीतर की खड़खड़ साजू ने नहीं, मैंने सुनी। कुछ था, जो खुलता और बंद होता था। खौफ के साथ अपने बाहर फैलने की ललक को वह रोक नहीं पा रही थी। रमणी को दिल्ली देखना है। उसने देखा नहीं, सुना भर है। बातचीत के दौरान वह लगभग गिड़गिड़ाती है-’ क्या आप मेरे लिए टिकट भेजोगे। अपने पास रखोगे। लालिकला, कुतुबमीनार देखना है। सुना है..बहुत सुंदर और बड़ा शहर है..।‘ मैं भी वादा कर देती हूं पर अभी तक पूरा नहीं कर पाई हूं। शायद कभी कर पाऊं..उनसे संपर्क का जरिया भी तो नहीं कोई। हम कौन सी भाषा में बात करेंगे, फोन पर वे बोल रही थीं और मुझे मुझे निदा फाजली की पंक्तियां याद आ रही थीं- ’ इनके अन्दर पक रहा है वक़्त का ज्वालामुखी किन पहाड़ों को ढंके हैं बरफ जैसी औरतें . रमणी, बोलती कम है, हंसती ज्यादा है। हंसी हंसी में कहती है, ‘मैं पहले एक दिन में पांच छह ग्राहक निपटा देती थी। अब थकान होने लगी है। अब संख्या कोई मायने नहीं रखती..दो तीन निपटा ले, यही बहुत है। वह थोड़ी गंभीर होती है- --ग्राहकों की संख्या मायने नहीं रखती, उनकी संतुष्टि मायने रखती है। धंधे में उतरने का कोई अफसोस रमणी ईमानदारी से स्वीकारती है, अफसोस तो है, मगर जिंदगी चुनौती की तरह है, उसका सामना कर रहे हैं। अब भाग नहीं सकते। देर हो चुकी। इसके आगे का रास्ता बंद है। क्या करेंरमणी का यह वक्तव्य किसी अनुपिस्थत को संबोधित था। साजू मुझे बता रहे थे और वह शून्य में देख रही थी। बात-चीत से पता चला कि रमणी कोट्टायम के संघांत मुहल्ले में रहती है। वहां धंधा करने मे ंसमस्या ही समस्या। उसने रास्ता निकाल लिया। जंगल ही उसका रेडलाइट एरिया बन गया है। वह ग्राहकों को पास के जंगल में ले जाती है। घास के बिछौने होते हैं। मोबाइल हैं, ग्राहक फोन करते हैं फिर जंगल में जगह तय होती है। कुछ ग्राहक जंगल नहीं जाना चाहते, तब सरोजनी की बन आती है। वह अपने ग्राहक उसकी तरफ भेज देती है। सरोजनी का घर भी तंग गलियो में हैं मगर वह घर से धंधा करती है। थोड़ी उम््रा ज्यादा है इसिलए लोग शक कम करते हैं। साथ में पतिनुमा जीव रहता है। पति का जिक्र आया तो नलिनी याद आ गई। नलिनी ने ऐसे पतियों के बारे में साफ लिखा है कि मकान वगैरह किराए पर लेना हो तो ये लोग बड़े काम आते हैं। लेकिन कुल मिलाकर यह किसी सिरदर्द से कम नहीं हैं। सरोजनी का पति भी एसा ही है। सरोजनी ही उसका खर्च चलाती है। बदले में वह उसे सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने का नाटक करता है। घर पर अक्सर ग्रहकों का आना जाना देख कर कई बार पड़ोसी पूछ लेते हैं, सरोजनी का जवाब होता है-’ये लोग प्रोपर्टी डीलर हैं, मेरा प्लाट खरीदना चाहते हैं। देखने आते रहते हैं। सरोजनी बताती है-’कई बार उसके पास युवा लड़कों का ग्रुप आता है। वह पांच मिनट में उन्हें मुक्ति देकर भेज देती है। भीतर से उसे ग्लानी होती है कभी कभी, उनकी और अपनी उम््रा देखकर। लेकिन ग्राहक तो ग्राहक है, चाहे किसी भी वक्त या किसी भी उम््रा का हो.। ’’ लेकिन पैसे की जरूरत ऐसी सोच पर लगाम लगा देती है। रमणी भी कहती है, ‘‘पैसा बड़ी चीज है। उन्हें कैसे लौटा दें। मैंने कहा, छोड़ क्यो नहीं देती ये धंधा..दोनों एक साथ बोल पड़ी, इतना पैसा किस काम में मिलेगा। अब हमें कौन काम देगा। हम किसी काम के लायक बचे ही नहीं..