मंगलवार, 31 अगस्त 2010

मैथ का रोमांस

अट्ठारह साल के एक नौजवान ने अपने पिता को लिखे पत्र में बड़े उत्साह से अपने रिसर्च टॉपिक के बारे में बताया। जवाब में भेजी गई चिट्ठी में पिता ने लिखा- मेरे बेटे, समानांतर रेखाओं के फेरे में तो तुम हरगिज न पड़ना। यह रास्ता मेरे लिए अच्छी तरह जाना-बूझा है। न जाने कितनी अंतहीन रातें जाग कर मैंने इसकी थाह लेने की कोशिश की है लेकिन मेरे जीवन की सारी रोशनी, मेरी सारी खुशी इस प्रयास में स्वाहा हो गई। इसे उतनी ही हिकारत से त्याग दो, जैसे कोई सच्चरित्र व्यक्ति अवैध यौन संबंध के प्रस्ताव से नजरें फेर लेता है। यह तुम्हें जीवन के हर आनंद से वंचित कर देगा। तुम्हारा स्वास्थ्य चौपट हो जाएगा, आराम छिन जाएगा और तुम्हारे जीवन से प्रसन्नता सदा के लिए लुप्त हो जाएगी।'



हंगरी के दो महान गणितज्ञों जानोस बोल्याई और फर्कास बोल्याई के बीच 1820 में हुआ यह पत्र-व्यवहार गणित के इतिहास में सदियों संजो कर रखने लायक चीज बन गया है। यहां वे ज्योमेट्री (रेखागणित) की आधारशिला रखने वाले यूनानी गणितज्ञ यूक्लिड की पांचवीं प्रस्थापना के बारे में बात कर रहे हैं, जो इस प्रकार है- किसी रेखा के बाहर स्थित एक बिंदु से होकर उस रेखा के समानांतर एक और केवल एक ही रेखा खींची जा सकती है। ईसा के तीन सौ साल पहले दी गई यूक्लिड की प्रस्थापनाओं को पूरी दुनिया में अंतिम सत्य माना जाता था, लेकिन यूरोप के आधुनिक गणितज्ञों में पांचवीं प्रस्थापना को लेकर कुछ शंका मौजूद थी। यह यूक्लिड की बाकी प्रस्थापनाओं, मसलन, दो चीजें अगर तीसरी चीज के बराबर हों तो वे आपस में भी बराबर होती हैं, की तरह कॉमन सेंस वाला मामला तो था नहीं। ऐसे में वे इसे प्रस्थापना के बजाय प्रमेय मानकर सोलहवीं सदी से ही इसे सही या गलत साबित करने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन कहीं पहुंच नहीं पा रहे थे।



जानोस और फर्कास की कहानी को आगे बढ़ाने पर इसका एक कोण विश्व इतिहास के पांच महानतम गणितज्ञों में एक कहे जाने वाले जर्मन मैथमेटिशियन कार्ल फ्रेडरिक गॉस से जुड़ता है। फर्कास अपने बेटे को दस साल की उम्र में गॉस के यहां ले गए थे और उसे अपने शिष्य के रूप में स्वीकार करने का निवेदन किया था। गॉस इसके लिए तैयार नहीं हुए और जानोस को पढ़ाई के लिए विएना भेज दिया गया। वहां घूम-फिर कर उनकी रुचि यूक्लिड की पांचवीं प्रस्थापना में ही अटक गई, जो उनके पिता की पूरी जवानी खा गई थी। लेकिन फर्कास से विपरीत जानोस की कोशिश कामयाब रही। यूक्लिड को सही या गलत साबित करने के प्रयास में वे नॉन-यूक्लिडियन ज्योमेट्री की नींव रखने की ओर चले गए। 1822 में उन्होंने फर्कास को लिखा- 'मैंने शून्य से एक अद्भुत, नया ब्रह्मांड रच डाला है।'



फर्कास बोल्याई को अपने बेटे का काम अपनी तपस्या पूरी होने जैसा लगा। अगले दस वर्षों में उन्होंने अपना ग्रंथ 'टेंटामेन' पूरा किया और उसके परिशिष्ट में जानोस बोल्याई की खोज को महत्वपूर्ण जगह दी। 1932 में प्रकाशित अपनी इस किताब को उन्होंने मूल्यांकन के लिए गॉस के पास भेजा और उनसे खास तौर पर अपने बेटे के काम के बारे में राय मांगी। जवाब में गॉस ने लिखा - 'इसकी प्रशंसा करना मेरे लिए खुद की प्रशंसा करने जैसा होगा। क्योंकि इस काम की लगभग पूरी अंतर्वस्तु .... मेरे खुद के सोच-विचार के संपूर्णत: समतुल्य है।' जानोस के लिए गॉस का यह जवाब दिल तोड़ देने वाला साबित हुआ। उनकी नौकरी छूट गई। वे धीरे-धीरे घुलने लगे और कुल 57 साल की उम्र में 10 हजार पृष्ठों की गणितीय पांडुलिपियां अपने पीछे छोड़कर दुनिया से विदा हो गए।



अपने जवाब में गॉस किसी खलनायक जैसे नजर आते हैं, लेकिन यहां उनका दोष सिर्फ थोड़े अतिकथन का है। नॉन - यूक्लिडियन ज्योमेट्री में उनका काम जानोस बोल्याई से मिलता-जुलता है, लेकिन दोनों में संपूर्णतः समतुल्य जैसा कुछ नहीं है। गॉस का सबसे कमजोर पक्ष यह था कि ज्योमेट्री के पुराण-पुरुष यूक्लिड की बात काटने की हिम्मत वे नहीं कर पाए और इसी हिचक में अपने काम को सार्वजनिक करने से रह गए। जानोस और गॉस के आसपास ही लोबाचेव्स्की ने और फिर राइमान ने नॉन-यूक्लिडियन ज्योमेट्री को मुकम्मल शक्ल दी और आज की गणित या भौतिकी की कल्पना इसके बगैर नहीं की जा सकती।



एक विज्ञान के रूप में गणित की छवि किसी तपस्वी की साधना जैसी ही है। इसकी क्रांतिकारी खोजें भी प्राय: अचर्चित रह जाती हैं। या चर्चित होने में उन्हें इतना वक्त लगता है कि खोजी के लिए अपनी खोज ही बेमानी हो जाती है। इसके दो उज्ज्वल अपवाद यूनान के आर्किमिडीज और ब्रिटेन के आइजक न्यूटन हैं, जो जितने बड़े गणितज्ञ थे, उतने ही बड़े मिलिट्री साइंटिस्ट भी थे। उनका असर जितना आने वाले समय पर पड़ा, उतना ही अपने समय पर भी दर्ज किया गया। बतौर गणितज्ञ उनकी हैसियत को उनके शाही रुतबे के चलते कम करके नहीं आंका गया। लेकिन पिछली सदी में इस खेल के नियम बदल गए।



