मैंने मन्दिर की राह जबसे छोड़ी
तक़दीर ने दिशाएँ किस्मत की मोड़ी
पहले मुस्कान का था मैं मालिक
खिलखिलाता हरदम रहता था मिज़ाज
हर एक से मोहब्बत का नाता जुड़ा था
यारों की लय से जुड़ती थी आवाज़
सगे-संबंधी मिलते थे दिल खोल
परिवार को था, इस नाचीज़ पे नाज़
पर अब हर रिश्तेदार ने रिश्ते की डोर तोड़ी
मैंने मन्दिर की राह जबसे छोड़ी
खुशी चली कर आँगन को विदा
तूफां हर पल चिंता के उभरे
अपना जो कहते कभी थे मुझको
नज़र चुरा अब अनजान हो गुज़रे
हर शब्द जनने लगा उलझन
व्यवहार के कोई काज न सुधरे
बेचैनी के धन हो गए ज्यादा, चैन की बारिश थोड़ी
मैंने मन्दिर की राह जबसे छोड़ी
मेरे मन्दिर भीतर कोई देव नहीं
गंभारे में सत्य का प्रकाश था
नियति और न्याय थे वहाँ द्वारपाल
ईमान की लॉ का ओजस उजास था
विनय, सद्भाव के चमकते दिए
त्याग बना वहाँ श्वेत कपास था
प्रेम की घंटी, सत्कार का चामर
और अहिंसा के ढोल का आजीवन निवास था
ऐसे धर्म से हुआ जो दूर, जीवन हुआ दो कौड़ी
मैं ने मन्दिर की राह जबसे छोड़ी ।
