सोमवार, 6 सितंबर 2010

पूंजी के आदिम संचय का घातक हथियार

चीन में 62 हजार किमी हाइवे बन चुका है और एक भी किसान भू-अधिग्रहण के लिए गोली से नहीं मारा गया। यहां सिर्फ 200 किमी एक्सप्रेस वे बना है और सैकड़ों लोग गोलियों से भून डाले गए है



आखिर इतनी तेजी के साथ भू-अधिग्रहण क्यों और किसके लिए किया जा रहा है, वह भी एक ऐसे देश में जहां की 70 फीसद आबादी खेती पर निर्भर है। लगता है देश के विकास की देशी अवधारणा वैश्वीकरण की आंधी में उड़ चुकी है और विश्व पूंजी की हवस को विकास का नाम दे दिया गया है। सरकारें किसी भी दल की हों, भू-कानूनों में परिवर्तन करके कारपोरेट जगत के लिए किसानों की जमीनों की हड़प को आसान बना रही है। अटल सरकार ने 2002 में उस कानून को बदल दिया था जिसके जरिए कोई विदेशी कम्पनी भारत में खेती की जमीन खरीद कर अथवा ठेके पर लेकर खेती नहीं कर सकती थी। मनमोहन सरकार 1894 के भू-अधिग्रहण कानून की जगह जो नया विधेयक तैयार कर रही है; उसमें जमीन अधिग्रहण के समय किसानों की सहमति आवश्यक बताने वाली धारा 5(अ) को खत्म किया जा रहा है। साथ ही परियोजना की कुल 70 फीसद जमीन निजी कम्पनियां किसानों से सौदा करके हासिल करेंगी और 30 फीसद सरकार अधिग्रहण करके उन्हें मुहैया करायेगी। इस तरह भविष्य में कान्ट्रेक्ट फार्मिंग और कारपोरेट फार्मिंग की तैयारियां जोर-शोर से शुरू कर दी गई है। खुद मायावती सरकार उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन एक्ट 1950 धारा 3 (अ) 6 (व) में संशोधन करके, निजी कम्पनियों के लिए दी जानी वाली भूमि की मंजूरी का अधिकार मंत्रिमंडल से हटाकर मुख्य मंत्री के अधीन कर चुकी है। इसी तरह कई अन्य राज्य अपने सीलिंग कानूनों को कम्पनियों के दबाव में बदल रहे है। तमिलनाडु सरकार 50 लाख एकड़ सरकारी जमीन बहुराष्ट्रीय व निजी कम्पनियों को सौप चुकी है। पहली बात तो किसान इन विशालकाय कम्पनियों के साथ सौदेबाजी की स्थिति में नहीं होते। दूसरे ये कम्पनियां, किसानों के पुनर्वास आदि से बच कर निकल जाएंगी। किसानों की जमीन को हड़पने की तैयारियां राज्य से केंद्रीय स्तरों पर की जा रही है। यह पूंजी के आदिम संचय का नंगा रूप है। उसकी ताजा मिसाल खुद जिकरपुर है। मॉडल सिटी के नाम पर जेपी समूह पांच गांवों के किसानों की जमीन का मात्र 446 प्रति वर्ग मीटर की दर से मुआवजा दे रहा है और इस जमीन को 5500 प्रति वर्ग मीटर के भाव से बेचा जा रहा है। इसी प्रकार, नोएडा में 880 प्रति वर्गमीटर लेकर उसी जमीन को 6200 में बेचा जा रहा है। यह कैसा विकास लगता है, बहुराष्ट्रीय कम्पनियां, इजारेदार मीडिया एवं समूचे तंत्र ने मिलकर विकास की अवधारणा का ही अपहरण कर लिया है। हाईटैक मॉडल सिटी, गोल्फ कोर्स, नाइट सफारी, कैसिनो, मॉल आदि विकास के प्रतीक बना दिए गए है। भारत में इनका इस्तेमाल 10 फीसद से ज्यादा लोग नहीं कर सकते। अब इतने फीसद लोगों के लिए किसानों की उपजाऊ जमीन का अधिग्रहण देश को कैसे विकास की तरफ ले जाएगा? भारत बाकी एक अरब लोगों के पेट भरने के साधन को नष्ट करके किए जा रहे विकास का देश हित से क्या मतलब है? उत्तर प्रदेश में एक्सप्रेस हाइवे के लिए जमीन का अधिग्रहण हो रहा है। वह भी निजी कम्पनियों द्वारा। ये