जी. एच. हार्डी ने ( भारतीय गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन को दुनिया के सामने लाने के लिए हम जिनके प्रति कृतज्ञ हैं ) अपने निबंध 'अ मैथमेटिशियंस अपॉलजी' में प्योर मैथमेटिक्स और एप्लाइड मैथमेटिक्स को बिल्कुल अलग-अलग चीजों की तरह देखा है। वे अपना जीवन एक ऐसे गणित के प्रति समर्पित बताते हैं, जिसका कोई व्यावहारिक महत्व नहीं है। इसका उन्हें कोई दुख नहीं है। बस एक संतोष है कि अपनी जिंदगी उन्होंने एक सौंदर्य की खोज में लगाई है, किसी के लिए मुनाफा कमाने या युद्ध जीतने की कवायद में नहीं। यह बात और है कि अंकगणित से जुड़ा हार्डी और रामानुजन का बहुत सारा काम द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान (यानी अपॉलजी लिखे जाते समय भी) कूट संकेतों के विज्ञान क्रिप्टॉलजी में इस्तेमाल हो रहा था और इसके बारे में उन्हें पता तक नहीं था।



इंसान का लालच और उसकी खुदगर्जी संसार की हर चीज का इस्तेमाल कर सकती है। प्योर मैथमेटिक्स के पुजारी किसी भी गिरि-कंदरा में छिप जाएं, धंधेबाज लोग वहां से भी उनके काम को खोज लाएंगे और अपने धंधे में लगा लेंगे। लेकिन हार्डी के निबंध का मूल तत्व प्योर मैथमेटिक्स को महिमामंडित करने का नहीं, गणित के उस दूसरे पहलू को सामने लाने का है, जो अपने सौंदर्य में पेंटिंग, संगीत या कविता जैसा और सत्य के प्रति अपने आग्रह में दर्शन जैसा है। अभी के समय में रूसी गणितज्ञ ग्रिगोरी पेरेलमान हार्डी के इन मानकों पर सबसे ज्यादा खरे उतरते हैं, हालांकि अपनी ही दुनिया में मगन रहने वाले इस साधक के बारे में उसके करीबी लोगों का कहना है कि गणित से उनका रिश्ता अब बीते दिनों की बात हो चुका है। एक खटास भरे प्रकरण के बाद उन्होंने खुद को अपने दूसरे शौकों, जैसे पियानो बजाने और टेबल टेनिस खेलने तक सिमटा लिया है।



गणित के सामने मौजूद सहस्राब्दी की सात सबसे बड़ी चुनौतियों में एक प्वांकारे कंजेक्चर (जिसका कुछ सिर-पैर जानने के लिए आपको सतहों के उतार-चढ़ाव से जुड़े टोपॉलजी के कठिन शास्त्र में घुसना पड़ेगा) को उन्होंने हल किया लेकिन इसके लिए मिले फील्ड्स मेडल और दस लाख डॉलर के मिलेनियम अवार्ड को यह कह कर ठुकरा दिया कि गणित के क्षेत्र में आई अनैतिकता या अनैतिक तत्वों को बर्दाश्त करने की प्रवृत्ति उन्हें इनको अपनाने से रोक रही है। दरअसल, गणित का नोबेल कहे जाने वाले फील्ड्स मेडल से विभूषित चीन के दो गणितज्ञों ने पेरेलमान की खोज का श्रेय अपने देश के ही दो चेलों को देने का प्रयास किया, हालांकि इस पूरे एपीसोड का अंत चीनी गणितज्ञों के माफीनामे और उनके द्वारा अपनी रिसर्च वापस लेने के रूप में हुआ। गणित की दुनिया के लिए ऐसे कथित राष्ट्रवादी प्रयास बिल्कुल बेमानी माने जाते रहे हैं, लेकिन दुनिया को अपने ठेंगे पर रखने वाला गणितज्ञ समुदाय भी आजकल चीन की आर्थिक ताकत के सामने खड़े होने की हिम्मत नहीं जुटा पाता।

मार दे सटा के लोहा गरम बा

   अब मैंने भी मान लिया है कि मैं जिस देश में रहता हूं, वह वीर जवानों का देश है। कोई भी मान लेगा। अरे, किसकी हिम्मत है जो नहीं मानेगा? वीर जवान पटककर मनवा देंगे। दो बजे रात में बैंड वाला बजाता है-’ये देश है वीर जवानों का ..।’ देश की जवानी लाउडस्पीकर पर चिग्घाड़ती है। वीर जवान नाच रहे हैं। दो बजे रात में नाचना-गाना, हंसी-खेल तो है नहीं? वीरता का यह काम वीर जवान ही कर सकते हैं। कर रहे हैं।


अपने देश में वीर बूढ़े भी हैं। उनका भी जमाना था। जवानी थी। अभी वे वीर जवानों से कम्पटीशन कर रहे हैं। उनके, यानी वीर बूढ़ों के लिए चूंकि गाने का कोई बोल लांच नहीं किया है, इसलिए वीर जवानों की धुन से काम चला रहे हैं। वीर जवानों के साथ अलबेला-मस्ताने हो रहे हैं। अहा, क्या सीन है! देखिये :-

जो वीर जवान थोड़ा होश में है, वह पूरे इलाके की होश उड़ा रहा है। दो- ढाई बजे रात में पटाखे फोड़ रहा है। कुछ वीर जवान गोलियां चला रहे हैं। धुआंधार। ताबड़तोड़। तर्ज यही कि अगर पटाखे न फूटें, गोलियां न चलें, तो बैंड की यह धुन चरितार्थ नहीं होगी कि ‘आज मेरे यार की शादी है।’ और शायद इसीलिए ही मंत्रोच्चारण को भी लाउडस्पीकर से जोड़ दिया गया है।