अब तो आदत सी पड़ गई है..। अब छोड़ भी दे तो लोग हमें चैन से नहीं जीने देंगे। रमणी अब बातचीत में सहज हो चुकी है और उसे यह स्वीकारने में झझिक नहीं होती कि इस पेशे में भी वह कभी-कभार आनंद ढूंढ लेती है। वह स्वीकार करती है कि एक स्थाई ग्राहक से वह भी आनंद लेती है। यहां पैसा गौण है। उससे मोल-भाव नहीं करती। रमणी के पास किस्से बहुत है..। एक बार पैसे वाला अधेड़ ग्राहक आया, कहा-’’मैं अपनी पत्‍नी से बहुत प्यार करता हूं, मगर मैं जिस चीज की तलाश में हूं, वहां नहीं है। चलो, सेक्स में फन करते हैं..।’’ लेकिन रमणी अच्छी तरह जानती है कि दूसरों को भले ही उसके जिस्म में फन की तलाश हो, लेकिन वह खुद अपने पति के मर जाने और कंगाल हो जाने के बाद यातना के जिस रास्ते पर चल रही है, वह रास्ता कहां खत्म होगा। न घर बचा न कोई जमीन का टुकड़ा, जिसे वह अपना कह सके। रिश्तेदारों ने शरण देने से मना कर दिया। कम पढी लिखी थी, सो नौकरी ना मिली। एक शाम उसने खुद को पीकअप प्वाइंट पर पाया। जिस्म की कमाई से पहले बेटियों को पाला, अब खुद को पाल रही है। इसी नरक में अपने लिए सुख का एकाध कतरा भी तलाश लेती है। यह सब बताते हुए उसकी आंखों में कहीं भी संकोच या शरम नहीं.है तो बस थोड़ी शिकायत, थोड़ा धिक्कार। दोनों से बातचीत करते हुए ही हमने जाना कि केरल में कहीं भी कोई रेडलाइट एरिया नहीं है। इसीलिए वहां सेक्सवर्कर पूरे समाज में घुली मिली हैं। उन्हें अलग से चिन्हित नहीं किया जा सकता। इसकी दिक्कते भी हैं। बताते हैं कि केरल में 10,000 स्ट्रीट बेस्ड सेक्सवर्कर हैं। इनमें हिजड़े भी शामिल हैं। इसके बावजूद सोनागाछी की एकता उनके लिए रोल माडल की तरह है। वहां एक अनौपचारिक रूप से संगठन बना है, सेक्सवर्कर फोरम केरला (एसडब्लूएफके) जो इनके हितों का ध्यान रखने लगा है। गाहे-बगाहे आंदोलनों में शिरकत भी करने लगा है। मगर यह सोनागाछी के दुर्वार महिला समन्य समिति की तरह ताकतवर नहीं है। रमणी,सरोजनी उसकी सदस्य बन चुकी हैं। सरोजनी की दो बेटियां हैं, चेन्नई में रहती हैं। वे हिंदी नहीं जानती, किताब नहीं पढ सकती, तो क्या हुआ, फोटो तो पहचान सकती है। रमणी और सरोजनी ने फोटो भी खिचवाए। बेटियां हालांकि अब जान गई हैं कि मां क्या काम करती हैं। पहले तो बहुत विरोध हुआ अब नियित को कुबुल कर चुकी है । साथ कुछ वक्त बिताने के बाद जब वे जाने की अनुमित मांग रहीं थीं तो वहां मौजूद आंखें उन्हें सांय से घूर रही थीं। वे चली गईं, लेकिन दोनों मेरे सामने ऐसे खुली जैसे अंधड़ में जंग लगे दरवाजे-खिड़िकयों की सांकलें भरभरा कर खुल जाती हैं। उन्होंने अपने दर्द को कही से भी अतिरंजित नही किया..बल्कि भोगे हुए को ज्यों का त्यों रख दिया। शायद उन्हें लग रहा था कि इस जलालत से भरी दुनिया में कोई है, जो उसकी व्यथा सहानूभूतिपूर्वक सुन रहा है। भाषाई संकट के कारण पूछ नहीं पा रही थी, शायद साजू की उपिस्थित भी संकोच पैदा कर रही थी। फिर भी साजू के बावजूद उन्हें जो कुछ कहना था साफ-साफ कह गई। सुना गई अपनी कहानी। उस कहानी में गुड गर्ल बनने का सिंड्रोम नहीं था। ये रास्ता उन्होंने खुद चुना था। शिकायतें कम थीं और लहजे में मुक्ति की चाह भी खत्म थी। उनके जाने के बाद भी रमणी की खिलखिलाहट मेरे सामने गूंज रही थी और दर्द की दरिया में भींगने के बाद पनपे अवसाद को कम कर रही थी। सरोजनी ने भी अपनी चालबाजियों को चटखारे लेकर सुनाया था, और उसे सुनाने में मजा भी आ रहा था, लेकिन क्या वे सचमुच चालबाज है।