कम्पनियां 35-40 वषां तक टोल टैक्स वसूल करंेगी। इसके लिए यूपीए सरकार ने 2008 में टोल टैक्स को थोक मूल्य सूचकांक से जोड़कर उनके दीर्घकालीन मुनाफे की पक्की गारंटी कर दी है। इन सड़कों पर देश की 70 फीसद आबादी चलने की हिम्मत नहीं जुटा पाएगी। टेम्पुओं, बसों, रेलों में भेड़-बकरी की तरह भरकर चलने वाले लोगों के लिए ये सड़कें नहीं होंगी। उप्र में लगभग डेढ़ लाख हेक्टेयर उपजाऊ जमीन यमुना एक्सप्रेस हाइवे और गंगा एक्सप्रेस हाइवे के लिए ली जा रही है। किसानों की रोजी-रोटी उजाड़कर पर्यावरण को नष्ट कर आखिर यह विकास किसके लिए है? स्पेशल इकोनॉमिक जोन (सेज) देश भर में लगभग 1 लाख हेक्टेयर जमीन अब तक 300 से अधिक सेज बनाने के लिए दे दी गई है। सस्ते में किसानों की उपजाऊ जमीन लेकर उद्योगों को श्रम कानूनों और टैक्स के नियमों से बरी कर दिया गया। मगर इनका विकास में कितना योगदान है इसका जीता-जागता उदाहरण आन्ध्राप्रदेश है। जहां सबसे अधिक सेज बने है और वहीं सबसे अधिक संख्या में किसान आत्महत्या भी कर चुके है। यह सिलसिला जारी है। स्पष्ट है, विकास के ये उक्त मॉडल कारपोरेट जगत के मुनाफा का दीर्घकालीन आधारभूत ढांचा खड़ा करने के लिए अपनाए जा रहे है। एक अरब लोगों की बुनियादी जरूरतों से इनका कोई लेना-देना नहीं है। विकास के मॉडल में चीन आगे इस विकास की भेंट चढ़ रहे 70 फीसद लोगों के लिए तो विकास की यह प्रक्रिया भयावह प्राकृतिक आपदा का रूप लेती जा रही है। हमसे दो साल बाद आजाद हुआ चीन का उदाहरण लीजिए। वहां 62 हजार किमी हाइवे बन चुका है और एक भी किसान भू-अधिग्रहण के लिए गोली से नहीं मारा गया। यहां सिर्फ 200 किमी एक्सप्रेस वे बना है और सैकड़ों लोग गोलियों से भून डाले गए है। उप्र में नोएडा से मथुरा तक बेहतर मुआवजे की मांग करते हुए 10 लोग पिछले साढ़े तीन वर्ष में गोलियों से भूने जा चुके है। एक भी पुलिस वाले के खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं हुई है। चीन में केवल 6-7 स्पेशल इकोनॉमिक जोन बने है जबकि हमारे देश में 1000 हजार से ज्यादा सेज के प्रस्ताव स्वीकृत किये जा चुके है। चीन में कृषि जमीन हमसे कम होते हुए भी वहां का अनाज उत्पादन 51 करोड़ टन पहुंच चुका है। भारत में अभी 21 करोड़ टन उत्पादन पर ही हम कदम ताल कर रहे है। वहां प्रतिदिन प्रति व्यक्ति डेढ़ किलो औसत अनाज का उपभोग होता है जबकि हमारे देश में प्रति व्यक्ति खपत मात्र 400 ग्राम है। चीन में विकास की जिम्मेदारी सरकार ने खुद संभाली हुई है जबकि हमारी सरकार डब्ल्यू़टीओ की शतां के तहत चल रही है। अहम सवाल विकास का यह मॉडल देश की खाद्य सुरक्षा को खतरे में डाल रहा है। कृषि जिन्सों की आपूर्ति और मांग दोनों को संकुचित कर रहा है। कृषि में मांग-आपूर्ति का संकुचन देर सवेर निरुद्योगीकरण को पैदा करता है। हमें ध्यान रखना होगा कि खेती से उजड़कर 70 फीसद लोग कहां जाएंगें। चूंकि रोजगार विहीन विकास के इस दौर में उनके औद्योगिक मजदूर बनने की प्रक्रिया पहले से ही बन्द हो चुकी है। अत: कम्पनियों की लूट व सरकार के दमन चक्र का व्यापक प्रतिरोध करने तथा उग्रवाद और अराजकता की तरफ किसानों को बढ़ने से रोकने की जिम्मेदारी संगठित किसान आन्दोलन को संभालनी होगी।