अभी-अभी मेरे मुहल्ले की एक बारात ब्रह्म मुहूर्त (करीब साढ़े तीन बजे) में लगी। इसमें कुछ ज्यादा ही वीर जवान थे। दूल्हा भी वीरता दिखा रहा था। बैंड वाला बजा रहा था- ‘नथुनिये पे गोली मारे सैंया हमार ..’, ‘तू लगईलू जब लिपिस्टिक, त हिले आरा डिस्टिक ..’, ‘जिमी-जिमी- जिमी, आ जा-आ जा-आ जा।’ (शायद बारात एडवांस में चली आयी थी)। किसकी हिम्मत है, जो वीर जवानों के पास जाये? मेरे पड़ोसी ने ‘100′ डायल किया। नो रिस्पांश। मैं उन्हें समझा रहा था। वे उन वीरों पर कानूनी वीरता दिखाना चाहते थे, जिनमें कई लालबत्ती वाले थे। उनके पास राइफल-बंदूकें थीं।

अपना बिहार वीर जवानों की जवानी, उनकी वीरता को कमोबेश हर क्षण जीने का अनुभवी रहा है। लगन, इसका विस्तारित स्वरूप है। नये-नये टाइप्स। तरह-तरह की वीरता। यह चौतरफा फैली है। चिरैयाटांड़ पुल जाम हो जाता है। वीर जवान डाकबंगला चौराहा पर नाचते हैं। मुहल्ले की सड़क को घेर लेते हैं। एकाध दिन की बात तो समझ में आती है मगर शादी के चार दिन पहले से लेकर शादी के तीन दिन बाद तक की घेराबंदी। महीने भर तक वीर जवानों और वीर बूढ़ों के घर के मेनू का लगभग हर सड़ा पक्ष (गरम मसाला से लेकर प्याज तक) मुहल्ले को शादी वाले दिन के पकवान का बड़े ही बेतुके अंदाज में अहसास कराता है।

तनिक इस वीरता को देखिये। अपनी बेटी की शादी में दूसरे की बेटी को नचा रहे हैं। मजलिस में वीर बूढ़े कुछ ज्यादा चहकते हैं। वीर बेटा-भतीजा की बगल में बैठकर नाचने वाली पर रुपये लुटाते हैं। नर्तकी आंचल ओढ़ाती है, मटककर लाउडस्पीकर पर वीर बूढ़े का नाम लेकर शुक्रिया अदा करती है। वीरता दूर तक गूंजती है। शराब-बंदूक और लड़की (डांसर) का त्रिकोण, वीरता का नार्मल सिचुएशन है। और वाकई इससे बड़ी वीरता क्या हो सकती है कि पसंदीदा गाना न सुनाने के चलते नाचने वाली को सबके सामने गोली मार दो।

ऐसे ही एक बारात में मेरी मुलाकात कुछ वीरों से हुई। वे रात में मुझे पटक कर रसगुल्ला खिला रहे थे। सुबह में गोली मारने पर आमादा थे। भई, मूड-मूड की बात है। वीरों का अपना मूड होता है। मैंने एक बारात में दूल्हे को भी अपने ससुराल वालों पर गोली चलाते देखा है। कन्या निरीक्षण के वक्त चंदोवा (शामियाना) को गोलियों से फाड़ डालना, क्या वीरता नहीं है? कुछ वीर दरवाजा लगते समय दूसरे पक्ष की लड़कियों की तस्वीरें उतारने की वीरता दिखाते हैं, तो दूसरे वीर उनका कैमरा तोड़ डालते हैं। कई वीरों ने अपनी गोली से अपनों को ही मार डाला है।

यह वीरता ही तो है कि दहेज में पांच सौ रुपये भी न छोड़ो और पच्चीस हजार के पटाखे फोड़ डालो। असल में अपने यहां वीरता दर्शाने की कुछ ज्यादा ही गुंजाइश है। यहां का आदमी कुछ ज्यादा ही आजाद है। मुकम्मल आजाद है। वह सिर्फ अपना अधिकार याद रखने को आजाद है। उसने इसी आजादी के साथ अपने कर्तव्य की देखरेख का जिम्मा सरकार को दे दिया है। उसकी आजादी, रगों में दौड़ने वाले खून से बाहर निकल स्वतंत्रता की परंपरागत परिभाषा को नया विस्तार दे रही है। तरह-तरह की आजादी है। इनकी चर्चा फिर कभी। फिलहाल, ‘ये देश है वीर जवानों का ..’ की धुन पर रात में दो बजे नाचने की प्रैक्टिस कीजिये। यही आपकी वीरता का प्रमाण है।

सोमवार, 30 अगस्त 2010

मंदिर और मदिरालय

मंदिर और मदिरालय में है कौन बेहतर



ये सवाल एक छोटे बच्चे से पूछा ।



उससे,जो एक शराबखाने के बाहर,



बेचता है बर्फ हर शाम ।



कमर से बांधे रखता है प्लास्टिक का ग्लास



हाथों में एक मग और माचिस ।



पांच रूपये में रच देता है,जो



बार,खुले आसमां के नीचे ।



इसके बदले उसे मिलता है



चंद पैसे और शराब की खाली बोतलें



मुनाफे का सौदा है ये ।



ये जगह मुफिद है उसके लिये



धूल भरी गर्म शामों में भी ।



पर उसे बहुत मतलब नहीं



पास एक मंदिर से ।



उसे बस इतना मालूम है



कि,भगवान रहते हैं यहां ।



हजारों लोग आते हैं,



कुछ ना कुछ मांगने,



नई गाड़ी की पूजा कराने,



तो अच्छी नौकरी मांगने,



लेकिन इससे उसे क्या



रोटी तो नहीं मिल पाती यहां ।



प्रसाद भी लोग बड़ी दुकानों से खरीद लाते हैं



फूल बेचने के लायक पूंजी नहीं उसके पास ।



मंदिर से मिले प्रसाद के बाद भी,



भूख लगी रहती है उसे ।



लिहाजा मदिरालय ही,



बेहतर है उसके लिये ।



यहां वो शान से रहता है



क्योंकि उसे किसी से कुछ मांगना नहीं पड़ता ।

इंदीवर













1963 में बाबूभाई मिस्त्री की संगीतमय फिल्म ’पारसमणि‘ की सफलता ने इंदीवर की शोहरत को बुलंदियों पर पहुंचा दिया। उनकी जोड़ी मनोज कुमार के साथ खूब जमी



’छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिए, ये मुनासिब नहीं आदमी के लिए, प्यार से भी जरूरी कई काम है, प्यार सबकुछ नहीं आदमी के लिए..।‘ इस गीत को गुनगुना किसे अच्छा नहीं लगता। लेकिन इस गीतों को शब्दों में पिरोना आसान नहीं। यह तो इंदीवर ही थे जिन्होंने कविताओं को फिल्मी गीतों में ढालकर उन्हें अमर बना दिया। ’नदिया चले, चले रे धारा, चन्दा चले, चले रे तारा, तुझको चलना होगा..‘ यह क्या है, कविता ही तो है। ऐसे गीतों के रचनाकार श्यामलाल बाबू राय उर्फ इंदीवर का जन्म उत्तर प्रदेश के झांसी में वर्ष 1924 में हुआ था। बचपन से ही छोटी-छोटी कविताएं लिखते और गीतकार बनने का सपना देखा करते थे। बड़े हुए तो मायानगरी मुंबई पहुंच गए। जमकर धक्के खाए और तब जाकर मिली फिल्म ’डबल क्रास‘ जो 1946 में रिलीज हुई। कहा जाता है न कि समय से पहले और भाग्य से अधिक किसी को कुछ नहीं मिलता। यही इंदीवर पर लागू होती है। फिल्म ’डबल फेस‘ के बाद अगले पांच साल तक उनके फिल्मी करियर में क्रॉस लगा रहा। तब आया साल 1951 और रिलीज हुई फिल्म ’मल्हार‘। जिसमें उन्होंने बड़े अरमान से गीत लिखा, ’बड़े अरमानों से रखा है बलम तेरी कसम‘ जिसने इतनी धूम मचाई कि वो रातोंरात स्टार बन गए। 1963 में बाबूभाई मिस्त्री की संगीतमय फिल्म ’पारसमणि‘ की सफलता ने इंदीवर की शोहरत को बुलंदियों पर ला खड़ा किया। उनकी जोड़ी मनोज कुमार के साथ खूब जमी। उन्होंने फिल्म ’उपकार‘ के लिए ’कस्मे-वादे, प्यार वफा का..‘ जैसे दिल को छू लेने वाले गीत लिखकर श्रोताओं को भाव-विभोर कर दिया। फिल्म ’पूरब और पश्चिम‘ के लिए उन्होंने ’दुल्हन चली, वो पहन चली..‘ और ’कोई जब तुम्हारा हृदय तोड़ दे..‘ जैसे गीतों को लिखकर फिल्मी जगत में तहलका मचा दिया। कल्याणजी-आनंदजी के साथ मिलकर उन्होंने ’छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिए..‘, ’चंदन-सा बदन..‘, ’मै तो भूल चली बाबुल का देश..‘ गीत दिया जो आज भी गाये और गुनगुनाए जाते है। 1970 में फिल्म आई थी ’जानी मेरा नाम‘। इसमें ’नफरत करने वालों के सीने में प्यार भर दूं..‘ और ’पल भर के लिए कोई मुझे प्यार कर ले..‘ जैसे रूमानी गीत लिखकर उन्होंने तहलका मचा दिया। फिल्म ’सच्चा-झूठा‘ का गीत ’मेरी प्यारी बहनियां बनेगी दुल्हनियां..‘, फिल्म ’सफर‘ के गीत ’जीवन से भरी तेरी आंखें और ’जो तुमको हो पसंद..‘ जैसे गानों को लिखकर उन्होंने इतिहास रचा। राकेश रोशन की फिल्मों में उन्होंने ऐसे सदाबहार गाने लिखे जो आज भी बखूबी याद किए जाते है। इनमें ’कामचोर‘, ’खुदगर्ज‘, ’खून भरी मांग‘, ’काला बाजार‘, ’किशन कन्हैया‘, ’करण-अजरुन‘ प्रमुख है। करीब तीन सौ गीतों के रचनाकार इंदीवर के गीतों को किशोर कुमार, आशा भोंसले, मोहम्मद रफी, लता मंगेशकर आदि ने अपनी आवाज दी है। ’ना कजरे की धार ना मोतियों के हार, ना कोई किया सिंगार, फिर भी कितनी सुंदर हो‘, ’पल भर के लिए कोई हमें प्यार कर ले..‘ आदि गानों को कौन भुला सकता है। 1975 में प्रदर्शित फिल्म ’अमानुष‘ के लिए इंदीवर को सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फिल्म फेयर पुरस्कार दिया गया जिसे किशोर कुमार ने गाया था। 27 फरवरी, 1999 को इंदीवर ने इस दुनिया से विदा ले ली।

वक्त का ज्वालामुखी और बरफ जैसी औरतें

सेक्स वर्कर दूसरी औरतों से अलग होती हैं। इसके चार कारण हैं.. ’हम अपनी मर्जी की मालिक होती हैं। हमें खाना बनाकर पति का इंतजार नहीं करना पड़ता। हमें उसके मैले कपड़े नहीं धोने पड़ते। हमें अपने बच्चों को अपने हिसाब से पालने के लिए आदमी की इजाजत नहीं लेनी पड़ती। हमें बच्चे पालने के लिए आदमी की जायदाद पर दावा नहीं करना पड़ता।‘ नलिनी जमीला (एक सेक्स वर्कर की आत्मकथा से )



देह बेचकर पेट पालने वाली औरतें हमेशा हाशिये में ही नहीं रही है, उनको जी भर कर अपमानित भी किया जाता है। उनकी समस्याओं को कभी समस्या नहीं माना जाता है उनके दर्द को महसूसने में समाज की भागीदारी भी नहीं होती। ऐसा बहुत कम हुआ है, जब जिस्म बेचने को मजबूर औरतों ने अपनी दास्तां खुद सुनाई हो। गीताश्री को जो उन्होंने बताया, उसे जानकर उस दुनिया को भी जानिए, जिसको दुत्कारने में कोई कोताही नहीं करते तथाकथित संघान्त-



औरतें साथ रहने वाला एक आदमी पति बन जाता था और दूसरा भाई। ये वे रिश्ते थे, जो बाजार बनाता था और बाजार ही देता था रिश्तों को नाम। रिश्तों को नाम देने के बावजूद ऐसे रिश्तों को समझना मुश्किल है क्योंकि अबूझ रिश्तों की ये ऐसी कहानी है, जो किसी औरत के जिस्म से शुरू होकर औरत के अरमानों पर आकर खत्म हो जाती है। लेकिन किसी के अरमान मिटे या सपने लुटे, इसकी परवाह बाजार कब करता है? हमने अरमानों की ऐसी अनगिनत चिताएं देखीं, जिसे किसी की बेचारगी और लाचारी हवा दे रही थी। सेक्स वर्करों की दुनिया के अनचीन्हे दर्द से साझा करते हुए देखा कि जो आदमी खुद को पति बता रहा है, वह पति नहीं दलाल है और जो खुद को भाई बता रहा है, वह ग्राहक ढूंढलाने वाला बिचौलिया। दोनों जिस्म के सौदे के बाद मिले पैसों से करते थे ऐश। लेकिन यह सब बंद दुनिया का चेहरा था, जिससे खुली दुनिया के लोग कोई मतलब नहीं रखना चाहते। तभी तो हमने पाया कि सेक्सवर्कर समाज से वैसे ही नफरत करती है, जैसे समाज सेक्स वर्कर से। कोई पति बनकर दलाली करेगा और कोई भाई बनकर ग्राहक लाएगा, शायद सामाजिक ताने-बाने पर रिसर्च करनेवाले रिश्तों की इस नई परिभाषा को कुबूल न करपाए, लेकिन सच था। केरल के कोसिकोड में इन्हें ’रोपर्स‘ के नाम से जाना जाता है। रोपर्स, रोप(रस्सी) शब्द से बना है यानी दो किनारों को जोड़ने वाला, रस्सी की तरह जोड़ने वाला रोपड़, यह खुलासा केरल की मशहूर सेक्स वर्कर नलिनी जमाली ने भी अपनी आत्मकथा में किया है। उनकी आत्मकथा खूब बिकी है और हिंदी में भी अनुवाद होकर आई है। इसे पढ़ने के बाद केरल की सेक्सवर्कर के बारे में और करीब से जानने-समझने का मन हुआ। उस ऑफिस में दो महिलाएं हाजिर थीं। रमणी और सरोजनी। कोट्टायम के उनके दफ्तर में बैठी, थोड़ी सकुचाई, झिझकती हुई दो सांवली-काली रंगत वाली यौन कर्मिंयों और मेरे बीच भाषा का संकट था। वे ना तो अंग्रेजी बोल सकती थीं, ना हिंदी समझती थी। ना मैं उनकी भाषा। मगर वे इस बातके लिए तैयार होकर आई थी कि इंटरव्यू देना है। साजू इंटरप्रेटर बन गया। स्त्री का दर्द पहली बार पुरु ष के मुख से अनुवाद होकर स्त्री तक आ रहा था। पता नहीं पुरु ष ने उसमें क्या जोड़ा, क्या घटाया..मगर उन दोनों की दैहिक भाषा ने मुझे समझा दिया, सब कुछ। रमणी थोड़ी कम उम््रा की थी। वह खुल रही थी, साहसपूर्वक, वैसे ही जैसे उसने यौनकर्म की दहलीज पर पैर रखा था। बोलते हुए वह उसके भीतर की खड़खड़ साजू ने नहीं, मैंने सुनी। कुछ था, जो खुलता और बंद होता था। खौफ के साथ अपने बाहर फैलने की ललक को वह रोक नहीं पा रही थी। रमणी को दिल्ली देखना है। उसने देखा नहीं, सुना भर है। बातचीत के दौरान वह लगभग गिड़गिड़ाती है-’ क्या आप मेरे लिए टिकट भेजोगे। अपने पास रखोगे। लालिकला, कुतुबमीनार देखना है। सुना है..बहुत सुंदर और बड़ा शहर है..।‘ मैं भी वादा कर देती हूं पर अभी तक पूरा नहीं कर पाई हूं। शायद कभी कर पाऊं..उनसे संपर्क का जरिया भी तो नहीं कोई। हम कौन सी भाषा में बात करेंगे, फोन पर वे बोल रही थीं और मुझे मुझे निदा फाजली की पंक्तियां याद आ रही थीं- ’ इनके अन्दर पक रहा है वक़्त का ज्वालामुखी किन पहाड़ों को ढंके हैं बरफ जैसी औरतें . रमणी, बोलती कम है, हंसती ज्यादा है। हंसी हंसी में कहती है, ‘मैं पहले एक दिन में पांच छह ग्राहक निपटा देती थी। अब थकान होने लगी है। अब संख्या कोई मायने नहीं रखती..दो तीन निपटा ले, यही बहुत है। वह थोड़ी गंभीर होती है- --ग्राहकों की संख्या मायने नहीं रखती, उनकी संतुष्टि मायने रखती है। धंधे में उतरने का कोई अफसोस रमणी ईमानदारी से स्वीकारती है, अफसोस तो है, मगर जिंदगी चुनौती की तरह है, उसका सामना कर रहे हैं। अब भाग नहीं सकते। देर हो चुकी। इसके आगे का रास्ता बंद है। क्या करेंरमणी का यह वक्तव्य किसी अनुपिस्थत को संबोधित था। साजू मुझे बता रहे थे और वह शून्य में देख रही थी। बात-चीत से पता चला कि रमणी कोट्टायम के संघांत मुहल्ले में रहती है। वहां धंधा करने मे ंसमस्या ही समस्या। उसने रास्ता निकाल लिया। जंगल ही उसका रेडलाइट एरिया बन गया है। वह ग्राहकों को पास के जंगल में ले जाती है। घास के बिछौने होते हैं। मोबाइल हैं, ग्राहक फोन करते हैं फिर जंगल में जगह तय होती है। कुछ ग्राहक जंगल नहीं जाना चाहते, तब सरोजनी की बन आती है। वह अपने ग्राहक उसकी तरफ भेज देती है। सरोजनी का घर भी तंग गलियो में हैं मगर वह घर से धंधा करती है। थोड़ी उम््रा ज्यादा है इसिलए लोग शक कम करते हैं। साथ में पतिनुमा जीव रहता है। पति का जिक्र आया तो नलिनी याद आ गई। नलिनी ने ऐसे पतियों के बारे में साफ लिखा है कि मकान वगैरह किराए पर लेना हो तो ये लोग बड़े काम आते हैं। लेकिन कुल मिलाकर यह किसी सिरदर्द से कम नहीं हैं। सरोजनी का पति भी एसा ही है। सरोजनी ही उसका खर्च चलाती है। बदले में वह उसे सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने का नाटक करता है। घर पर अक्सर ग्रहकों का आना जाना देख कर कई बार पड़ोसी पूछ लेते हैं, सरोजनी का जवाब होता है-’ये लोग प्रोपर्टी डीलर हैं, मेरा प्लाट खरीदना चाहते हैं। देखने आते रहते हैं। सरोजनी बताती है-’कई बार उसके पास युवा लड़कों का ग्रुप आता है। वह पांच मिनट में उन्हें मुक्ति देकर भेज देती है। भीतर से उसे ग्लानी होती है कभी कभी, उनकी और अपनी उम््रा देखकर। लेकिन ग्राहक तो ग्राहक है, चाहे किसी भी वक्त या किसी भी उम््रा का हो.। ’’ लेकिन पैसे की जरूरत ऐसी सोच पर लगाम लगा देती है। रमणी भी कहती है, ‘‘पैसा बड़ी चीज है। उन्हें कैसे लौटा दें। मैंने कहा, छोड़ क्यो नहीं देती ये धंधा..दोनों एक साथ बोल पड़ी, इतना पैसा किस काम में मिलेगा। अब हमें कौन काम देगा। हम किसी काम के लायक बचे ही नहीं..अब तो आदत सी पड़ गई है..। अब छोड़ भी दे तो लोग हमें चैन से नहीं जीने देंगे। रमणी अब बातचीत में सहज हो चुकी है और उसे यह स्वीकारने में झझिक नहीं होती कि इस पेशे में भी वह कभी-कभार आनंद ढूंढ लेती है। वह स्वीकार करती है कि एक स्थाई ग्राहक से वह भी आनंद लेती है। यहां पैसा गौण है। उससे मोल-भाव नहीं करती। रमणी के पास किस्से बहुत है..। एक बार पैसे वाला अधेड़ ग्राहक आया, कहा-’’मैं अपनी पत्‍नी से बहुत प्यार करता हूं, मगर मैं जिस चीज की तलाश में हूं, वहां नहीं है। चलो, सेक्स में फन करते हैं..।’’ लेकिन रमणी अच्छी तरह जानती है कि दूसरों को भले ही उसके जिस्म में फन की तलाश हो, लेकिन वह खुद अपने पति के मर जाने और कंगाल हो जाने के बाद यातना के जिस रास्ते पर चल रही है, वह रास्ता कहां खत्म होगा। न घर बचा न कोई जमीन का टुकड़ा, जिसे वह अपना कह सके। रिश्तेदारों ने शरण देने से मना कर दिया। कम पढी लिखी थी, सो नौकरी ना मिली। एक शाम उसने खुद को पीकअप प्वाइंट पर पाया। जिस्म की कमाई से पहले बेटियों को पाला, अब खुद को पाल रही है। इसी नरक में अपने लिए सुख का एकाध कतरा भी तलाश लेती है। यह सब बताते हुए उसकी आंखों में कहीं भी संकोच या शरम नहीं.है तो बस थोड़ी शिकायत, थोड़ा धिक्कार। दोनों से बातचीत करते हुए ही हमने जाना कि केरल में कहीं भी कोई रेडलाइट एरिया नहीं है। इसीलिए वहां सेक्सवर्कर पूरे समाज में घुली मिली हैं। उन्हें अलग से चिन्हित नहीं किया जा सकता। इसकी दिक्कते भी हैं। बताते हैं कि केरल में 10,000 स्ट्रीट बेस्ड सेक्सवर्कर हैं। इनमें हिजड़े भी शामिल हैं। इसके बावजूद सोनागाछी की एकता उनके लिए रोल माडल की तरह है। वहां एक अनौपचारिक रूप से संगठन बना है, सेक्सवर्कर फोरम केरला (एसडब्लूएफके) जो इनके हितों का ध्यान रखने लगा है। गाहे-बगाहे आंदोलनों में शिरकत भी करने लगा है। मगर यह सोनागाछी के दुर्वार महिला समन्य समिति की तरह ताकतवर नहीं है। रमणी,सरोजनी उसकी सदस्य बन चुकी हैं। सरोजनी की दो बेटियां हैं, चेन्नई में रहती हैं। वे हिंदी नहीं जानती, किताब नहीं पढ सकती, तो क्या हुआ, फोटो तो पहचान सकती है। रमणी और सरोजनी ने फोटो भी खिचवाए। बेटियां हालांकि अब जान गई हैं कि मां क्या काम करती हैं। पहले तो बहुत विरोध हुआ अब नियित को कुबुल कर चुकी है । साथ कुछ वक्त बिताने के बाद जब वे जाने की अनुमित मांग रहीं थीं तो वहां मौजूद आंखें उन्हें सांय से घूर रही थीं। वे चली गईं, लेकिन दोनों मेरे सामने ऐसे खुली जैसे अंधड़ में जंग लगे दरवाजे-खिड़िकयों की सांकलें भरभरा कर खुल जाती हैं। उन्होंने अपने दर्द को कही से भी अतिरंजित नही किया..बल्कि भोगे हुए को ज्यों का त्यों रख दिया। शायद उन्हें लग रहा था कि इस जलालत से भरी दुनिया में कोई है, जो उसकी व्यथा सहानूभूतिपूर्वक सुन रहा है। भाषाई संकट के कारण पूछ नहीं पा रही थी, शायद साजू की उपिस्थित भी संकोच पैदा कर रही थी। फिर भी साजू के बावजूद उन्हें जो कुछ कहना था साफ-साफ कह गई। सुना गई अपनी कहानी। उस कहानी में गुड गर्ल बनने का सिंड्रोम नहीं था। ये रास्ता उन्होंने खुद चुना था। शिकायतें कम थीं और लहजे में मुक्ति की चाह भी खत्म थी। उनके जाने के बाद भी रमणी की खिलखिलाहट मेरे सामने गूंज रही थी और दर्द की दरिया में भींगने के बाद पनपे अवसाद को कम कर रही थी। सरोजनी ने भी अपनी चालबाजियों को चटखारे लेकर सुनाया था, और उसे सुनाने में मजा भी आ रहा था, लेकिन क्या वे सचमुच चालबाज है।


उचित खुराक न मिलना शर्मनाक

 पश्चिमीअर्थशास्त्र ने खाद्य सुरक्षा और खाद्य असुरक्षा जैसे शब्द दिये है। हमारे लिए उसका परम्परागत अर्थ एक मनुष्य को गर्भ में आने से लेकर अन्तिम सांस तक स्वस्थ रहने के लिए जितना और जैसा न्यूनतम आहार चाहिए उसकी निश्चित उपलब्धता एवं अनुपलब्धता ही है। इस कसौटी पर यदि हम भारत के नौनिहाल और उनको जनने वाली माताओं की दशा का आकलन करें तो तस्वीर दिल दहलाने वाली और भारत के भविष्य की ष्टि से अत्यंत ही चिंताजनक है। वर्तमान अंतरराष्ट्रीय आर्थिक ढांचे में भविष्य की आर्थिक महाशक्ति माने जाने वाले हमारे देश के नीतिनि र्माताओं और उनके समर्थन में ढोल पीटनेवाले विशेषज्ञों, बुद्धिजीवियों, पूंजीशाहों के सामने यह शर्मनाक और भयावह तथ्य बिल्कुल स्पष्ट है कि हमारे यहां कुपोषित-न्यूनपोषित बच्चों तथा माताआें का प्रतिशत दुनिया में सबसे ज्यादा है। विश्व बैक ने अपनी रिपोर्ट इंडियाज अंडरनरिस्ड चिल्ड्रेन यानी भारत के अंतपाषित बच्चे में कहा है कि भारत में औसत छ: करोड़ बच्चे कम वजन के शिकार है। यानी सब सहारा अफ्रीका से दोगुना। 30 प्रतिशत बच्चे कम वजन वाले पैदा होते है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि पिछले एक दशक में आवश्यक पोषक तत्वांे से वंचित बच्चों की संख्या कम करने की दिशा में प्रगति अन्य अनेक देशों की तुलना में कम एवं धीमी है। कुपोषित-अल्पपोषित बच्चों एवं माताओं सम्बन्धी तस्वीर तब और डरावनी हो जाती है जब हम विभिन्न राज्यों एवं उनमें अलग-अलग सामाजिक-आर्थिक समूहों के बीच व्याप्त असमानता देखते है। ग्रामीण क्षेत्रों में आधे बच्चे कम वजन वाले पैदा होते है, जबकि शहरों में 38 प्रतिशत। कम वजन वाली बच्चियों का अनुपात 48.9 प्रतिशत एवं बच्चों का 45.5 प्रतिशत है। दलितों यानी अनुसूचित जनजाति में 56.2 प्रतिशत एवं अनुसूचित जनजाति 53.2 प्रतिशत जबकि अन्य जातियों में औसतन 44.1 प्रतिशत बच्चे ही कम वजन वाले पैदा होते है। कम वजन या अस्वस्थ बच्चों का कारण ही माताओं का कुपोषण। नेशनल फैमिली हेल्थ सव यानी राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सवक्षण के तीसरे दौर 2005-06 को सभी मानकों पर विश्वसनीय माना जाता है। इसने माना है कि आवश्यक पौष्टिक खुराक नहीं मिलने के कारण भारत में 50 लाख बच्चे प्रतिवर्ष मर जाते है। यानी प्रति छ: सेकेण्ड में एक बच्चा आवश्यक भोजन के अभाव में हमारे यहां दम तोड़ देता है। विश्व बैक की रिपोर्ट कहती है कि बच्चों की कुल मृत्यु में से आधी केवल आवश्यक न्यूनतम भोजन न मिलने के कारण होता है। साथ ही भारत में कुल बीमारियों में 22 प्रतिशत का कारण भी यही है। यूनिसेफ की रिपोर्ट कहती है कि हमारे यहां प्रति एक लाख गर्भस्थ माताओं में 450 तो बच्चा जनने के दौरान ही चल बसती है। इनकी संख्या प्रतिवर्ष है, 78 हजार। महिलाओं के स्वास्थ्य को मापने के लिए बीएमआई यानी बड़ी मॉस इन्डेक्स का मानक है, जिसमें वजन का उम््रा से भाग किया जाता है। इसमें दुबलापन की न्यूनतम सीमा रेखा 18.5 है, जिसका अर्थ है, भीषण कुपोषण का शिकार। इसी प्रकार, बीएमआई 25 का अर्थ है, अत्यधिक वजन और मोटापा। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सवक्षण के अनुसार 15 से 49 वर्ष की 36 प्रतिशत यानी एक तिहाई से ज्यादा महिलाएं 18.5 के मानक से कम है। यानी ये भयानक कुपोषण से ग्रस्त हंै। दूसरे शब्दों में कहें तो यदि ये जीवित है तो भगवान भरोसे और यदि जीवित रहते हुए भी अपनी जिम्मेवारी निभा रहीं है तो केवल भारत के पारिवारिक संस्कारों और उससे मिली अदम्य जिजीविषा की बदौलत ही। विवाहित महिलाओं में 33 प्रतिशत इस श्रेणी में है। कुपोषण की शिकार इन महिलाओं द्वारा जन्म दिए गए बच्चे स्वभाविक ही सामान्य महिलाओं के बच्चों से ज्यादा कुपोषण के शिकार होंगे। विश्व स्वास्थ्य संगठन से लेकर, विश्व बैक एवं ऐसी अन्य रिपोटां में वर्तमान स्वास्थ्य विश्लेषण के अनुसार लौह, आयोडिन, विटामिन ए, प्रोटीन आदि की कमी का ब्योरा दिया गया है। इसके अनुसार गर्भस्थ माताओं की मृत्यु का करीब 22 प्रतिशत कारण केवल लोहे की कमी होता है। इसी प्रकार विटामिन ए की कमी बच्चों को विरुपित करने से लेकर उनकी मृत्यु का कारण बनती है। रक्ताल्पता पर अध्ययन करने वालों ने माना है कि भारत में गर्भस्थ स्त्रियों में आधी तथा बच्चा जनने के बाद स्तनपान कराने वाली माताओं में कम से कम एक तिहाई इससे पीड़ित है। कई राज्यों के वंचित तबकों में 87 प्रतिशत तक गर्भस्थ एवं स्तनपान कराने वाली स्त्रियां रक्ताल्पता की शिकार पाई गईं। केवल इसके कारण गर्भावस्था या बच्चा जनने के दौरान 22 हजार महिलाओं की मृत्यु हो जाती है। इसी प्रकार विटामिन ए की कमी के कारण दुनिया भर में जितनी गर्भस्थ महिलाएं रतौधी का शिकार होती है, उनमें हर दूसरी भारत की है-कुल 62 लाख में 30 लाख। विश्व बैक को खलनायक मानने वाले इस रिपोर्ट के पीछे भी कुछ निहितार्थ तलाशेंगे और यह हो भी सकता है, पर यह हवा में तैयार नहीं किया गया है। इसमें अनेक ाोतों से प्राप्त तथ्यों को आधार बनाया गया है। मान लीजिए सवक्षणों, अध्ययनों से रिपोर्ट और आंकड़े न भी दिए जाएं तो क्या हमारी आंखों के सामने कुपोषित-न्यूनपोषित, दुर्बल, अशक्त महिलाएं, बच्चे नहीं आते क्या भूख से बिलबिलाते बच्चों एवं महिलाओं को हम नहीं देखते इनकी एक अखिल भारतीय तस्वीर अपने मन में बना लीजिए, फिर निष्कर्ष आपके सामने होगा। कुपोषित-न्यूनपोषित महिलाओं एवं बच्चों की भारी तादाद हमारे मौजूदा भारत का भयावह सच है। हम अत्यधिक विश्लेषण एवं भारी अंग्रेजी शब्दावलियों में न जाएं तो साफ दिखाई देगा कि कुपोषण या अल्पपोषण का प्राथमिक और एकमात्र मूल कारण उपयुक्त भोजन सामग्री का अभाव है।इसे आप खाद्य असुरक्षा या कोई नाम दे दीजिए। हां, कुपोषण एवं न्यूनपोषण के पीछे दूसरे निर्धारक भी है, किन्तु वे सारे तो समय पर आवश्यक सामान्य पौष्टिक भोजन न मिलने के परिणाम है। यदि भारतीय रसोई की परम्परागत पवित्र थाली किसी माता को मिलती रहे तथा वनस्पतियों और फल-फूलों तक उसकी आसान पहुंच तो फिर उसके शरीर में किसी तत्व, यौगिक, खनिज, या मिश्रण की कमी नहीं होगी। अलग से गोली के रूप में लोहा, या खनिज लेने की आवश्यकता भी पौष्टिक भोजन न मिलने से ही पैदा होती है। फिर महिलाएं क्यों किसी बीमारी की शिकार होंगी! जब महिलाएं स्वस्थ होंगी तो उनका गर्भस्थ शिशु भी स्वस्थ होकर कुलांचे मारते पैदा लेगा और पैदा होने के बाद उसे स्वस्थ मां की छाती से पर्याप्त और पौष्टिक दूध मिलेगा। मनुष्य के विकास का मूल आधार गर्भस्थ होने से लेकर पैदा होने के बाद के दो वर्ष तक हो जाता है और इस काल में जो क्षति हो गयी उसकी पूर्ति असम्भव होती है। कम वजन लेकर पैदा होने वाले बच्चों के भावी विकास की ष्टि से अगले दो वर्ष में क्षति हो चुकी होती है। इसका निदान केवल और केवल उपयुक्त भोज सामग्री की उपलब्धता में है। रिपोटां से यह साफ हो गया है कि अल्पपोषितों के मामले में सामाजिक-आर्थिक एवं भौगोलिक समूहों के बीच असमानता 1990 के दशक में बढ़ी है। यानी आर्थिक सुधारों के काल में। तो इसका अर्थ यह हुआ कि आर्थिक विकास के उछलते आंकड़े पिछड़े परिवारों के बच्चों और माताओं को न्यनूतम आवश्यक पोषणयुक्त भोजन पहुंचाने का आधार साबित नहीं हुए है। सच तो यही है कि तथाकथित विकास के इस ढांचे में पौष्टिक आहार भी नकद आधारित और इतना महंगा हो गया है कि जिस देश में 37 प्रतिशत लोगों के पास अपनी न्यूनतम आवश्यकता की पूर्ति का साधन नहीं है, वे कहां से इसे खरीद पाएंगे! खाद्य सामग्री की महंगाई के लगभग पिछले तीन वष्रो में स्थिति और बदतर हुई है। जाहिर है, इसके लिए हमें आज के सन्दर्भ में परम्परागत भारतीय जीवन शैली की ओर लौटने की आवश्यकता है जिसमें हाथी के लिए मन भर और चींटी के लिए कण भर उपलब्ध कराने की स्वाभाविक-स्वचालित व्यवस्था थी और समाज की मुख्यधारा का स्वभाव न्यूनतम में ही सन्तुष्ट होने का था। कृषि की प्रधानता के रूप में ख्यात देश में हमारे बच्चे और उनकी माताओं को पेट भरने और स्वस्थ रहने लायक, अन्न, दूध और फल-फूल नहीं मिले इससे बड़े शर्म की बात हमारे लिए कुछ नहीं हो सकती। किन्तु हमारे भाग्यविधाताओं को शर्म आए तब न!

मैंने मन्दिर की राह जबसे छोड़ी

मैंने मन्दिर की राह जबसे छोड़ी


तक़दीर ने दिशाएँ किस्मत की मोड़ी



पहले मुस्कान का था मैं मालिक

खिलखिलाता हरदम रहता था मिज़ाज

हर एक से मोहब्बत का नाता जुड़ा था

यारों की लय से जुड़ती थी आवाज़

सगे-संबंधी मिलते थे दिल खोल

परिवार को था, इस नाचीज़ पे नाज़



पर अब हर रिश्तेदार ने रिश्ते की डोर तोड़ी

मैंने मन्दिर की राह जबसे छोड़ी



खुशी चली कर आँगन को विदा

तूफां हर पल चिंता के उभरे

अपना जो कहते कभी थे मुझको

नज़र चुरा अब अनजान हो गुज़रे

हर शब्द जनने लगा उलझन

व्यवहार के कोई काज न सुधरे



बेचैनी के धन हो गए ज्यादा, चैन की बारिश थोड़ी

मैंने मन्दिर की राह जबसे छोड़ी



मेरे मन्दिर भीतर कोई देव नहीं

गंभारे में सत्य का प्रकाश था

नियति और न्याय थे वहाँ द्वारपाल

ईमान की लॉ का ओजस उजास था

विनय, सद्भाव के चमकते दिए

त्याग बना वहाँ श्वेत कपास था

प्रेम की घंटी, सत्कार का चामर

और अहिंसा के ढोल का आजीवन निवास था



ऐसे धर्म से हुआ जो दूर, जीवन हुआ दो कौड़ी

मैं ने मन्दिर की राह जबसे छोड़ी ।

रविवार, 29 अगस्त 2010

दस क्षणिकाएँ




वार

पीठ पीछे का वार

तोड़ देता है

परिवार





जीवन मंथन

मुमकिन है गोते लगाना

मुश्किल है सीप से मोती लाना

ये जीवन मंथन है





दौर

जो दौर गुजर रहा है

हमारे आसपास से

डरने लगे हैं

अपने अहसास से





भ्रष्टाचार

कलियुग में भ्रष्टाचार

खड़ा है बाँह फैलाए

जीवन का यह चक्र

फिर भी घूमता जाए





शून्य

धीरे धीरे बारी बारी

रूठे मुझसे सब

शून्य को निहारता हूँ

रोता नहीं हूँ अब





कोशिश

एक टुकड़ा धूप ही सही

कभी तो मिलेगी

कोशिश करना ही जिंदगी है



कदम

आगे कुआँ पीछे खाई है

यहाँ किसने निभाई है

संभल कर रखो कदम

इसी में भलाई है





हिम्मत

काले घुप्प अंधेरे में

रौशनी की एक नन्हीं लकीर

देती है अँधियारा चीर

हिम्मत से





ग़ज़ल

आहों वेदनाओं से जब

नयन हुए सजल

कभी गीत कभी मुखड़ा

कभी बन गई गजल



१०

सत्कर्म

जिंदगी एक फूल है

जो महकती है

चहकती है

अपने सत्कर्मों से